pina_AIA2RFAWACV3EAAAGAAFWDL7MB32NGQBAAAAAITRPPOY7UUAH2JDAY7B3SOAJVIBQYCPH6L2TONTSUO3YF3DHBLIZTASCHQA https://www.profitablecpmrate.com/gtfhp9z6u?key=af9a967ab51882fa8e8eec44994969ec Adhiyatmik Astro: July 2026

Adsence

Sunday, July 12, 2026

भगवान सूर्य के वंशज मनु और सूर्यवंश की गौरवशाली परंपरा :

भगवान सूर्य के वंशज मनु और सूर्यवंश की गौरवशाली परंपरा : 

भगवान सूर्य के वंशज मनु और सूर्यवंश की गौरवशाली परंपरा :

भगवान सूर्य के वंश होने से मनु सूर्यवंशी कहलाये ।

रघुवंशी :-  यह भारत का प्राचीन क्षत्रिय कुल है । 

जो भारतवर्ष के सभी क्षत्रीय कुलों में सर्वश्रेष्ठ क्षत्रियकुल माना जाता है ।

ऐतिहासिक दृष्टि से रघुकुल मर्यादा, सत्य, चरित्र, वचन पालन, त्याग, तप, ताप व शौर्य का प्रतीक रहा है ।

वैदिक एवं पुराणिक दृष्टि से भारतीय सनातन संस्कृति में भगवान सूर्य को प्रत्यक्ष देवता कहा गया है। वे समस्त जगत को प्रकाश, ऊर्जा और जीवन प्रदान करते हैं। 

वैदिक साहित्य में सूर्यदेव को सत्य, धर्म, तेज, तप, ज्ञान और जीवनशक्ति का प्रतीक माना गया है। वैदिक एवं पुराणिक परंपरा के अनुसार भगवान सूर्य के पुत्र विवस्वान से वैवस्वत मनु का जन्म हुआ। इसी कारण वैवस्वत मनु को सूर्यवंशी कहा जाता है। 

"संसार में कुछ लोग पुरुषार्थी होते हैं, और कुछ लोग आलसी। 

पुरुषार्थी लोग सदा अपनी क्षमताओं को बढ़ाते रहते हैं। 

उनमें कुछ नया - नया सीखने और नया - नया काम करने की तीव्र इच्छा होती है। 

ऐसे लोगों में आत्मविश्वास भी बहुत अधिक होता है। 

उनकी क्षमताएं और उनका आत्मविश्वास, ये दोनों मिलकर उनकी योग्यताओं का निर्धारण करते हैं।"



         

" आलसी लोग काम से बचने के बहाने ढूंढते रहते हैं। 

हमेशा अपना काम दूसरों पर डालने का प्रयास करते हैं। 

ऐसा स्वभाव अच्छा नहीं है। 

क्योंकि इससे उनकी कार्य क्षमता नहीं बढ़ती, और न ही आत्मविश्वास उत्पन्न होता है। 

ऐसे लोग जीवन में प्रायः असफल रहते हैं। 

निराश उदास और दुखी रहते हैं।"

+++ +++          

" ऐसी समस्याओं से बचने के लिए अपनी क्षमताओं को बढ़ाते रहें। 

अपने आत्मविश्वास को बढ़ाते रहें। 

इस से आपकी योग्यताएं बढ़ेंगी और आप कुछ अच्छे काम कर जाएंगे। 

आपका जीवन सुखमय एवं सफल हो जाएगा।"

मनु से प्रारंभ हुई यह वंश परंपरा आगे चलकर इक्ष्वाकु, सगर, भगीरथ, रघु, दशरथ और मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम तक पहुँची। 

इस लिए इस वंश को भारतीय इतिहास और धर्मपरंपरा में अत्यंत गौरवशाली स्थान प्राप्त है।

+++ +++

वैदिक साहित्य में सूर्य का महत्व :

ऋषियों ने वेदों में सूर्य को संपूर्ण सृष्टि का जीवनदाता कहा है। सूर्य के बिना पृथ्वी पर जीवन की कल्पना भी संभव नहीं है। 

वेदों में सूर्य को अंधकार का नाश करने वाला, सत्य का प्रकाश फैलाने वाला और समस्त प्राणियों का रक्षक बताया गया है। 

इसी कारण सनातन धर्म में प्रतिदिन सूर्य को अर्घ्य देने की परंपरा आज भी प्रचलित है।

+++ +++

वैवस्वत मनु कौन थे?

पुराणों के अनुसार वर्तमान मन्वंतर के मनु का नाम वैवस्वत मनु है। "वैवस्वत" का अर्थ है—

विवस्वान ( सूर्यदेव ) के पुत्र। 

इसी कारण उन्हें सूर्यवंशी कहा जाता है। 

मनु को मानव समाज का आदिपुरुष, धर्मव्यवस्था का प्रवर्तक और आदर्श राजा माना गया है। महाप्रलय के बाद उन्होंने पुनः मानव सभ्यता की स्थापना की और धर्म, न्याय तथा सामाजिक व्यवस्था को संगठित किया।

+++ ++++

भारतीय धर्मग्रंथों में मनु का अत्यंत सम्मान है। 

मनु ने समाज को धर्म, कर्तव्य, न्याय और जीवन के अनेक सिद्धांत प्रदान किए। 

इसी लिए उन्हें मानव सभ्यता का प्रथम विधाता भी कहा जाता है।

+++ ++++

सूर्यवंश की स्थापना :

वैवस्वत मनु के पुत्र महाराज इक्ष्वाकु ने अयोध्या में सूर्यवंश की राजपरंपरा को स्थापित किया। 

इक्ष्वाकु के नाम से ही इक्ष्वाकु वंश प्रसिद्ध हुआ, जिसे आगे चलकर सूर्यवंश के नाम से जाना गया। इस वंश के राजाओं ने धर्म, सत्य, न्याय और प्रजावत्सलता को शासन का आधार बनाया।

सूर्यवंश के अनेक महान राजाओं ने भारतभूमि की सेवा की। 

इन में महाराज सगर, महाराज अंशुमान, महाराज दिलीप, महाराज भगीरथ, महाराज रघु, महाराज अज और महाराज दशरथ प्रमुख हैं। 

प्रत्येक राजा ने अपने जीवन से धर्म और आदर्श शासन का उदाहरण प्रस्तुत किया।




Hari Darshan Pure Kesar Chandan Tika | Traditional Sandalwood Kesar Tilak for Puja Havan & Daily Rituals | Long-Lasting Fragrance & Smooth Application for a Divine Experience Pack of 6 (40gm Each)

Visit the Hari Darshan Store https://link.amazon/B0hbwEQ5E

{  इस वस्तु के बारे में :

  • हरि दर्शन केसर चंदन टीका चंदन और केसर का एक पवित्र मिश्रण है, जिसका उपयोग परंपरागत रूप से पूजा, हवन और अनुष्ठानों में दिव्य आशीर्वाद प्राप्त करने, आध्यात्मिक ऊर्जा को बढ़ाने और सकारात्मकता को बढ़ावा देने के लिए किया जाता है।
  • माथे पर इस पारंपरिक केसर चंदन का टीका लगाने से एकाग्रता बढ़ाने, सिरदर्द से राहत पाने और तनाव कम करने में मदद मिलती है, जिससे यह ध्यान, मंदिर दर्शन और दैनिक धार्मिक अनुष्ठानों के लिए आदर्श बन जाता है।
  • पूजा के लिए चंदन का टीका अपने प्राकृतिक शीतलता गुणों के लिए जाना जाता है, जो मन और शरीर पर सुखदायक प्रभाव प्रदान करता है और हिंदू परंपराओं में ज्ञान, भक्ति और पवित्रता का प्रतीक है।
  • चंदन केसर का यह टीका शुद्ध केसर और चंदन के सार से समृद्ध है, जो एक दीर्घकालिक सुगंध प्रदान करता है जो आध्यात्मिक अनुष्ठानों को बढ़ाता है और प्रार्थना के दौरान एक दिव्य आभा का निर्माण करता है।
  • सदियों से पारंपरिक समारोहों में इस्तेमाल होने वाला यह केसर चंदन टीका आभा को शुद्ध करता है, मानसिक स्पष्टता लाता है और सांस्कृतिक और धार्मिक अवसरों पर सम्मान और श्रद्धा का प्रतीक है। }


