पितृगण का उद्धार भक्ति से:
(((( पितृगण का उद्धार भक्ति से ))))
आश्विनमासके कृष्णपक्षके पन्द्रह दिन 'पितृपक्ष' के नामसे विख्यात हैं।
इन पन्द्रह दिनोंमें लोग अपने पितरोंको जल देते हैं तथा उनकी मृत्युतिथिपर श्राद्ध करते हैं।
पितरोंका ऋण सन्तानोत्पत्ति तथा श्राद्धोंद्वारा चुकाया जाता है।
पितृपक्ष श्राद्धोंके लिये निश्चित तिथियोंका एक समूह है।
वर्षके किसी भी मास तथा तिथिमें स्वर्गवासी हुए पितरोंके लिये पितृपक्षकी उसी तिथिको श्राद्ध किया
जाता है।
पूर्णिमापर देहान्त होनेसे भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमाको श्राद्ध करनेकी विधि है।
इसी दिनसे महालयका प्रारम्भ भी माना जाता है।
चित्रकूट के पास एक श्यामदास नाम के उच्चकोटी के नाम जापक महात्मा थे।
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'श्राद्ध' का अर्थ है, श्रद्धासे जो कुछ दिया जाय।
श्रद्धया दीयते यत् तत् श्राद्धम्।
पितृपक्षमें श्राद्ध करनेसे पितृगण वर्षभर प्रसन्न रहते हैं।
पितृपक्षमें श्राद्ध तो मुख्य तिथियोंको ही होते हैं, किंतु तर्पण प्रतिदिन किया जाता है।
देवताओं तथा ऋषियोंको जल देनेके अनन्तर पितरोंको जल देकर तृप्त किया जाता है।
यद्यपि प्रत्येक अमावास्या पितरोंकी पुण्यतिथि है, फलदायी है।
इसी प्रकार पितृपक्षकी नवमीको माताके श्राद्धके लिये पुण्यदायी माना गया है।
श्राद्धके लिये सबसे पवित्र स्थान गयातीर्थ है।
जिस प्रकार पितरोंके मुक्तिनिमित्त गयाको परम पुण्यदायी माना गया है, उसी प्रकार माताके लिये काठियावाड़का सिद्धपुर स्थान परम फलदायी माना गया है।
इस पुण्यक्षेत्रमें माताका श्राद्ध करके पुत्र अपने मातृ ऋणसे सदा - सर्वदाके लिये मुक्त हो जाता है।
यह स्थान मातृगयाके नामसे भी प्रसिद्ध है।
पितृपक्षमें श्राद्धकी महिमा आयुः पुत्रान् यशः स्वर्ग कीर्ति पुष्टिं बलं श्रियम् ।
पशून् सौख्यं धनं धान्यं प्राप्नुयात् पितृपूजनात् ।।
तथा-
आयुः प्रजां धनं वित्तं स्वर्ग मोक्षं सुखानि च।
प्रयच्छन्ति तथा राज्यं प्रीता नृणां पितामहाः ।।
धर्मशास्त्रोंमें कहा गया है कि पितरोंको पिण्डदान करनेवाला गृहस्थ दीर्घायु, पुत्र - पौत्रादि, यश, स्वर्ग, पुष्टि, बल, लक्ष्मी, पशु, सुख - साधन तथा धन - धान्यादिकी प्राप्ति करता है।
यही नहीं, पितरोंकी कृपासे ही उसे सब प्रकारकी समृद्धि, सौभाग्य, राज्य तथा मोक्षकी प्राप्ति होती है।
