Adsence

Wednesday, January 29, 2025

भगवान राम के द्वारा हनुमानजी का अहंकार नाश –

 भगवान राम के द्वारा हनुमानजी का अहंकार नाश – / आज का चिंतन -

 भगवान राम के द्वारा हनुमान

     जी का अहंकार नाश –

यह कथा उस समय की है जब लंका जाने के लिए भगवान श्रीराम ने सेतु निर्माण के पूर्व समुद्र तट पर शिवलिंग स्थापित किया था। 

वहाँ हनुमानजी को स्वयं पर अभिमान हो गया तब भगवान राम ने उनके अहँकार का नाश किया।


यह कथा इस प्रकार है-





Collectible India Lord Shiva Idol Shiv Padmasana Sitting Statue | Gift Item for Home Family and Friends (3.1 Inches)

https://amzn.to/4mhsR0x


जब समुद्र पर सेतुबंधन का कार्य हो रहा था तब भगवान राम ने वहाँ गणेशजी और नौ ग्रहों की स्थापना के पश्चात शिवलिंग स्थापित करने का विचार किया। 

उन्होंने शुभ मुहूर्त में शिवलिंग लाने के लिए हनुमानजी को काशी भेजा। 

हनुमानजी पवन वेग से काशी जा पहुँचे। 

उन्हें देख भोलेनाथ बोले- 

+++ +++

“ पवनपुत्र! ” 

दक्षिण में शिवलिंग की स्थापना करके भगवान राम मेरी ही इच्छा पूर्ण कर रहे हैं....! 

क्योंकि महर्षि अगस्त्य विन्ध्याचल पर्वत को झुकाकर वहाँ प्रस्थान तो कर गए....! 

लेकिन वे मेरी प्रतीक्षा में हैं।

इस लिए मुझे भी वहाँ जाना था। 

तुम शीघ्र ही मेरे प्रतीक को वहाँ ले जाओ। 

यह बात सुनकर हनुमान गर्व से फूल गए और सोचने लगे कि केवल वे ही यह कार्य शीघ्र- 

अतिशीघ्र कर सकते हैं।




यहाँ हनुमानजी को अभिमान हुआ और वहाँ भगवान राम ने उनके मन के भाव को जान लिया। 

भक्त के कल्याण के लिए भगवान सदैव तत्पर रहते हैं। 

हनुमान भी अहंकार के पाश में बंध गए थे। 

+++ +++

अतः भगवान राम ने उन पर कृपा करने का निश्चय कर उसी समय वारनराज सुग्रीव को बुलवाया और कहा-

“ हे कपिश्रेष्ठ! 

शुभ मुहूर्त समाप्त होने वाला है और अभी तक हनुमान नहीं पहुँचे। 

इस लिए मैं बालू का शिवलिंग बनाकर उसे यहाँ स्थापित कर देता हूँ। ”




तत्पश्चात उन्होंने सभी ऋषि- मुनियों से आज्ञा प्राप्त करके पूजा - अर्चनादि की और बालू का शिवलिंग स्थापित कर दिया। 

ऋषि - मुनियों को दक्षिणा देने के लिए श्रीराम ने कौस्तुम मणि का स्मरण किया तो वह मणि उनके समक्ष उपस्थित हो गई। 

+++ +++

भगवान श्रीराम ने उसे गले में धारण किया। 

मणि के प्रभाव से देखते - ही-देखते वहाँ दान -  दक्षिणा के लिए धन, अन्न, वस्त्र आदि एकत्रित हो गए। 

उन्होंने ऋषि - मुनियों को भेंटें दीं। 

फिर ऋषि - मुनि वहाँ से चले गए।




मार्ग में हनुमानजी से उनकी भेंट हुई। 

हनुमानजी ने पूछा कि वे कहाँ से पधार रहे हैं? 