महाराज भगीरथ का महान तप :

सूर्यवंश के राजा भगीरथ का नाम भारतीय इतिहास में अमर है। 

उन्होंने अपने पूर्वजों के उद्धार के लिए कठोर तप किया और माता गंगा को स्वर्ग से पृथ्वी पर लाने का महान कार्य किया। 

भगवान शिव ने अपनी जटाओं में गंगा को धारण कर पृथ्वी पर उनके अवतरण को संभव बनाया। इसी कारण आज भी किसी कठिन और महान प्रयास को "भगीरथ प्रयत्न" कहा जाता है।

+++ +++

रघुवंश की उत्पत्ति :

सूर्यवंश में आगे चलकर महाराज रघु हुए। 

वे महान पराक्रमी, सत्यवादी, दानवीर और धर्मनिष्ठ राजा थे। 

उनके अद्वितीय चरित्र के कारण उनके वंशज रघुवंशी कहलाए। 

महाकवि कालिदास ने अपने प्रसिद्ध महाकाव्य "रघुवंश" में इस वंश की महिमा का अत्यंत सुंदर वर्णन किया है।

रघुवंश केवल एक राजवंश नहीं था, बल्कि आदर्श शासन, प्रजावत्सलता, न्याय और धर्मपालन की जीवंत परंपरा था।

+++ +++

भगवान श्रीराम और रघुवंश :

महाराज दशरथ के पुत्र भगवान श्रीराम का जन्म इसी रघुवंश में हुआ। 

भगवान श्रीराम ने अपने जीवन में सत्य, मर्यादा, त्याग, करुणा, धैर्य और धर्म का सर्वोच्च आदर्श प्रस्तुत किया। 

उन्होंने पिता की आज्ञा का पालन करते हुए वनवास स्वीकार किया, राक्षसराज रावण का वध किया और धर्म की पुनः स्थापना की।

इसी कारण भगवान श्रीराम को "रघुनाथ", "रघुपति", "राघव" और "रघुनंदन" जैसे नामों से भी संबोधित किया जाता है।

+++ +++

सूर्यवंश की विशेषताएँ :

सूर्यवंश की सबसे बड़ी विशेषता थी—

धर्म के लिए समर्पण। इस वंश के राजाओं ने सदैव सत्य, न्याय और प्रजा के कल्याण को सर्वोच्च स्थान दिया। 

उन्होंने कभी भी व्यक्तिगत स्वार्थ को धर्म से ऊपर नहीं रखा।

भारतीय संस्कृति में सूर्यवंश आदर्श राजधर्म, त्याग, पराक्रम, मर्यादा और राष्ट्रसेवा का प्रतीक माना जाता है। 

इसी कारण आज भी सूर्यवंश और रघुवंश का नाम अत्यंत श्रद्धा और सम्मान के साथ लिया जाता है।

+++ ++++

निष्कर्ष :

वैदिक एवं पुराणिक परंपरा के अनुसार भगवान सूर्य से प्रारंभ हुई यह गौरवशाली वंशपरंपरा वैवस्वत मनु, इक्ष्वाकु, रघु और भगवान श्रीराम तक पहुँचती है। 

इस वंश ने भारतीय संस्कृति को धर्म, सत्य, न्याय, त्याग, मर्यादा और आदर्श शासन की अमूल्य शिक्षा दी। 

सूर्यवंश का इतिहास केवल राजाओं की वंशावली नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता के नैतिक और आध्यात्मिक आदर्शों की अमर गाथा है।




ARKAM Pearl Mala/Cultured Pearl Rosary/Pearl Mala Original/Moti Mala/Pure Moti Mala/Moti Mala Original (Size: 7mm, Length: 36 inches, Beads: 108+1)

Visit the ARKAM Store  https://link.amazon/B0dwE5YkZ

उच्च गुणवत्ता वाले 108+1 असली मोतियों की माला हाथ से बनाई गई है।

  • सामग्री: मोती, मनके का आकार: 7 मिमी, मनकों की संख्या: 108+1
  • रंग: सफेद, आकार: अंडाकार, लंबाई: 36 इंच
  • पैकेज में शामिल: 1 मोती की माला
  • अस्वीकरण: मोती एक प्राकृतिक उत्पाद होने के कारण, इसके आकार, आकृति और रंग में भिन्नता होना स्वाभाविक है। }


नोट: इस लेख में वर्णित वंशावली और विवरण वैदिक एवं पुराणिक परंपराओं पर आधारित हैं। 

विभिन्न ग्रंथों में कुछ विवरणों में भिन्नताएँ मिल सकती हैं, इस लिए शास्त्रीय अध्ययन करते समय मूल ग्रंथों का भी संदर्भ लेना उचित है।

+++ +++

मैं इसमें निम्नलिखित शास्त्रीय प्रमाण शामिल करूँगा:

ऋग्वेद

शतपथ ब्राह्मण

विष्णु पुराण

भागवत पुराण

वाल्मीकि रामायण

मनुस्मृति

रघुवंश 

+++ ++++

इन प्रमाणों के आधार पर मैं क्रमवार सिद्ध करूँगा:

भगवान सूर्य ( विवस्वान ) का शास्त्रीय स्वरूप।

वैवस्वत मनु सूर्यपुत्र क्यों कहलाए।

इक्ष्वाकु और सूर्यवंश की स्थापना।

रघुवंश कैसे बना।

भगवान श्रीराम का रघुवंश में अवतार।

संबंधित संस्कृत श्लोक, उनका सरल हिन्दी अर्थ और संदर्भ।

मन का शांत रहना भाग्य, मन का वश में रहना सौभाग्य, मन से किसी को याद करना अहोभाग्य और मन से कोई याद करे वो है "परम सौभाग्य। 

दूसरों के दिलों में आप जो स्थान रखते है वही आपकी वास्तविक दौलत है ।

हम कड़वी गोली को जल्दी से गटक जाते हैं परंतु मीठी चॉकलेट को खूब चबा कर खाते हैं इसी तरह जीवन में बुरी यादों को जल्दी भूलें और अच्छी यादों का खूब आनंद उठायें ।

वाणी और विचार ये दोनों प्रोडक्ट हमारी खुद की कंपनी के हैं जितनी क्वालिटी और गुणवत्ता अच्छी रखेंगे उतनी कीमत ज्यादा मिलेगी। 

कामयाबी तक जाने वाले रास्ते सीधे नहीं होते कामयाबी मिलने के बाद सभी रास्ते सीधे हो जाते हैं ।हीरे को परखना है तो अँधेरे का इंतजार करो धूप में तो काँच के टुकड़े भी चमकने लगते हैं।

+++ ++++

गवान सूर्य के वंशज मनु और सूर्यवंश की गौरवशाली परंपरा :

वैदिक एवं पुराणिक परंपरा के अनुसार भगवान सूर्यदेव को सृष्टि के पालन - पोषण, प्रकाश, ऊर्जा और जीवन का आधार माना गया है। 

भारतीय धर्मग्रंथों में सूर्यदेव केवल एक देवता ही नहीं, बल्कि धर्म, सत्य, पराक्रम और न्याय के प्रतीक भी हैं। 

पुराणों और प्राचीन वंशावलियों के अनुसार वैवस्वत मनु भगवान सूर्य के पुत्र विवस्वान ( सूर्य ) के पुत्र माने गए हैं। 

इसी कारण वैवस्वत मनु को सूर्यवंशी कहा जाता है। 

मनु को मानव समाज का प्रथम विधाता, धर्मशास्त्रों का प्रवर्तक तथा आदर्श राजा के रूप में भी सम्मान प्राप्त है।

मान्यता है कि महाप्रलय के पश्चात वैवस्वत मनु ने पुनः मानव सभ्यता की स्थापना की। 

उन्होंने धर्म, न्याय, सामाजिक व्यवस्था और राजधर्म की मर्यादाओं का पालन करते हुए एक आदर्श शासन व्यवस्था का निर्माण किया। 