आश्विन मास के पितृपक्षमें पितरोंको आशा लगी रहती है कि हमारे पुत्र - पौत्रादि हमें पिण्डदान तथा तिलांजलि प्रदानकर सन्तुष्ट करेंगे।
यही आशा लेकर वे पितृलोकसे पृथ्वीलोकपर आते हैं।
अतएव प्रत्येक हिन्दू सद्गृहस्थका धर्म है कि वह पितृपक्षमें अपने पितरोंके निमित्त श्राद्ध एवं तर्पण अवश्य करे तथा अपनी शक्तिके अनुसार फल - मूल जो भी सम्भव हो, पितरोंके निमित्त प्रदान करे।
पितृपक्ष पितरोंके लिये पर्वका समय है, अतएव इस पक्षमें श्राद्ध किया जाता है।
महालया ( पितृविसर्जनी अमावास्या ) -
आश्विन कृष्ण अमावास्याको पितृविसर्जनी अमावास्या अथवा महालया कहते हैं।
जो व्यक्ति पितृपक्षके पन्द्रह दिनोंतक श्राद्ध - तर्पण आदि नहीं करते हैं, वे अमावास्याको ही अपने पितरोंके निमित्त श्राद्धादि सम्पन्न करते हैं।
जिन पितरोंकी तिथि याद नहीं हो, उनके निमित्त श्राद्ध, तर्पण, दान आदि इसी अमावास्याको किया जाता है।
आजके दिन सभी पितरोंका विसर्जन होता है।
अमावास्याके दिन पितर अपने पुत्रादिके द्वारपर पिण्डदान एवं श्राद्धादिकी आशामें जाते हैं, यदि वहाँ उन्हें पिण्डदान या तिलांजलि आदि नहीं मिलती है तो वे शाप देकर चले जाते हैं।
अतएव एकदम श्राद्धका परित्याग न करे, पितरोंको सन्तुष्ट अवश्य करे।
एक दिन एक लड़का उनके पास आकर बोला की हमको संसार से विरक्ति होने लगी है।
उसने महात्मा से साधन पूछा तो उन्होंने कहां की भगवान का जो नाम तुम्हे पसंद हो।
उसको जपने लग जाओ और वैष्णवी आचार विचार का पालन करो।
उसको श्री सीताराम जी का रूप व नाम प्रिय था।
वह श्री सीताराम श्री सीताराम इस नाम का आश्रय लेकर भजन करने लगा।
कई दिनों तक भजन करता रहा और एक दिन जप करते करते उसको बहुत सी आवाजे आयी...!
जय हो जय हो।
अगले तीन चार दिन फिर कुछ आवाजे आयी.....!
बेटा अति सुंदर, जय हो।
उस बालक को लगा की लगता है कुछ गड़बड़ है।
वह बालक श्यामदास जी के पास आकर सारी बात बताकर बोला.....!
संत जी, क्या मुझसे कोई अपराध बन रहा है या किसी तरह की बीमारी है ?
श्यामदास जी ने ध्यान लगाकर देखा तो प्रसन्न होकर बोले :
1 सर्वलक्षणसंयुक्तैर्विद्याशीलगुणान्वितैः l
पुरुषत्रयविख्यातैः सर्व श्राद्धं प्रकल्पयेत् ॥
श्राद्धमें ब्राह्मण ;
समस्त लक्षणोंसे युक्त, विद्या, शील एवं सद्गुणोंसे सम्पन्न तथा तीन पुरुषों ( पीढ़ियों ) से [ अपने सच्चरित्र एवं विद्याके लिये ] विख्यात ब्राह्मणोंके द्वारा श्राद्ध सम्पन्न करे।
श्राद्धमें वर्जित ब्राह्मण ;
खञ्जओ वा यदि वा काणो दातुः प्रेष्योऽपि वा भवेत्।