उन्होंने सारी घटना बता दी। 

यह सुनकर हनुमानजी को क्रोध आ गया। 

+++ +++

वे पलक झपकते ही श्रीराम के समक्ष उपस्थिति हुए और रुष्ट स्वर में बोले-

“ भगवन! 

यदि आपको बालू का ही शिवलिंग स्थापित करना था तो मुझे काशी किसलिए भेजा था? 

आपने मेरा और मेरे भक्ति भाव का उपहास किया है। "

+++ +++

" श्रीराम मुस्कराते हुए बोले- 

पवनपुत्र! शुभ मुहूर्त समाप्त हो रहा था....! 

इस लिए मैंने बालू का शिवलिंग स्थापित कर दिया। 

मैं तुम्हारा परिश्रम व्यर्थ नहीं जाने दूँगा। 

मैंने जो शिवलिंग स्थापित किया है तुम उसे उखाड़ दो.....! 

मैं तुम्हारे लाए हुए शिवलिंग को यहाँ स्थापित कर देता हूँ। 

” हनुमान प्रसन्न होकर बोले-“

+++ +++

ठीक है भगवन! 

मैं अभी इस शिविलंग को उखाड़ फेंकता हूँ।

उन्होंने शिवलिंग को उखाड़ने का प्रयास किया....! 

लेकिन पूरी शक्ति लगाकर भी वे उसे हिला तक न सके। 

तब उन्होंने उसे अपनी पूंछ से लपेटा और उखाड़ने का प्रयास किया। 

किंतु वह नहीं उखड़ा। 

+++ +++

अब हनुमान को स्वयं पर पश्चात्ताप होने लगा। 

उनका अहंकार चूर हो गया था और वे श्रीराम के चरणों में गिरकर क्षमा माँगने लगे।

इस प्रकार हनुमान ने अहम का नाश हुआ। 

श्रीराम ने जहाँ बालू का शिवलिंग स्थापित किया था उसके उत्तर दिशा की ओर हनुमान द्वारा लाए शिवलिंग को स्थापित करते हुए कहा कि ‘ इस शिवलिंग की पूजा - अर्चना करने के बाद मेरे द्वारा स्थापित शिवलिंग की पूजा करने पर ही भक्तजन पुण्य प्राप्त करेंगे। '

यह शिवलिंग आज भी रामेश्वरम में स्थापित है।

    और भारत का एक प्रसिद्ध तीर्थ ( धाम ) है।

+++ +++

|| आज का चिंतन- ||

आज का आदमी मेहनत में कम और मुकद्दर में ज्यादा विश्वास रखता है। 

आज का आदमी सफल तो होना चाहता है मगर उसके लिए कुछ खोना नहीं चाहता है। 

वह भूल रहा है कि सफलताएँ किस्मत से नहीं मेहनत से मिला करती हैं। 

किसी की शानदार कोठी देखकर कई लोग कह उठते हैं.....! 

कि काश अपनी किस्मत भी ऐसी होती लेकिन वे लोग तब यह भूल जाते हैं....! 

+++ +++

कि ये शानदार कोठी, शानदार गाड़ी उसे किस्मत ने ही नहीं दी अपितु इसके पीछे उसकी कड़ी मेहनत रही है। 

मुकद्दर के भरोसे रहने वालों को सिर्फ उतना मिलता है जितना मेहनत करने वाले छोड़ दिया करते हैं।

किस्मत का भी अपना महत्व है। 

मेहनत करने के बाद किस्मत पर आश रखी जा सकती है मगर खाली किस्मत के भरोसे सफलता प्राप्त करने से बढ़कर कोई दूसरी नासमझी नहीं हो सकती है।

दो अक्षर का होता है " लक ", ढाई अक्षर का होता है भाग्य, तीन अक्षर का होता है....! 

नसीव लेकिन चार अक्षर के शब्द मेहनत के चरणों में ये सब पड़े रहते हैं।

||  पंडारामा प्रभु राज्यगुरू 

( द्रविड़ ब्राह्मण ) ||

  || जय श्री राम जय हनुमान ||


Saturday, January 25, 2025

पितृगण का उद्धार भक्ति से...!