इसी कारण भारतीय संस्कृति में मनु का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है।

+++ ++++

मनु के वंश से आगे चलकर अनेक प्रतापी और धर्मनिष्ठ राजाओं का जन्म हुआ। 

इस वंश में महाराज इक्ष्वाकु का विशेष स्थान है, जिन्होंने अयोध्या में सूर्यवंश की राजपरंपरा को स्थापित किया। 

इक्ष्वाकु से प्रारंभ होकर यह वंश अनेक युगों तक भारतभूमि पर धर्म, सत्य और लोककल्याण का संदेश देता रहा।

इसी महान परंपरा में आगे चलकर महाराज दिलीप, महाराज भगीरथ, महाराज सगर, महाराज अंशुमान, महाराज रघु, महाराज अज, महाराज दशरथ और अंततः मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम का अवतरण हुआ। 

भगवान श्रीराम के कारण यह वंश विश्वभर में आदर्श शासन, सत्यनिष्ठा, त्याग, करुणा और धर्मपालन का सर्वोच्च प्रतीक माना जाता है।

रघुवंश वास्तव में सूर्यवंश की ही एक प्रसिद्ध शाखा है। 

महाराज रघु के अद्वितीय पराक्रम, दानशीलता और धर्मनिष्ठा के कारण उनके वंशज रघुवंशी कहलाए। 

महाकवि कालिदास ने भी अपने प्रसिद्ध महाकाव्य 'रघुवंश' में इस गौरवशाली वंश की महिमा का अत्यंत सुंदर वर्णन किया है। 

भगवान श्रीराम भी इसी रघुवंश में जन्म लेने के कारण रघुनंदन, राघव और रघुपति जैसे नामों से विख्यात हुए।

+++ ++++

भारतीय परंपरा में सूर्यवंश को आदर्श राजधर्म, सत्य, न्याय, शौर्य, त्याग और प्रजावत्सलता का प्रतीक माना गया है। 

इस वंश के राजाओं ने सदैव धर्म की रक्षा, प्रजा के कल्याण और राष्ट्र की उन्नति को सर्वोच्च महत्व दिया। 

इसी कारण सूर्यवंश का नाम भारतीय इतिहास, संस्कृति और धार्मिक साहित्य में अत्यंत सम्मान के साथ लिया जाता है।

यह ध्यान देने योग्य है कि "सभी क्षत्रिय कुलों में सर्वश्रेष्ठ" जैसी बातें मुख्यतः पारंपरिक धार्मिक मान्यताओं और वंश - गौरव के वर्णनों का हिस्सा हैं। 

भारतीय इतिहास में सूर्यवंश, चंद्रवंश तथा अन्य अनेक राजवंशों का भी अपना - अपना महत्वपूर्ण स्थान और गौरव रहा है। 

इस लिए इस विषय को श्रद्धा और ऐतिहासिक संतुलन के साथ समझना चाहिए।

सूर्यवंश की कथा केवल एक राजवंश का इतिहास नहीं है, बल्कि सत्य, धर्म, मर्यादा, त्याग, पराक्रम और लोककल्याण की प्रेरणादायक परंपरा है। 

भगवान सूर्य से प्रारंभ होकर वैवस्वत मनु, इक्ष्वाकु, महाराज रघु और भगवान श्रीराम तक यह वंश भारतीय संस्कृति के आदर्शों का प्रतिनिधित्व करता है। 

यही कारण है कि आज भी सूर्यवंश और रघुवंश का नाम श्रद्धा, सम्मान और गौरव के साथ लिया जाता है तथा उनकी जीवनगाथाएँ समाज को धर्म और कर्तव्य के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती हैं।

हर हर महादेव जय मां अंबे मां !!!!! शुभमस्तु !!! 

+++ ++++

🙏हर हर महादेव हर...!!

जय माँ अंबे ...!!!🙏🙏

पंडित राज्यगुरु प्रभुलाल पी. वोरिया क्षत्रिय राजपूत जड़ेजा कुल गुर: -

श्री सरस्वति ज्योतिष कार्यालय

PROFESSIONAL ASTROLOGER EXPERT IN:- 

-: 1987 YEARS ASTROLOGY EXPERIENCE :-

(2 Gold Medalist in Astrology & Vastu Science) 

" Opp. Shri Satvara vidhyarthi bhuvn,

" Shri Aalbai Niwas "

Shri Maha Prabhuji bethak Road,

JAM KHAMBHALIYA - 361305 (GUJRAT )

सेल नंबर: . + 91- 9427236337 / + 91- 9426633096  ( GUJARAT )

Vist us at: www.sarswatijyotish.com

Skype : astrologer85

Email: prabhurajyguru@gmail.com

Email: astrologer.voriya@gmail.com

आप इसी नंबर पर संपर्क/सन्देश करें...धन्यवाद.. 

नोट ये मेरा शोख नही हे मेरा जॉब हे कृप्या आप मुक्त सेवा के लिए कष्ट ना दे .....

जय द्वारकाधीश....

जय जय परशुरामजी...🙏🙏🙏

+++ ++++

Wednesday, July 8, 2026

मंदिर निर्माण का फल व उपाई :

जन्मकुंडली , प्रश्न कुंडली में मंदिर निर्माण का फल  व उपाई 

मंदिर का निर्माण क्यों ?

श्री वैदिक ज्योतिषशास्त्रविद्या , श्री खगोड़शास्त्रविद्या श्री ऋग्वेद अनुसार जन्मकुंडली , प्रश्न कुंडली में मंदिर निर्माण का फल व उपाई

व्यक्ति किसी भी देश, संप्रदाय या वर्ग का क्यों न हो, दुनिया के समस्त प्राणियों में सिर्फ मनुष्य ने ही मंदिर ( धर्म - स्थलों ) का निर्माण किया है। 






SEPARATE WAY Shree Yantra Copper with 24k Gold Plating Yantra for Wealth, Prosperity (11 Inch X 11 Inch X 1.5 Inch)

Visit the SEPARATE WAY Store   https://amzn.to/3Mo2JUP



भले ही अलग - अलग संप्रदाय के लोग अपने - अपने ढंग से, अलग - अलग तरह के मंदिर बनाकर उन्हें गुरुद्वारा, गिरजाघर ( चर्च ), मस्जिद आदि अलग - अलग नामों से पुकारते हों, किंतु इन्हें बनाने का उद्देश्य है कि इन्हें देखकर मनुष्य को परमात्मा का स्मरण हो, जहां पर परमात्मा की शरण प्राप्त करने का मार्ग मिले, जहां दुनियादारी के झंझटों को भूलकर एकाग्र और ध्यान - मग्न होकर मन को शांति मिले। 


+++ +++

उस पवित्र वातावरण में मन को निर्विकार कर प्रभु भक्ति में लीन किया जा सके।

वास्तव में देखा जाए तो मंदिर एक ऐसा स्थल होता है, जहां आध्यात्मिक और धार्मिक वातावरण होता है तथा देवपूजा उसका लक्ष्य होता है। 

यहां आप अकेले या अन्य व्यक्तियों की उपस्थिति में भी बैठकर शांत मन से जाप, पूजा - पाठ, आरती, भजन, मंत्र पाठ, ध्यान आदि कर सकते हैं। 

+++ +++

ऐसे धूप - दीप आदि सुगंधित द्रव्यों के कारण मंदिर के चारों ओर दिव्य शक्ति का संचार रहता है, 

जिसके कारण भूत-प्रेत और विषाणुयुक्त कीटाणुओं की शक्ति क्षीण होती है। 

माहौल में आपके मन की भाव - दशा प्रभु की भक्ति, पूजा, प्रार्थना उपासना के अनुकूल होती है, जिससे इन कर्म - कांडों को पूरा करने का आपको शारीरिक और मानसिक लाभ मिलता है। 
+++ +++
अभीष्ट फल की प्राप्ति होती है। 

इस में कोई दो मत नहीं कि मंदिर जाने वालों में वास्तविक भक्त कम और याचक यानी भगवान से कुछ न कुछ मांगने वाले ज्यादा होते हैं। 

कुछ मन्नत मांगने के लिए मंदिर पहुंचते हैं तो कुछ मांगी हुई मन्नत पूरी होने पर अपना वायदा पूरा करने के लिए पहुंचते हैं। 

मतलब यह कि भगवान को भी मंदिर में रिश्वत का लालच देने का प्रचलन आम बन गया है। 

यदि हम कुछ मांगने के लिए ही मंदिर जाते हैं तो फिर हम मंदिर नहीं, किसी दुकान पर जाते हैं । 

जबकि वास्तविक, सच्चा भक्त भक्ति भाव, अहोभाव और प्रभु के प्रति तादात्म्य भाव लेकर ही मंदिर जाता है। 

मंदिर निर्माण के योग : 

धर्म , पुण्य और यश की वृद्धि  
कुल और वंश का उत्थान 
पितृ ओ की कृपा प्राप्ति 
आर्थिक समृद्धि के संकेत 
जीवन में स्थिरता और शांति 
मोक्ष मार्ग की प्राप्ति

+++ +++

एक बार, जगद्गुरु शंकराचार्य से नगर सेठ माणिक ने पूछा-"आचार्यवर! 