हीनातिरिक्तगात्रो वा तमप्यपनयेद् बुधः ॥
लँगड़ा, काना, दाताका दास, अंगहीन एवं अधिक ;
अंगवाला ब्राह्मण श्राद्धमें निषिद्ध है।
न ब्राह्मणं परीक्षेत देवकार्येषु प्रायशः।
पितृकार्ये परीक्षेत ब्राह्मणं तु विशेषतः ॥
देवकार्य, पूजा - पाठ आदिमें ब्राह्मणोंकी परीक्षा न करे, किंतु पितृकार्यमें अवश्य करे।
श्राद्धकर्ताके लिये वर्जित ;
जो श्राद्ध करनेके अधिकारी हैं उन्हें पूरे पन्द्रह दिनोंतक क्षौरकर्म नहीं कराना चाहिये।
पूर्ण ब्रह्मचर्यका पालन करना चाहिये। प्रतिदिन स्नानके बाद तर्पण करना चाहिये।
तेल, उबटन आदिका उपयोग नहीं करना चाहिये।
दन्तधावनताम्बूले तैलाभ्यङ्गमभोजनम् ।
रत्यौषधं परान्नं च श्राद्धकृत्सप्त वर्जयेत् ॥ [ भाग १००
दातौन करना, पान खाना, तेल लगाना, भोजन करना, स्त्री - प्रसंग, औषध सेवन और दूसरेका अन्न - ये सात श्राद्धकर्ताकै लिये वर्जित हैं।
श्राद्धमें पवित्र ;
त्रीणि श्रद्धे पवित्राणि दौहित्रः कुतपस्तिलाः।
वर्याणि प्राह राजेन्द्र क्रोधोऽध्वगमनं त्वरा ॥
दौहित्र ( पुत्रीका पुत्र ), कुतप ( मध्याह्नका समय ) और तिल - ये तीन श्राद्धमें अत्यन्त पवित्र हैं और क्रोध, अध्वगमन ( श्राद्ध करके एक स्थानसे अन्यत्र दूसरे स्थानमें जाना ) एवं श्राद्ध करनेमें शीघ्रता - ये तीन वर्जित हैं। ( निर्णयसिन्धु )
श्राद्धमें अन्न ;
यदन्नं पुरुषोऽश्नाति तदन्नं पितृदेवताः।
अपक्वेनाथ पक्वेन तृप्तिं कुर्यात्सुतः पितुः ॥
मनुष्य जिस अन्नका स्वयं भोजन करता है, उसी अन्नसे पितर और देवता भी तृप्त होते हैं।
पकाया हुआ अथवा बिना पकाया हुआ अन्न प्रदान करके पुत्र अपने पितरोंको तृप्त करे।
पितृपक्षमें श्राद्ध ;
इस पक्षमें पिताकी तिथिको पार्वणश्राद्ध करना चाहिये - 'पर्वणि भवः पार्वणः।'
महालयमें एकोद्दिष्टश्राद्ध नहीं होता।
जो पार्वणश्राद्ध न कर सके, वह कम - से - कम पंचबलि निकालकर ब्राह्मण भोजन ही कराये, जिसका विधान नीचे लिखा जाता है-
बहुत - से व्यक्ति पार्वणश्राद्ध नहीं कराकर केवल ब्राह्मण - भोजन ही करा देते हैं, उसका नियम इस प्रकार है-
श्राद्धके निमित्त पाक तैयार होनेपर एक थालीमें पाँच जगह थोड़े - थोड़े सभी प्रकारके पाक परोसकर हाथमें जल, अक्षत, पुष्प, चन्दन लेकर निम्नलिखित संकल्प करे-
अद्यामुक गोत्र अमुक शर्मा ( वर्मा / गुप्तो वा ) अहममुकगोत्रस्य मम पितुः ( मातुः भ्रातुः पितामहस्य वा ) वार्षिक श्राद्धे ( महालयश्राद्धे ) कृतस्य पाकस्य शुद्धयर्थं बच्चा!