 पितृगण का उद्धार भक्ति से: 

((((  पितृगण का उद्धार भक्ति से ))))

आश्विनमासके कृष्णपक्षके पन्द्रह दिन 'पितृपक्ष' के नामसे विख्यात हैं। 

इन पन्द्रह दिनोंमें लोग अपने पितरोंको जल देते हैं तथा उनकी मृत्युतिथिपर श्राद्ध करते हैं। 

पितरोंका ऋण सन्तानोत्पत्ति तथा श्राद्धोंद्वारा चुकाया जाता है। 

पितृपक्ष श्राद्धोंके लिये निश्चित तिथियोंका एक समूह है। 

वर्षके किसी भी मास तथा तिथिमें स्वर्गवासी हुए पितरोंके लिये पितृपक्षकी उसी तिथिको श्राद्ध किया 
जाता है। 

पूर्णिमापर देहान्त होनेसे भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमाको श्राद्ध करनेकी विधि है। 

इसी दिनसे महालयका प्रारम्भ भी माना जाता है।

चित्रकूट के पास एक श्यामदास नाम के उच्चकोटी के नाम जापक महात्मा थे। 









eSplanade Brass Lord Balaji Moorti Murti Idol Statue Praying Idol for Pooja - Vishnu Narayan Home Decor (7" inches Height)

https://amzn.to/45ERdu8





'श्राद्ध' का अर्थ है, श्रद्धासे जो कुछ दिया जाय। 

श्रद्धया दीयते यत् तत् श्राद्धम्। 

पितृपक्षमें श्राद्ध करनेसे पितृगण वर्षभर प्रसन्न रहते हैं।

पितृपक्षमें श्राद्ध तो मुख्य तिथियोंको ही होते हैं, किंतु तर्पण प्रतिदिन किया जाता है। 

देवताओं तथा ऋषियोंको जल देनेके अनन्तर पितरोंको जल देकर तृप्त किया जाता है।

यद्यपि प्रत्येक अमावास्या पितरोंकी पुण्यतिथि है, फलदायी है। 

इसी प्रकार पितृपक्षकी नवमीको माताके श्राद्धके लिये पुण्यदायी माना गया है। 

श्राद्धके लिये सबसे पवित्र स्थान गयातीर्थ है। 

जिस प्रकार पितरोंके मुक्तिनिमित्त गयाको परम पुण्यदायी माना गया है, उसी प्रकार माताके लिये काठियावाड़का सिद्धपुर स्थान परम फलदायी माना गया है। 

इस पुण्यक्षेत्रमें माताका श्राद्ध करके पुत्र अपने मातृ ऋणसे सदा - सर्वदाके लिये मुक्त हो जाता है। 

यह स्थान मातृगयाके नामसे भी प्रसिद्ध है।

पितृपक्षमें श्राद्धकी महिमा आयुः पुत्रान् यशः स्वर्ग कीर्ति पुष्टिं बलं श्रियम् । 
पशून् सौख्यं धनं धान्यं प्राप्नुयात् पितृपूजनात् ।। 

तथा-

आयुः प्रजां धनं वित्तं स्वर्ग मोक्षं सुखानि च। 
प्रयच्छन्ति तथा राज्यं प्रीता नृणां पितामहाः ।।

धर्मशास्त्रोंमें कहा गया है कि पितरोंको पिण्डदान करनेवाला गृहस्थ दीर्घायु, पुत्र - पौत्रादि, यश, स्वर्ग, पुष्टि, बल, लक्ष्मी, पशु, सुख - साधन तथा धन - धान्यादिकी प्राप्ति करता है। 