आप तो वेदांत के समर्थक हैं। 

भगवान् को निराकार सर्वव्यापी मानते हैं, फिर मंदिरों की प्रदर्शनात्मक मूर्तिपूजा परक प्रक्रिया का समर्थन क्यों करते हैं ?

" आचार्य बोले-" वत्स! उस दिव्य सर्वव्यापी चेतना का बोध सबको अनायास नहीं होता। 

मंदिरों में प्रात :- संध्या संधिकाल से, शंख - घंटों के नाद के साथ दूर - दूर तक उपासना के समय का बोध कराया जाता है। 

घर - घर उपासना के योग्य उपयुक्त स्थल नहीं मिलते, मंदिर के संस्कारित वातावरण में कोई भी 

जाकर उपासना कर सकता है। 

+++ +++

नैतिकता, सदाचार और श्रद्धा के दर्रों के रूप में देवालय अत्यंत उपयोगी हैं। 

जनसाधारण के लिए यह अत्यावश्यक है।"

मंदिर के ऊपर गुंबद का निर्माण क्यों ?

मंदिर के ऊपर गुंबद बनाना ध्वनि सिद्धांत और वास्तुकला की दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण है साधक देव प्रतिमाओं के सामने बैठकर पूजा - अर्चन में जो मंत्र जाप करते हैं, उनकी ध्वनि मंदिर के गुंबद से टकराकर घूमती है और ऊपर की ओर गुंबद के संकरे होते जाने के कारण केंद्रीभूत हो जाती है। 

गुंबद का सबसे ऊपर का मध्य भाग जहां कलश - त्रिशूल आदि लगा होता है। 

वह अत्यंत संकरा और बिंदु रूप होता है। 

उपाई :

मंदिर निर्माण के संकल्प ले 
वास्तु शास्त्र विद्या अनुसार भूमि चयन करे 
नित्य हवन और वेद मंत्र का जाप करे 
दान , सेवा और ब्राह्मण की पूजन करे 
गौ सेवा और वृक्ष रोपण करे ।

+++ +++
यह स्थान इस प्रकार बनाया जाता है कि देव प्रतिमा का सहस्रार स्थान और गुंबद का विंदु स्थान एक रेखा में रहे।

मंत्र शाश्वत शब्द ब्रह्म है और उसमें सभी प्रकार की ईश्वरीय शक्ति समन्वित है। 

अतः गुंबद से टकराकर जब मंत्र ध्वनि देवता के सहस्रार से टकराती है, तो देव प्रतिमाएं जाग्रत हो जाती हैं और साधक को उसकी भावना के अनुसार फल प्रदान करती हैं।

जिस प्रकार का मंत्र बोला जाता है, वह देव प्रतिमा को उसी रूप में जाग्रत करता है अतः देव प्रतिमा से मिलने वाला फल मंत्र की भावना के अनुकूल ही होता है। 

ऐसे स्थल निरंतर पूजा - साधना से सिद्ध स्थल हो जाते हैं और वहां जाकर साधना करने पर तुरंत फल मिलता है। 
+++ +++
इस लिए ये बहुत प्रसिद्ध भी हो जाते हैं। 

गुंबद एक अर्थ में हमारे ऋषि - मुनियों द्वारा खोजे गए पिरामिड संबंधी ज्ञान के प्रतिरूप हैं। 

पिरामिड सिद्धांत के गुंबद के रूप में एक ऐसे शक्ति क्षेत्र का निर्माण किया जाता है जहां रखी वस्तुएं बहुत काल तक पृथ्वी के बाह्य प्रभाव से मुक्त होकर सुरक्षित रही आती हैं। 

मिश्र के पिरामिडों में हजारों वर्ष से रखी मृत देह और अन्य वस्तुओं का आज भी सुरक्षित मिलना तथा एक विशेष प्रकार की चुंबकीय शक्ति का वहां मिलना इन्हीं तथ्यों को प्रकट करता है। 

इस रूप में मंदिर के गुंबदों का संबंध देव - प्रतिमाओं, साधकों और उनकी भावनाओं की सुरक्षा एवं पूर्ति से स्पष्ट प्रतीत होता है।





|| करुणा ||


करुणा का अर्थ है दूसरों के दुख को समझना और उस दुख को दूर करने के लिए मदद करने की तीव्र इच्छा होना। 

यह केवल सहानुभूति या दया से बढ़कर है, क्योंकि यह सक्रिय रूप से दूसरों की पीड़ा को कम करने के लिए प्रेरित करती है। 

यह एक ऐसी भावना है जो प्रेम, दया, अहिंसा और शांति जैसे गुणों को सशक्त बनाती है।

करुणा केवल भावना नहीं,यह आत्मा की मूल गंध, उसका प्राकृतिक प्रकाश है।

जहाँ करुणा है, वहाँ अहंकार नहीं;जहाँ करुणा है, वहाँ हिंसा नहीं;और जहाँ करुणा है, वहीं ईश्वर का निवास है।
+++ +++
करुणा हमें दूसरों की पीड़ा महसूस कराती है,पर उससे भी गहरा यह है कि करुणा हमें हमारी अपनी आत्मा से जोड़ती है। 

एक करुणामय व्यक्ति जहाँ जाता है,वहाँ शांति फैलती है, संतोष लता है,और लोगों के हृदय हल्के हो जाते हैं।

करुणा के तीन रूप :- विचारों में करुणा, किसी के लिए बुरा न सोचना वाणी में करुणा, किसी को चोट पहुँचाए बिना बोलना कर्म में करुणा,बिना अपेक्षा सहायता करना।

करुणा वह शक्ति है - जो कठोर से कठोर हृदय को भी पिघला देती है।

यह संघर्ष नहीं मिटाती,यह संघर्ष को साधना में बदल देती है।

उपनिषद् करुणा को धर्म का हृदय बताते हैं-
दया धर्म का मूलम्।ये धर्मों का आधार है।

       || महाकाल ||
+++ +++

|| किशोरी जी की अद्भूत कृपा ||


बरसाना में चेतन्य महाप्रभु के छःशिष्यों में से एक हैं जीव गोस्वामी। 

एक बार श्री रूप गोस्वामी भ्रमण करते - करते अपने चेले,जीव गोस्वामीजी के यहाँ बरसाना आए। 

जीव गोस्वामीजी ठहरे फक्कड़ साधू | 

फक्कड़ साधू को जो मिल जाये वो ही खाले, जो मिल जाये वो ही पी ले।

आज उनके गुरु आए तो उनके मन में भाव आया कि मैं तो रोज सूखी रोटी, पानी में भिगोकर खा लेता हूं। 

मेरे गुरु आये हैं क्या खिलाऊँ ?

एक बार अपनी कुटिया में देखा तो किंचित तीन दिन पुरानी रोटी जो बिल्कुल कठोर हो चुकी रखी थी। 
मैं साधू पानी में गला - गलाकर खा लूं।

+++ +++

यद्यपि मेरे गुरु साधुता की परम स्थिति को प्राप्त कर चुके हैं फिर भी मेरे मन के आनन्द के लिए कैसे मेरा मन संतुष्ट होगा? 