तेरे इस शरीर के और पूर्व के शरीरों के पितृगण विविध योनियों से मुक्त होकर भगवान के धाम को जा रहे है और वे ही तुम्हारी जय जय कार करते है।
कुछ और पितृगण बच गए है।
पांच दिनों तक तुम्हे इनकी आवाज आएगी।
इसके बाद बंद हो जाएगी।
आस्फोट यन्ति पितरो नृत्यन्ति च पितामहाः।
मद्वंशे वैष्णवो जातः स नस्त्राता भविष्यति।।
(पद्मपुराण)
पञ्चसूनाजनितदोषपरिहारार्थं च पञ्चबलिदानं करिष्ये।
पंचबलि - विधि :
( १ ) गोबलि ( पत्तेपर ) -
मण्डलके बाहर पश्चिमकी और निम्नलिखित मन्त्र पढ़ते हुए सव्य होकर गोबलि पत्तेपर दे-
ॐ सौरभेय्यः सर्वहिताः पवित्राः पुण्यराशयः ।
प्रतिगृह्णन्तु मे ग्रासं गावस्त्रैलोक्यमातरः ॥
इदं गोभ्यो न मम।
यदि मन्त्र स्मरण न रहे तो केवल 'गोभ्यो नमः' आदि नाम - मन्त्रसे बलि - प्रदान कर सकते हैं।
( २ ) श्वानबलि ( पत्तेपर ) -
जनेऊको कण्ठीकर निम्नलिखित मन्त्रसे कुत्तोंको बलि दे-
द्वौ श्वानौ श्यामशबलौ वैवस्वतकुलोद्भवी।
ताभ्यामन्नं प्रयच्छामि स्यातामेतावहिंसकौ ।।
इदं श्वभ्यां न मम।
( ३ ) काकबलि ( पृथ्वीपर ) -
अपसव्य होकर निम्नलिखित मन्त्र पढ़कर कौओंको भूमिपर अन्न दे-
ॐ ऐन्द्रवारुणवायव्या याम्या वै नैर्ऋतास्तथा।
वायसाः प्रतिगृह्णन्तु भूमौ पिण्डं मयोज्झितम् ॥
इदमन्नं वायसेभ्यो न मम।
( ४ ) देवादिबलि ( पत्तेपर ) सव्य होकर
निम्नलिखित मन्त्र पढ़कर देवता आदिके लिये अन्न दे-
ॐ देवा मनुष्याः पशवो वयांसि सिद्धाः सयक्षोरगदैत्यसङ्घाः ।
प्रेताः पिशाचास्तरवः समस्ता ये चान्नमिच्छन्ति मया प्रदत्तम् ॥
इदमन्नं देवादिभ्यो न मम।
जब किसी वंश मे वैष्णव उत्पन्न होता है।
( या वैष्णव दीक्षा ग्रहण करता है ) तो पितृ पितामह प्रसन्न होकर नृत्य करते है कि..
.
हमारे वंश में भगवान का भक्त उत्पन्न हुआ है,अब यह नाम जपेगा कथा सुनेगा संत सेवा करेगा। हमारा तो उद्धार निश्चित है..!!
जीवन का सबसे बड़ा अपराध , किसी की आंखों में आंसू , आपकी वज़ह से होना।
आपकी वजह से मुस्कराए कोई दूसरा!!
तो ये दुनिया की है, सबसे बड़ी पूजा!!
निस्वार्थ कर्म ही ईश्वर की सेवा है।
इस में ही आनंद मिलेगा आपको हमेशा चेहरे पर मुस्कुराहट रखें, आपका चेहरा खिल उठेगा।
किसी के बारे में ना बुरा सोचे, ना बुरा बोलें।
इससे आप को कोई फायदा नहीं होने वाला है...?
और सबसे ऊपर ईश्वर को हमेशा याद करते रहें, और उनको धन्यवाद दें की आपको जो ईश्वर ने दिया, वो कम नहीं है।
हम स्वार्थी ना बनें, अपने स्वार्थ के लिए किसी का दिल ना दुखाएं।
हमेशा दूसरों को साथ दें, पता नहीं ये पुण्य, ज़िन्दगी में कब आपका साथ दे जाए।
विष्णु भगवान से कर जोड़ प्रार्थना है कि आप और आपके परिवार के ऊपर अपनी कृपा बनाए रखें !