यही नहीं, पितरोंकी कृपासे ही उसे सब प्रकारकी समृद्धि, सौभाग्य, राज्य तथा मोक्षकी प्राप्ति होती है। 
आश्विन मास के पितृपक्षमें पितरोंको आशा लगी रहती है कि हमारे पुत्र - पौत्रादि हमें पिण्डदान तथा तिलांजलि प्रदानकर सन्तुष्ट करेंगे। 

यही आशा लेकर वे पितृलोकसे पृथ्वीलोकपर आते हैं। 

अतएव प्रत्येक हिन्दू सद्‌गृहस्थका धर्म है कि वह पितृपक्षमें अपने पितरोंके निमित्त श्राद्ध एवं तर्पण अवश्य करे तथा अपनी शक्तिके अनुसार फल - मूल जो भी सम्भव हो, पितरोंके निमित्त प्रदान करे। 

पितृपक्ष पितरोंके लिये पर्वका समय है, अतएव इस पक्षमें श्राद्ध किया जाता है।

महालया ( पितृविसर्जनी अमावास्या ) -

आश्विन कृष्ण अमावास्याको पितृविसर्जनी अमावास्या अथवा महालया कहते हैं। 

जो व्यक्ति पितृपक्षके पन्द्रह दिनोंतक श्राद्ध - तर्पण आदि नहीं करते हैं, वे अमावास्याको ही अपने पितरोंके निमित्त श्राद्धादि सम्पन्न करते हैं। 

जिन पितरोंकी तिथि याद नहीं हो, उनके निमित्त श्राद्ध, तर्पण, दान आदि इसी अमावास्याको किया जाता है। 

आजके दिन सभी पितरोंका विसर्जन होता है। 

अमावास्याके दिन पितर अपने पुत्रादिके द्वारपर पिण्डदान एवं श्राद्धादिकी आशामें जाते हैं, यदि वहाँ उन्हें पिण्डदान या तिलांजलि आदि नहीं मिलती है तो वे शाप देकर चले जाते हैं। 

अतएव एकदम श्राद्धका परित्याग न करे, पितरोंको सन्तुष्ट अवश्य करे।

एक दिन एक लड़का उनके पास आकर बोला की हमको संसार से विरक्ति होने लगी है। 

उसने महात्मा से साधन पूछा तो उन्होंने कहां की भगवान का जो नाम तुम्हे पसंद हो।

उसको जपने लग जाओ और वैष्णवी आचार विचार का पालन करो। 

उसको श्री सीताराम जी का रूप व नाम प्रिय था। 

वह श्री सीताराम श्री सीताराम इस नाम का आश्रय लेकर भजन करने लगा। 

कई दिनों तक भजन करता रहा और एक दिन जप करते करते उसको बहुत सी आवाजे आयी...!

जय हो जय हो। 

अगले तीन चार दिन फिर कुछ आवाजे आयी.....! 

बेटा अति सुंदर, जय हो। 

उस बालक को लगा की लगता है कुछ गड़बड़ है। 

वह बालक श्यामदास जी के पास आकर सारी बात बताकर बोला.....!

संत जी, क्या मुझसे कोई अपराध बन रहा है या किसी तरह की बीमारी है ? 

श्यामदास जी ने ध्यान लगाकर देखा तो प्रसन्न होकर बोले : 








1 सर्वलक्षणसंयुक्तैर्विद्याशीलगुणान्वितैः l
पुरुषत्रयविख्यातैः सर्व श्राद्धं प्रकल्पयेत् ॥

श्राद्धमें ब्राह्मण ;


समस्त लक्षणोंसे युक्त, विद्या, शील एवं सद्‌गुणोंसे सम्पन्न तथा तीन पुरुषों ( पीढ़ियों ) से [ अपने सच्चरित्र एवं विद्याके लिये ] विख्यात ब्राह्मणोंके द्वारा श्राद्ध सम्पन्न करे।

श्राद्धमें वर्जित ब्राह्मण ;