एक क्षण के भक्त के मन में संकल्प आया कि अगर समय होता तो किसी बृजवासी के घर चला जाता। 
दूध मांग लाता, चावल मांग लाता। 

मेरे गुरु पधारे जो देह के सम्बंध में मेरे चाचा भी लगते हैं। 

लेकिन भाव साम्रज्य में प्रवेश कराने वाले मेरे गुरु भी तो हैं। उनको खीर खिला देता।

रूप गोस्वामीने आकर कहा जीव भूख लगी है तो जीव गोस्वामी उन सूखी रोटीयो को अपने गुरु को दे रहा है। 

+++ +++

अँधेरा हो रहा है। 

जीव गोस्वामी की आँखोंमें अश्रु आ रहे हैं और रुप गोस्वामीजी ने कहा तू क्यों रो रहा है |

हम तो साधू हैं ना, जो मिल जाय वही खा लेते हैं। 

नहीं - नहीं मैं खा लूंगा। 

जीव ने कहा, नहीं बाबा! 

मेरा मन नहीं मान रहा। 

आपकी यदि कोई पूर्व सूचना होती तो मेरे मन में कुछ था। 

+++ +++

यह चर्चा हो ही रही थी कि कोई अर्द्धरात्रि में दरवाजा खटखटाता है। 

ज्यो ही दरवाजा खटखटाया तो जीव गोस्वामीजी ने दरवाजा खोला। 

एक किशोरी खड़ी हुई है 8 -10 वर्ष की हाथ में कटोरा है। 

कहा, बाबा! 

मेरी माँने खीर बनाई है और कहा है  जाओ बाबा को दे आओ। 

जीव गोस्वामी ने उस खीर के कटोरे को ले जाकर रुप गोस्वामीजी के पास रख दिया। 

बोले बाबा पाओ।

ज्यों ही रूप गोस्वामीजीने उस खीर को स्पर्श किया उनका हाथ कांपने लगा।
+++ ++++
जीव गोस्वामीको लगा बाबा का हाथ कांप रहा है। 

पूछा बाबा! 

क्या कोई अपराध बन गया है। 

रूप गोस्वामी जी ने पूछा, जीव! आधी रात को यह खीर कौन लाया ?

बाबा पड़ोस में एक कन्या है मैं जानता हूं उसे। 

वो लेके आई है। 

नहीं जीव इस खीर को मैने जैसे ही चखके देखा और मेरे में ऐसे रोमांच हो गया।

नहीं जीव! 

तू पता कर यह कन्या मुझे मेरे किशोरीजी के होने का अहसास दिला रही है। 

नहीं बाबा ! 

+++ +++

वह कन्या पास की है, मैं जानता हूं उसको।

अर्ध रात्रिमें दोनों उसके घर गये और दरवाजा खटखटाया। 

अंदर से उस कन्या की माँ निकलकर बाहर आई। 

जीव गोस्वामीजी ने पूछा आपको कष्ट दिया, परन्तु आपकी लड़की कहां है।

उस महिला ने कहा, का बात हो गई बाबा ? 

आपकी लड़की है कहाँ ? 

वो तो उसके ननिहाल गई है गोवेर्धन, 15 दिन हो गए हैं। 

+++ +++

रूप गोस्वामीजी तो मूर्छित हो गए।

जीव गोस्वामीजी ने पैर पकडे और जैसे - तैसे श्रीजी के मंदिर की सीढ़िया चढ़ने लगे। 

जैसे एक क्षणमें ही चढ़ जायें। 

लंबे - लंबे पग भरते हुए मंदिर पहुचे। 

वहां श्री गोसाईजी से पूछा, बाबा! 

एक बात बताओ आज क्या भोग लगाया था श्रीजी श्यामा प्यारी को। 

श्रीजीव गोस्वामी को गोसांईजी जानते थे। 

+++ +++

श्री गोसाईंजी ने कहा क्या बात है बाबा...? 

श्रीजीव ने कहा क्या भोग लगाया था ? 

गोसाईजी ने कहा, आज श्रीजी को खीर का भोग लगाया था।

रूप गोस्वामी तो श्रीराधे श्रीराधे कहने लगे। 

उन्होंने गोसाईजी से कहा बाबा! 

एक निवेदन और है आपसे। 

यद्दपि यह मंदिर की परंपरा के विरुद्ध है कि एक बार जब श्रीजी को शयन करा दिया जाये तो उनकी लीला में जाना अपराध है। 

{ प्रिया प्रियतम जब विराज रहे हों तो नित्य लीला है उनकी।

अपराध है फिर भी आप एक बार यह बता दीजिये कि जिस पात्रमें भोग लगाया था वह पात्र रखो है के नहीं रखो है। }

गोसाईजी मंदिर के पट खोलते हैं और देखते हैं कि वह पात्र नहीं है वहां पर। 

गोसांईजी बाहर आते हैं और कहते हैं बाबा वह पात्र नहीं है वहां पर! न जाने का बात है गई है...?

रूप गोस्वामीजीने अपना दुप्पटा हटाया और वह चाँदी का पात्र दिखाया, बाबा! यह पात्र तो नहीं है | 

गोसांईजी ने कहा हां बाबा यही पात्र तो है।

रूप गोस्वामीजी ने कहा, श्रीराधा रानी 300 सीढ़ी उतरकर मुझे खीर खिलाने आई। 

किशोरी पधारी थी, राधारानी आई थी। 

+++
+++

उस खीर को मुख पर रगड़ लिया सब साधु संतो को बांटते हुए श्रीराधे श्रीराधे करते हुऐ फिर कई वर्षो तक श्री रूप गोस्वामीजी बरसाना में ही रहे। 

हे करुणा निधान! इस अधम, पतित - दास को ऐसी पात्रता और ऐसी उत्कंठा अवश्य दे देना कि इन रसिकों के गहन चरित का आस्वादन कर अपने को कृतार्थ कर सकूँ। 

इनकी पद धूलि की एक कनिका प्राप्त कर सकूँ।

              || जय श्री राधे राधे  ||
!!!! शुभमस्तु !!!
+++ +++
+++ +++

Wednesday, July 1, 2026

સાચી ભક્તિની શક્તિ :

સાચી ભક્તિની શક્તિ  :

સાચી ભક્તિની શક્તિ  :

ભગવાન શ્રી કૃષ્ણના પરમ ભક્ત નારદજી એકવાર પૃથ્વી લોકમાં ફરી રહ્યાં હતા તે દરમ્યાન એક પતિ-પત્ની તેમને મળ્યા. 

નારદજીને જોઇ અને તે પતિ - પત્ની નારદજીના ચરણોમાં પડી ગયા અને તેમને વિનંતી કરી કે, "અમારે ત્યાં કંઈ સંતાન નથી, જો તમે કંઇ ઉપાય જાણતા હોવ તો અમે તેમ કરવા તૈયાર થશું."

 મહર્ષિ નારદજી તેમની વિનંતી સાંભળી અને પહેલા ઊંડા વિચારમાં ગરકાવ થઇ ગયા પરંતુ પછી તેમણે તે પતિ પત્નીને આશ્વાસન આપતા કહ્યું કે, 

"મારી નજરમાં તો આવો કોઈ ઉપાય નથી, જે તમને કામ આવી શકે. પરંતુ હું ભગવાન શ્રી કૃષ્ણને તમારા દુઃખનું કારણ જણાવીશ માટે તમે ધીરજ રાખો. બધું જ સારૃં થશે."




Premium Baby Krishna Photo Frame 12x8 Inch | Bal Gopal Makhan Chor Wall Photo with Matte Finish Black Frame | Hindu God Kanha Devotional Home Decor | Pooja Room, Living Room, Gift Item (KRISHNA 3)

Brand: Generic  https://amzn.to/4v3a6Sb


આમ, કહી અને મહર્ષિ નારદજી તો ગૌલોકમાં ભગવાન શ્રીકૃષ્ણ પાસે પહોંચી ગયા અને ભગવાન શ્રીકૃષ્ણને પગે લાગી અને કહ્યું , 

" પ્રભુ આપ તો અંતર્યામી છો, આપ બધું જ જાણો છો. હું પૃથ્વી લોકમાં એક દંપતીને મળ્યો હતો. તેને ત્યાં કોઇ સંતાન નથી તો એવું કયું વ્રત કે તપ છે કે જે દંપતિ કરે તો તેને ત્યાં બાળક થાય."