तीर्थ - तीर्थयते अनेन इति तीर्थ:
अर्थात्
जिससे प्राणिमात्र संसार - सागर से तर जाते हैं , वही तीर्थ कहा जाता है।
हम सभी जानते हैं कि युग - युग से प्रयाग की प्रसिद्धि एक तीर्थराज के रूप में भारत के धर्मप्राण जनमानस में व्याप्त रही है।
तीर्थराज के रूप में प्रयाग का वर्णन वेदों,पुराणों , उपनिषदों , रामायण , महाभारत , रघुवंश , रामचरितमानस आदि अनेक प्राचीन ग्रंथो में किया गया है।*
*पद्मपुराण में प्रयाग की महिमा*
*का उल्लेख करते हुए कहा गया है -*
*ब्राह्मी पुत्री त्रिपथगास्त्रिवेणी*
*समागमेन अक्षतयागमात्रान्।*
*यत्रप्लुतान् ब्रह्मपदं नयन्ति*
*स तीर्थराजो जयति प्रयाग:।।*
*अर्थ -
सरस्वती , यमुना और गंगा - ये तीन नदियां जहां डुबकी लगाने वाले मनुष्यों को,जो त्रिवेणी - संगम के संपर्क से अक्षत योगफल को प्राप्त हो चुके हैं, ब्रह्मलोक में पहुंचा देती है,उस तीर्थराज प्रयाग की जय हो।
( ५ ) पिपीलिकादिबलि ( पत्तेपर ) -
इसी प्रकार निम्नांकित मन्त्रसे चींटी आदिको बलि दे-
पिपीलिकाः
कीटपतङ्गकाद्या
बुभुक्षिताः
कर्मनिबन्धबद्धाः ।
तेषां हि तृप्त्यर्थमिदं मयान्नं
तेभ्यो विसृष्टं सुखिनो भवन्तु ॥
इदमन्नं पिपीलिकादिभ्यो न मम।
पंचबलि देनेके बाद एक थालीमें सभी रसोई परोसकर अपसव्य और दक्षिणाभिमुख होकर निम्न संकल्प करे-
अद्यामुक गोत्र अमुकशर्माऽहममुकगोत्रस्य मम पितुः ( पितामहस्य मातुः वा ) वार्षिकश्राद्धे महालय - श्राद्धे वा अक्षयतृप्त्यर्थमिदमन्नं तस्मै ( तस्यै वा ) स्वधा ।
उपर्युक्त संकल्प करनेके बाद ॐ इदमन्नम्', 'इमा आपः', 'इदमाज्यम्', 'इदं हविः' इस प्रकार बोलते हुए स्पर्श करे।
अन्न, जल, घी तथा पुनः अन्नको दाहिने हाथके अँगूठेसे पश्चात् दाहिने हाथमें जल, अक्षत आदि लेकर निम्न संकल्प करे-
ब्राह्मण-
भोजनका संकल्प- अद्यामुक गोत्र अमुको मम पितुः ( मातुः वा ) वार्षिकश्राद्धे यथा - संख्याकान् ब्राह्मणान् भोजयिष्ये ।
पंचबलि निकालकर कौआके निमित्त निकाला गया अन्न कौआको, कुत्ताका अन्न कुत्ताको और सब गायको देनेके बाद निम्नलिखित मन्त्रसे ब्राह्मणोंके पैर धोकर भोजन कराये।
यत् फलं कपिलादाने कार्तिक्यां ज्येष्ठपुष्करे।
तत्फलं पाण्डवश्रेष्ठ विप्राणां पादसेचने ।।
ब्राह्मण - भोजनके बाद उन्हें अन्न, वस्त्र और द्रव्य-
दक्षिणा देकर तिलक करके नमस्कार करे।
तत्पश्चात् नीचे लिखे वाक्य यजमान और ब्राह्मण दोनों बोलें-
यजमान - शेषान्नेन किं कर्तव्यम्। ( श्राद्धमें बचे अन्नका क्या करूँ? )
ब्राह्मण- इष्टैः सह भोक्तव्यम्। ( अपने इष्ट मित्रोंके साथ भोजन करें। )
इसके बाद अपने परिवारवालोंके साथ स्वयं भी भोजन करे तथा निम्न मन्त्रद्वारा भगवान्को नमस्कार करे-
प्रमादात् कुर्वतां कर्म प्रच्यवेताध्वरेषु यत्।
स्मरणादेव तद्विष्णोः सम्पूर्ण स्यादिति श्रुतिः ॥
ऋग्वेद में कहा गया है -*
*सितासिते सरिते यत्र संगते,*
*तत्राप्लुतासो दिवमुत्पतन्ति।*
*ये वै तन्वं विसृजन्ति धीरास्ते*
*जनासो अमृतत्वं भजन्ते।।*
*अर्थ -