खञ्जओ वा यदि वा काणो दातुः प्रेष्योऽपि वा भवेत्।

हीनातिरिक्तगात्रो वा तमप्यपनयेद् बुधः ॥ 

लँगड़ा, काना, दाताका दास, अंगहीन एवं अधिक ;


अंगवाला ब्राह्मण श्राद्धमें निषिद्ध है।

न ब्राह्मणं परीक्षेत देवकार्येषु प्रायशः।

पितृकार्ये परीक्षेत ब्राह्मणं तु विशेषतः ॥

देवकार्य, पूजा - पाठ आदिमें ब्राह्मणोंकी परीक्षा न करे, किंतु पितृकार्यमें अवश्य करे।

श्राद्धकर्ताके लिये वर्जित ;


जो श्राद्ध करनेके अधिकारी हैं उन्हें पूरे पन्द्रह दिनोंतक क्षौरकर्म नहीं कराना चाहिये। 

पूर्ण ब्रह्मचर्यका पालन करना चाहिये। प्रतिदिन स्नानके बाद तर्पण करना चाहिये। 

तेल, उबटन आदिका उपयोग नहीं करना चाहिये।

दन्तधावनताम्बूले तैलाभ्यङ्गमभोजनम् ।

रत्यौषधं परान्नं च श्राद्धकृत्सप्त वर्जयेत् ॥ [ भाग १००

दातौन करना, पान खाना, तेल लगाना, भोजन करना, स्त्री - प्रसंग, औषध सेवन और दूसरेका अन्न - ये सात श्राद्धकर्ताकै लिये वर्जित हैं।

श्राद्धमें पवित्र ;


त्रीणि श्रद्धे पवित्राणि दौहित्रः कुतपस्तिलाः।

वर्याणि प्राह राजेन्द्र क्रोधोऽध्वगमनं त्वरा ॥

दौहित्र ( पुत्रीका पुत्र ), कुतप ( मध्याह्नका समय ) और तिल - ये तीन श्राद्धमें अत्यन्त पवित्र हैं और क्रोध, अध्वगमन ( श्राद्ध करके एक स्थानसे अन्यत्र दूसरे स्थानमें जाना ) एवं श्राद्ध करनेमें शीघ्रता - ये तीन वर्जित हैं। ( निर्णयसिन्धु )

श्राद्धमें अन्न ;


यदन्नं पुरुषोऽश्नाति तदन्नं पितृदेवताः।

अपक्वेनाथ पक्वेन तृप्तिं कुर्यात्सुतः पितुः ॥

मनुष्य जिस अन्नका स्वयं भोजन करता है, उसी अन्नसे पितर और देवता भी तृप्त होते हैं। 

पकाया हुआ अथवा बिना पकाया हुआ अन्न प्रदान करके पुत्र अपने पितरोंको तृप्त करे।

पितृपक्षमें श्राद्ध ;


इस पक्षमें पिताकी तिथिको पार्वणश्राद्ध करना चाहिये - 'पर्वणि भवः पार्वणः।' 

महालयमें एकोद्दिष्टश्राद्ध नहीं होता। 

जो पार्वणश्राद्ध न कर सके, वह कम - से - कम पंचबलि निकालकर ब्राह्मण भोजन ही कराये, जिसका विधान नीचे लिखा जाता है-

बहुत - से व्यक्ति पार्वणश्राद्ध नहीं कराकर केवल ब्राह्मण - भोजन ही करा देते हैं, उसका नियम इस प्रकार है-

श्राद्धके निमित्त पाक तैयार होनेपर एक थालीमें पाँच जगह थोड़े - थोड़े सभी प्रकारके पाक परोसकर हाथमें जल, अक्षत, पुष्प, चन्दन लेकर निम्नलिखित संकल्प करे-

अद्यामुक गोत्र अमुक शर्मा ( वर्मा / गुप्तो वा ) अहममुकगोत्रस्य मम पितुः ( मातुः भ्रातुः पितामहस्य वा ) वार्षिक श्राद्धे ( महालयश्राद्धे ) कृतस्य पाकस्य शुद्धयर्थं बच्चा! 