ભગવાન શ્રી કૃષ્ણ હસ્યા અને હસતા હસતા મહર્ષિ નારદજીને પ્રત્યુત્તર આપ્યો, 

"હે નારદ, તું જેના માટે ચિંતિત થાય છે તેનો ઉપાય પૂછે છે? તને ખરૃં કહું તો તે દંપતિને ત્યાં અત્યાર સુધી બાળક થાય તેમ નથી અને તેના કર્મો એવા છે કે જો હું પોતે ઇચ્છે તો પણ તેને સંતાન આપી શકું તેમ નથી."

+++ ++++

ભગવાન શ્રીકૃષ્ણ પાસેથી પ્રત્યુત્તર સાંભળી અને મહર્ષિ નારદજી તો તરત જ ઉપડ્યા. તે દંપતી પાસે ગયા એટલે એ દંપતી ફરી નારદજીના પગે પડ્યા. ત્યારે નારદજીએ તે પતિ - પત્નીને સમજાવી અને કહ્યું કે, 

"આપને સંતાન પ્રાપ્તિ માટે ભગવાનની લીલાને વખાણો અને તમારા કર્મના ફળ સ્વરૂપે તમને જે દુઃખ પ્રાપ્ત થયું છે તે ભોગવી લો અને પ્રભુનું સ્મરણ કરતા રહો." 

મહર્ષિ નારદજીની વાણી સાંભળી અને પતિ-પત્નીને ખૂબ જ દુઃખ થયું પરંતુ થાય શું? 

કર્મના દોષ તો ભોગવવે જ છૂટકો. એમ,મનમનાવી અને એ પતિ - પત્ની તો ફરી સાંસારીક લીલામાં મગ્ન થઇ ગયા. 

+++ ++++

એક વાર એક મહાત્માજી ફરતાં ફરતાં આ ગામમાં આવ્યા ત્યારે અધિક માસ ચાલી રહ્યું હતું. તેમને ખૂબ જ ભૂખ લાગી હતી. 

એટલે બે  - ચાર ઘરે ભીક્ષા માંગી પરંતુ કોઇએ ભીક્ષા આપી નહીં. 

આખરે એ મહાત્માજી ફરતા ફરતા આ પતિ - પત્નીના ઘર પાસે આવ્યા. પતિ - પત્ની જમવા બેસવાની તૈયારી જ કરી રહ્યાં હતા. 

ત્યાં આ મહાત્માજીએ ભીક્ષા માટે માંગણી કરી. તેમનો અવાજ સાંભળી પતિ - પત્નીએ તેમને આવકાર આપ્યો અને ભીક્ષામાં ખાવાનું આપ્યું. ત્રણ બાજરાના રોટલા પણ હતા.

+++ ++++

મહાત્માજી ખૂબ જ રાજી થયા અને કહ્યું, "આ પવિત્ર અધિકમાસમાં તે મને મારું પેટ ભરાઇ જાય તેટલું ખાવાનું આપ્યું છે અને તેમાં પણ ત્રણ બાજરાના રોટલા આપ્યા. જા તારે ત્યાં ત્રણ સુંદર મજાના બાળકોનો જન્મ થશે." 

આ સાંભળી અને તે પતિ - પત્ની તો ખૂબ જ ખુશ થઇ ગયા અને તેમણે મહાત્માજીને દંડવત્ત પ્રણામ કર્યા. સમય વિતતા તેને ત્યાં ત્રણ ઉત્તમ બાળકોનો જન્મ થયો. 

બાળકો ધીરે ધીરે મોટા થવા લાગ્યા. એક વખત નારદજી ફરી એક વાર એજ ગામમાં પધાર્યા અને તેમને થયું કે, "લાવને પેલા દંપતિને મળતો જાઉ." પછી દંપતિને ઘેર મહર્ષિ નારદજી પહોંચ્યા ત્યાં તો તેમના આંગળામાં સુંદર એવા ત્રણ બાળકોને રમતા જોયા. 

+++ ++++

નારદજીએ તેમના ઘરનું બારણું ખખડાવ્યું. અવાજ સાંભળી અને પતિ - પત્ની ઘરની બહાર આવ્યા. મહર્ષિ નારદજીને આંગણે આવેલા જોઇ તેમના પગ ધોઇ આચમન માટે પાણી આપી અને યોગ્ય સત્કાર કર્યો. 

પછી ત્રણે બાળકો પણ નારદજીને પગે લગાવા પાસે આવ્યા અને નારદજીને દંડવત્ત પ્રણામ કરતાં તે બાળકો ઊભા રહ્યાં. 

નારદજી પૂછે છે કે, " આ સુંદર મજાના બાળકો કોના છે? ત્યારે પતિ - પત્ની કહે છે એ ત્રણે બાળકો અમારા છે અને પછી એ બાળકોની પ્રાપ્તિ કઇ રીતે થઇ તેનો સમગ્ર વૃતાંત મહર્ષિ નારદજીને કહી સંભળાવ્યો."

+++ +++++

મહાત્માજી ખૂબ જ રાજી થયા અને કહ્યું, "આ પવિત્ર અધિકમાસમાં તે મને મારું પેટ ભરાઇ જાય તેટલું ખાવાનું આપ્યું છે અને તેમાં પણ ત્રણ બાજરાના રોટલા આપ્યા. જા તારે ત્યાં ત્રણ સુંદર મજાના બાળકોનો જન્મ થશે." 

આ સાંભળી અને તે પતિ - પત્ની તો ખૂબ જ ખુશ થઇ ગયા અને તેમણે મહાત્માજીને દંડવત્ત પ્રણામ કર્યા. સમય વિતતા તેને ત્યાં ત્રણ ઉત્તમ બાળકોનો જન્મ થયો. બાળકો ધીરે ધીરે મોટા થવા લાગ્યા. 

એક વખત નારદજી ફરી એક વાર એજ ગામમાં પધાર્યા અને તેમને થયું કે, "લાવને પેલા દંપતિને મળતો જાઉ." પછી દંપતિને ઘેર મહર્ષિ નારદજી પહોંચ્યા ત્યાં તો તેમના આંગળામાં સુંદર એવા ત્રણ બાળકોને રમતા જોયા. 

+++ +++

નારદજીએ તેમના ઘરનું બારણું ખખડાવ્યું. અવાજ સાંભળી અને પતિ - પત્ની ઘરની બહાર આવ્યા. મહર્ષિ નારદજીને આંગણે આવેલા જોઇ તેમના પગ ધોઇ આચમન માટે પાણી આપી અને યોગ્ય સત્કાર કર્યો. 

પછી ત્રણે બાળકો પણ નારદજીને પગે લગાવા પાસે આવ્યા અને નારદજીને દંડવત્ત પ્રણામ કરતાં તે બાળકો ઊભા રહ્યાં. નારદજી પૂછે છે કે, 

" આ સુંદર મજાના બાળકો કોના છે? ત્યારે પતિ - પત્ની કહે છે એ ત્રણે બાળકો અમારા છે અને પછી એ બાળકોની પ્રાપ્તિ કઇ રીતે થઇ તેનો સમગ્ર વૃતાંત મહર્ષિ નારદજીને કહી સંભળાવ્યો."

+++ ++++

મહર્ષિ નારદજી ત્યાંથી નિકળી અને સીધ્ધા ઉપડ્યા ગૌલોકમાં ભગવાન શ્રી કૃષ્ણ પાસે જઇ તેમને પ્રણામ કરી અને તે દંપતીને થયેલા બાળકો બાબતે પ્રશ્ન કરવા લાગ્યા કે, 

"આપે જે કહેલું કે સાત ભવ સુધી તો હું પણ તેને બાળકો આપી શકું તેમ નથી. તો પછી આ બધું કેમ થયું?" 