जो मनुष्य श्वेत - श्याम दो नदियों के संगम स्थल पर स्नान करते हैं , वे स्वर्ग को प्राप्त करते हैं।
जो धीर मनुष्य वहां शरीर त्याग करते हैं , वे मोक्ष को प्राप्त करते हैं।*
*महाभारत के वनपर्व में उल्लेख है कि सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा जी की यज्ञभूमि प्रयाग ही रही है।*
*गंगायमुनयोर्मध्ये सङ्गमं लोकविश्रुतम्।*
*यत्त्रयजल भूतात्मा पूर्वमेव पितामह*
*प्रयागमिति विख्यातं तस्मात् भरत सत्तम।।*
*तीर्थराज प्रयाग की महिमा का गुणगान करती हुई पद्मपुराण की पंक्तियां मुखरित हो उठती हैं -*
*कलिन्दजा संगममाप्य यत्र।*
*प्रत्यागता स्वर्गधुनी धनोति।*
*अध्यात्मतापत्रितयं जनस्य,*
*स तीर्थराजो जयति प्रयाग:।।*
*अर्थ -
जहां आयी हुई गंगा कलिंदनंदिनी यमुना का संगम प्रकार मनुष्यों के तीन तापों - आध्यात्मिक , आधिदैविक और आधिभौतिक - का नाश करती है , उस तीर्थराज की जय हो।*
*भारत में तीर्थ तो बहुत से हैं , परंतु तीर्थराज तो एकमात्र प्रयाग ही है।
अत्यंत प्राचीन काल से यह शिक्षा का एक महत्वपूर्ण केंद्र भी था।
महर्षि भरद्वाज का गुरुकुल यहीं पर था।
वाल्मीकि रामायण के अयोध्या कांड में प्रयागगत भरद्वाज आश्रम का जैसा विस्तृत वर्णन है.....!
उसके अनुसार महर्षि भरद्वाज के आश्रम को एक विशाल आवासीय विश्वविद्यालय के रूप में समझा जा सकता है।
प्रभु श्री राम भी प्रयाग में भरद्वाज आश्रम में आए थे तथा महर्षि भारद्वाज ने राष्ट्रहित व संस्कृति की रक्षा हेतु उन्हें दक्षिण की ओर जाने का निर्देश दिया था।
राम वनगमन के कुछ समय बाद महाराज दशरथ का अंतिम संस्कार करने के बाद भरत , परिवारजन , पुरजन , गुरु वशिष्ठ एवं अन्य मंत्रियों के साथ श्री राम को अयोध्या वापस लाने के प्रयास में मार्ग में प्रयाग में महर्षि भरद्वाज के आश्रम गए थे।
प्रयागराज मेंअक्षयवट के विषय में मान्यता है कि यह अजर,अमर व चिरंतन है।
यह अनादि सनातन वृक्ष है।
अक्षयवट का पूजन श्रद्धालुजन एन मनवांछित फल प्राप्त करने के लिए तथा मोक्ष प्राप्ति के लिए करते रहे हैं।
सनकादि कुमारों के पूछने पर अक्षयवट*
*के संबंध में विष्णु भगवान जी कहते हैं -*
*प्रयागं वैष्णवं क्षेत्रं,वैकुंठादधिकं मम।*
*वृक्षोऽक्षयश्चतत्रैव,मदाचारी विराजते ।।*
*अर्थ -
प्रयाग मेरा क्षेत्र है,वह वैकुंठ से भी....!*
*अधिक है।
वहां अक्षयवट है,जो मेरा आश्रय है।*
ऐसे महिमामंडित प्रयागराज के बारे में तुलसीदास जी अयोध्या कांड में लिख ही डालते हैं -*
को कहि सकइ प्रयाग प्रभाऊ।*
अर्थात् प्रयागराज के माहात्म्य को कौन कह सकता है ?
ऐसे पावन प्रयागराज में पुण्यमय पूर्ण महाकुंभ लगा है।
उसमें डुबकी लगाकर अपने तन - मन दोनों को पवित्र कर परमात्मा से मिलन की अभीप्सा अपने अंतःकरण में जागृत करें।
( अगले अंक में प्रयागराज में महाकुंभ पर एक दृष्टि डाली जाएगी।)*
*|| तीर्थराज प्रयाग की जय हो ||*
हर हर महादेव जय मां अंबे मां !!!!! शुभमस्तु !!!
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