तेरे इस शरीर के और पूर्व के शरीरों के पितृगण विविध योनियों से मुक्त होकर भगवान के धाम को जा रहे है और वे ही तुम्हारी जय जय कार करते है। 

कुछ और पितृगण बच गए है। 

पांच दिनों तक तुम्हे इनकी आवाज आएगी।

इसके बाद बंद हो जाएगी।

आस्फोट यन्ति पितरो नृत्यन्ति च पितामहाः।
मद्वंशे वैष्णवो जातः स नस्त्राता भविष्यति।।
(पद्मपुराण)








पञ्चसूनाजनितदोषपरिहारार्थं च पञ्चबलिदानं करिष्ये।

पंचबलि - विधि :


( १ ) गोबलि ( पत्तेपर ) - 

मण्डलके बाहर पश्चिमकी और निम्नलिखित मन्त्र पढ़ते हुए सव्य होकर गोबलि पत्तेपर दे-

ॐ सौरभेय्यः सर्वहिताः पवित्राः पुण्यराशयः ।

प्रतिगृह्णन्तु मे ग्रासं गावस्त्रैलोक्यमातरः ॥

इदं गोभ्यो न मम।

यदि मन्त्र स्मरण न रहे तो केवल 'गोभ्यो नमः' आदि नाम - मन्त्रसे बलि - प्रदान कर सकते हैं।

( २ ) श्वानबलि ( पत्तेपर ) - 

जनेऊको कण्ठीकर निम्नलिखित मन्त्रसे कुत्तोंको बलि दे-

द्वौ श्वानौ श्यामशबलौ वैवस्वतकुलोद्भवी।

ताभ्यामन्नं प्रयच्छामि स्यातामेतावहिंसकौ ।।

इदं श्वभ्यां न मम।

( ३ ) काकबलि ( पृथ्वीपर ) - 

अपसव्य होकर निम्नलिखित मन्त्र पढ़कर कौओंको भूमिपर अन्न दे-

ॐ ऐन्द्रवारुणवायव्या याम्या वै नैर्ऋतास्तथा।

वायसाः प्रतिगृह्णन्तु भूमौ पिण्डं मयोज्झितम् ॥

इदमन्नं वायसेभ्यो न मम।

( ४ ) देवादिबलि ( पत्तेपर ) सव्य होकर

निम्नलिखित मन्त्र पढ़कर देवता आदिके लिये अन्न दे-

ॐ देवा मनुष्याः पशवो वयांसि सिद्धाः सयक्षोरगदैत्यसङ्घाः ।

प्रेताः पिशाचास्तरवः समस्ता ये चान्नमिच्छन्ति मया प्रदत्तम् ॥

इदमन्नं देवादिभ्यो न मम।


जब किसी वंश मे वैष्णव उत्पन्न होता है।

( या वैष्णव दीक्षा ग्रहण करता है ) तो पितृ पितामह प्रसन्न होकर नृत्य करते है कि.. 
.
हमारे वंश में भगवान का भक्त उत्पन्न हुआ है,अब यह नाम जपेगा कथा सुनेगा संत सेवा करेगा। हमारा तो उद्धार निश्चित है..!!

जीवन का सबसे बड़ा अपराध , किसी की आंखों में आंसू , आपकी वज़ह से होना।

आपकी वजह से मुस्कराए कोई दूसरा!! 

तो ये दुनिया की है, सबसे बड़ी पूजा!!           
            
निस्वार्थ कर्म ही ईश्वर की सेवा है। 

इस में ही आनंद मिलेगा आपको हमेशा चेहरे पर मुस्कुराहट रखें, आपका चेहरा खिल उठेगा।

किसी के बारे में ना बुरा सोचे, ना बुरा बोलें।

इससे आप को कोई फायदा नहीं होने वाला है...?