+++ ++++

ભગવાન શ્રી કૃષ્ણ કહે છે કે, એ બધી વાતો અત્યારે તું રહેવા દે અને હું કહું છું એ તું સાંભળ, " હે નારદ, મારા શરીરમાં એક વિચિત્ર પ્રકારનો રોગ થયો છે. હવે એ રોગને કારણે મને અસહ્ય પીડા થાય છે. 

હવે મારી એ પીડા દૂર થાય એ માટે જે કોઇ મારો પરમ ભક્ત હોય તે જો પોતાનું માથું કાપી અને તેમનું લોહી મને આપે તે લોહી હું મારા આખા શરીરે ચોપડું તો મારો આ રોગ જાય તેમ છે. 

માટે એવો કોઇ પરમ ભક્ત હોય તો તે તું શોધી લાવ. તેમાં વિલંબ ન કરજે કારણ કે મારાથી આ અંગ પીડા જરાય સહન જ થતી નથી."

+++ +++

નારદજીએ તો આ વાત સાંભળી અને તેઓ ખૂબ જ ચિંતામાં પડી ગયા અને માથું કાપી અને પોતાનો અંગ અર્પણ કરી દે તેવા પરમ ભક્તની શોધમાં લાગી ગયા. 

તેમણે એક પછી એક એમ તેમની નજરમાં જે જે ભક્તો હતા તે તે બધાય ભક્તોને પૂછ્યું. પરંતુ કોઇ માથું કાપવા તૈયાર જ ન થયું. 

આ પ્રમાણે શોધ કરતાં કરતાં નારદજી તો પહેલા મસ્તરામ મહાત્માજી પાસે પહોંચી ગયા. જેમણે સંતાન વિહોણા દંપતિને ત્રણ બાળક થાય એવા આશિર્વાદ આપ્યા હતા. 

+++ +++

તે મહાત્માજી પાસે જઇ અને ભગવાન શ્રીકૃષ્ણના રોગ અંગેની સઘડી હકિકત કહી સંભળાવી. મહાત્માજીએ નારદજીને કહ્યું , 

" એમ, ભગવાનને તકલીફ છે? ચાલો, હું તમારી સાથે ચાલું છું. હું મારું માથું આપવા તૈયાર છું. જો ભગવાન શ્રી કૃષ્ણનો રોગ દૂર થતો હોય તો સત્વરે ચાલો. આપણે તેમની પાસે જઇએ." 

નારદજી તેમને ગૌલોકમાં ભગવાન શ્રી કૃષ્ણ પાસે લઇ ગયા. ભગવાન શ્રી કૃષ્ણને તે મહાત્માજી કહેવા લાગ્યા, "ચાલો હું તમને મારું માથું કાપી અને મારું લોહી આપવા તૈયાર છું." 

+++ ++++

ત્યારે ભગવાન શ્રી કૃષ્ણએ હસતાં હસતાં મહર્ષિ નારદજીને કહ્યું," જોયું, મારા કેટલાય ભક્તો છે તેમાં તમારો પણ સમાવેશ થાય છે. 

પરંતુ માથું કાપીને આપવા તૈયાર થનારો ભક્ત એક જ નિકળ્યો. હવે, આવો મારો પરમ ભક્ત હોય તો તે કોઇના કર્મના ફળ પણ બદલાવી દેવાની તેનામાં શક્તિ હોય. 

તેમાં કંઇ નવું નથી. આ તો સાચી ભક્તિની શક્તિ છે." આ સાંભળી અને મહર્ષિ નારદજીનું શરમથી માથું ઝુકી ગયું.

+++ +++

:: ભજન ::

આંગણે રમે મારે આંગણે રમે,


નાનકડો નંદલાલ આંગણે રમે.


વાંકડીયા વાળ એના મુખડું મનોહર,


બંસીના સુર ગાઈ ગાયો ચારે...નાનકડો નંદલાલ...


નાના ગોવાળીયાને ગોઠીયા કરીને,


વાછરૂના પૂંછ જાલી ભમતો ફરે, નાનકડો નંદલાલ...


ખંભે લઇ લાકડીને ખેલે છે નટવર,


કુદડી ફરેને મારો નાથજી નમે નાનકડો નંદલાલ...


એને મેળવવાને મોટા મુનિવર,


વર્ષોના વર્ષો સુધી દેહને દમે નાનકડો નંદલાલ...


ગોવિંદના નાથ હાથ આવે નહીં કોઇને,


એ તો આવીને મારી આંખમાં રમે, નાનકડો નંદલાલ.


આંગણે રમે મારે આંગણે રમે,


મારો નાનકડો નંદલાલ આંગણે રમે નાનકડો નંદલાલ...!




પરમાત્મા તો પ્રેમના ભૂખ્યા છે :

ભગવાન શ્રી કૃષ્ણની પટરાણીઓમાં સત્યભામાનું પણ એક વિશિષ્ટ સ્થાન છે એ પોતે પણ એવો અનુભવ કરતા કે પોતે ભગવાનના માનીલ રાણી છે અને એ બાબતનું તેમને ખૂબ જ અભિમાન હતું.

એક વખત અચાનક નારદજી ભગવાન શ્રી કૃષ્ણને ઘેર પહોંચ્યા ત્યાં સત્યભામાજી એકલા બેઠા હતા એટલે નારદજી તેમની પાસે બેઠા. વાતમાંથી વાત નિકળી અને સંસારની વાત શરૂ થઇ તેથી સત્યભાજીમાં બોલ્યા, 

+++ ++++

"નારદ, આ મારા પતિદેવ શ્રી કૃષ્ણ છે ને ? એમને મારા પર વિશેષ પ્રીતિ છે. તેમને મારા વિના જરાય પણ ચાલતું નથી. 

હું તો ખૂબ જ ભાગ્યશાળી કહેવાઉંને ? પરંતુ મારા એ પતિ દેવ મને જન્મોજન્મ પતિ સ્વરૂપે કાયમ માટે મળ્યા કરે એવી મારી મનની ઇચ્છા છે તમે તો ખૂબ જ જ્ઞાની છો તમે એ માટે મને કંઇ દાન ધર્મ બતાવો તો હું તમારો એ ઉપકાર ક્યારે નહીં ભૂલું."

+++ +++

ત્યારે મહર્ષિ નારદજી કંઇક વિચારવા લાગ્યા પછી બોલ્યા, "તમારે જન્મોજન્મ તમારા પ્રાણથી પ્રાણ પ્યારા એવા શ્રી કૃષ્ણને પતિ તરીકે મેળવવા છે ને....!

તો એ માટે એક સાવ સીધો રસ્તો છે. એમ કરો, કોઇ સુપાત્ર બ્રાહ્મણને તમારા પ્રિયતમ એવા ભગવાન શ્રી કૃષ્ણને દાન કરી દો.

" મહર્ષિ નારદજીએ બતાવેલો ઉપાય સત્યભામાને એકદમ પસંદ જ પડી ગયો. તેથી ઉત્સાહમાં આવી જઇ તેમને કહ્યું કે," 

+++ +++

"નારદજી એમ કરો તમે જ કોઈ સુપાત્ર બ્રાહ્મણ શોધી આપોને ?" 

"અરે ! હું અહીં બેઠો છું. પછી બીજા કોઇ સુપાત્ર બ્રાહ્મણને શોધવાની જરૂર જ શું છે ?" 

નારદજી તરત જ બોલી ઉઠ્યા. સત્યભામાજીએ નારદજીની વાત માની લઇ તેમના બતાવ્યા પ્રમાણે હાથમાં જળ લઇ અને સંકલ્પ કરી નારદજીને ભગવાન શ્રી કૃષ્ણ દાનમાં આપી દીધા અને નારદજીએ પણ તે દાનનો સ્વીકાર કરી લઇ સત્યભામાજીને આર્શિવચન આપ્યા.

+++ +++

ભગવાન શ્રી કૃષ્ણ દાનમાં મળ્યા એટલે મહર્ષિ નારદજી તો રાજીના રેડ થઇ ગયા અને પછી તરત તેમણે ત્યાંથી ચાલતી પકડી એટલે સત્યભામાજીએ નારદજીને બૂમ પાડી ઊભા રાખ્યા અને કહ્યું,

"નારદજી...નારદજી...ક્યાં ચાલ્યા ? અને મારા પતિદેવ એવા શ્રી કૃષ્ણને તમે ક્યાં લઈ જાવ છો ?"

નારદજીએ સત્યભામાજીને ગભરાયેલા જોયા એટલે તેમને સમજાવતા કહ્યું, 

"જુઓ, સત્યભામાજી તમે મને શ્રી કૃષ્ણને દાનમાં આપવાનો સંકલ્પ કર્યો, બરાબરને...? " 

+++ +++

" હાં, એ વાત બરાબર...!" 

સત્યભામાજી બોલી ઉઠ્યા, 

"હવે, તમે જ મને ભગવાન શ્રી કૃષ્ણ દાનમાં આપ્યા. હવે એમના પર મારો અધિકાર છે તેથી દાનમાં મળેલા શ્રી કૃષ્ણને હું મારી જોડે જ લઇ જાઉં ને....? 

અને હવે તેમને હું ગમે ત્યાં લઇ જાઉં તમે મને તેમ કરતાં રોકી શકો નહીં." 

હળવેકથી નારદજીએ જવાબ આપ્યો અને એ તો ફરીથી ચાલવા લાગ્યા.

+++ +++

હવે સત્યભામાજી ખૂબ જ મુંઝાયા, તેમને પોતાની ભૂલ સમજાઇ અને અભિમાનમાં લીધેલા ઉતાવળા પગલા બદલ પારાવાર પસ્તાવો થવા લાગ્યો. 

તેમણે મહર્ષિ નારદજીને વિનંતી કરી કે ભગવાન શ્રી કૃષ્ણની બદલે તેમને જે જોઇએ તે લઇ જાવ પરંતુ અમારા પ્રિયતમ એવા શ્રી કૃષ્ણને જલ્દી મૂક્ત કરો. 

ત્યારે નારદજી હસવા લાગ્યા અને અંતે એવું નક્કી થયું કે, ભગવાન શ્રી કૃષ્ણનું જેટલું વજન થાય તેટલા ભારોભાર વજનનું સૂવર્ણનું દાન નારદજીને કરવામાં આવે. 

+++ ++++

ત્યારે તેના બદલામાં નારદજી ભગવાન શ્રી કૃષ્ણને પાછા આપે. આથી, સત્યભામાજી સહિત સૌ પટરાણીને સંતોષ થયો કે, 

"સોનું તો ઘણું છે તેના બદલામાં શ્રી કૃષ્ણ પાછા મળતા હોય તો સોદો કંઇ ખોટો નથી. ખાસ કરીને સત્યભામાજીને ફરી અભિમાન આવ્યું કે, મારી પાસે તો ઘણુંએ સોનું છે." 

એ જલ્દી જલ્દી પોતાના દાગીના લઇ આવ્યા પછી ત્રાજવાના એક પલ્લામાં ભગવાન શ્રી કૃષ્ણને બેસાડવામાં આવ્યા અને બીજા પલ્લામાં સોનાના દાગીના મૂકવામાં આવ્યા. 

+++ +++

પરંતુ ભગવાન શ્રી કૃષ્ણનું જેમ હતું તેમનું તેમ જ રહ્યું . એટલે બીજી પટરાણીઓ પણ પોતપોતાના દાગીનાઓ લાવી તે બીજા પલ્લામાં મુકતી ગઇ પરંતુ ત્રાજવા રતીભાર પણ ઊંચા કે નીંચા ન થયા. પરિસ્થિતિની વિચિત્રતા જોઇ અને સત્યભામાજી રડવા લાગ્યા. 

તેમનું બધું જ અભિમાન ઉતરી ગયું. તેમને ખૂબ જ અફસોસ થયો. આ બધું ચાલી રહ્યું હતું, ત્યારે અચાનક ભગવાનના મુખ્ય પટરાણી રૂક્ષ્મણીજી ત્યાં પધાર્યા. 

તેમણે બધી વાત જાણી એટલે એ તો તુરંત જ સમજી ગયા કે, સત્યભામાજીનું અભિમાન ઉતારવા માટે જ ભગવાન શ્રી કૃષ્ણએ આ બધી લીલા કરી છે. 

+++ +++

આથી તેમણે સત્યભામાજીને સમજાવતા કહ્યું તમે જાણો છો કે, સ્વામીની સરખામણી સોના સાથે ન થાય. તેમની તોલે તો આખી દુનિયાની સંપતિ પણ સામાન્ય ગણાય. 

હાં, તેમને તોલવા હોય તો સાચો નિશ્વાર્થ, નિર્દોષ પ્રેમ જોઇએ."  

ત્યારબાદ રૂક્ષ્મણીજીએ ખૂબ જ શ્રધ્ધા પૂર્વક એક તુલસીનું પાન બીજા પલ્લામાં મૂક્યું અને તેનાથી ભગવાનનું પલ્લું અધ્ધર થઈ ગયું. 

આમ, પ્રેમના પ્રતિકૃત એકમાત્ર તુલસીના પાનથી ભગવાન તોલાયા અને જગતને બતાવ્યું કે, એ ખરેખર પ્રેમના જ ભૂખ્યા છે.

+++ +++

:: ભજન ::

ઓ કરૂણાના કરનારા તારી કરૂણાનો કંઈ પાર નથી


ઓ સંકટના હરનારા તારી કરૂણાનો કંઈ પાર નથી.


મેં પાપ કર્યા છે એવા હું ભૂલ્યો તારી સેવા


મારી ભૂલોના ભૂલનારા તારી કરૂણાનો કંઈ પાર નથી.


હે પરમકૃપાળુ વહાલા મેં પીધા વિષના પ્યાલા


વિષને અમૃત કરનારા તારી કરૂણાનો કંઈ પાર નથી.


મારા જીવનના ઘડનારા તારી કરૂણાનો કંઈ પાર નથી.


હું અંતરમાં થઈ રાજી ખેલ્યો હું અવળી બાજી


અવળી સવળી કરનારા તારી કરૂણાનો કંઈ પાર નથી.


મને મળતો નથી કિનારો, મારો ક્યાંથી આવે આરો


મારા સાચા સેવન હારા તારી કરૂણાનો કંઈ પાર નથી.


છે જયનો જીવન ઉદાસી ચરણે લેજો અવનાશી


ભક્તોના દિલ હરનારા તારી કરૂણાનો કંઇ પાર નથી.


ભલે છોરૂ કછોરૂ થાય તે માવતર કહેવાય


બાળકોના દોષ ભુલનારા તારી કરૂણાનો કંઈ પાર નથી.

हर हर महादेव जय मां अंबे मां !!!!! शुभमस्तु !!! 

+++ +++

🙏हर हर महादेव हर...!!

जय माँ अंबे ...!!!🙏🙏

पंडित राज्यगुरु प्रभुलाल पी. वोरिया क्षत्रिय राजपूत जड़ेजा कुल गुर: -

श्री सरस्वति ज्योतिष कार्यालय

PROFESSIONAL ASTROLOGER EXPERT IN:- 

-: 1987 YEARS ASTROLOGY EXPERIENCE :-

(2 Gold Medalist in Astrology & Vastu Science) 

" Opp. Shri Satvara vidhyarthi bhuvn,

" Shri Aalbai Niwas "

Shri Maha Prabhuji bethak Road,

JAM KHAMBHALIYA - 361305 (GUJRAT )

सेल नंबर: . + 91- 9427236337 / + 91- 9426633096  ( GUJARAT )

Vist us at: www.sarswatijyotish.com

Skype : astrologer85

Email: prabhurajyguru@gmail.com

Email: astrologer.voriya@gmail.com

आप इसी नंबर पर संपर्क/सन्देश करें...धन्यवाद.. 

नोट ये मेरा शोख नही हे मेरा जॉब हे कृप्या आप मुक्त सेवा के लिए कष्ट ना दे .....

जय द्वारकाधीश....

जय जय परशुरामजी...🙏🙏🙏

+++ +++