और सबसे ऊपर ईश्वर को हमेशा याद करते रहें, और उनको धन्यवाद दें की आपको जो ईश्वर ने दिया, वो कम नहीं है।

हम स्वार्थी ना बनें, अपने स्वार्थ के लिए किसी का दिल ना दुखाएं। 

हमेशा दूसरों को साथ दें, पता नहीं ये पुण्य, ज़िन्दगी में कब आपका साथ दे जाए।

विष्णु भगवान से कर जोड़ प्रार्थना है कि आप और आपके परिवार के ऊपर अपनी कृपा बनाए रखें !
       

तीर्थ - तीर्थयते अनेन इति तीर्थ:


अर्थात् 

जिससे प्राणिमात्र संसार - सागर से तर जाते हैं , वही तीर्थ कहा जाता है।

हम सभी जानते हैं कि युग - युग से प्रयाग की प्रसिद्धि एक तीर्थराज के रूप में भारत के धर्मप्राण जनमानस में व्याप्त रही है। 

तीर्थराज के रूप में प्रयाग का वर्णन वेदों,पुराणों , उपनिषदों ,  रामायण ,  महाभारत , रघुवंश , रामचरितमानस आदि अनेक प्राचीन ग्रंथो में किया गया है।*

*पद्मपुराण में प्रयाग की महिमा*
 
 *का उल्लेख करते हुए कहा गया है -*

*ब्राह्मी पुत्री त्रिपथगास्त्रिवेणी* 
*समागमेन अक्षतयागमात्रान्।*

*यत्रप्लुतान् ब्रह्मपदं नयन्ति*
*स तीर्थराजो जयति प्रयाग:।।*

*अर्थ - 

सरस्वती , यमुना और गंगा - ये तीन नदियां जहां डुबकी लगाने वाले मनुष्यों को,जो त्रिवेणी - संगम के संपर्क से अक्षत योगफल को प्राप्त हो चुके हैं, ब्रह्मलोक में पहुंचा देती है,उस तीर्थराज प्रयाग की जय हो।








( ५ ) पिपीलिकादिबलि ( पत्तेपर ) - 


इसी प्रकार निम्नांकित मन्त्रसे चींटी आदिको बलि दे-

पिपीलिकाः

कीटपतङ्गकाद्या

बुभुक्षिताः

कर्मनिबन्धबद्धाः ।

तेषां हि तृप्त्यर्थमिदं मयान्नं

तेभ्यो विसृष्टं सुखिनो भवन्तु ॥

इदमन्नं पिपीलिकादिभ्यो न मम।

पंचबलि देनेके बाद एक थालीमें सभी रसोई परोसकर अपसव्य और दक्षिणाभिमुख होकर निम्न संकल्प करे-

अद्यामुक गोत्र अमुकशर्माऽहममुकगोत्रस्य मम पितुः ( पितामहस्य मातुः वा ) वार्षिकश्राद्धे महालय - श्राद्धे वा अक्षयतृप्त्यर्थमिदमन्नं तस्मै ( तस्यै वा ) स्वधा ।

उपर्युक्त संकल्प करनेके बाद ॐ इदमन्नम्', 'इमा आपः', 'इदमाज्यम्', 'इदं हविः' इस प्रकार बोलते हुए स्पर्श करे। 

अन्न, जल, घी तथा पुनः अन्नको दाहिने हाथके अँगूठेसे  पश्चात् दाहिने हाथमें जल, अक्षत आदि लेकर निम्न संकल्प करे-

ब्राह्मण-

भोजनका संकल्प- अद्यामुक गोत्र अमुको मम पितुः ( मातुः वा ) वार्षिकश्राद्धे यथा - संख्याकान् ब्राह्मणान् भोजयिष्ये ।

पंचबलि निकालकर कौआके निमित्त निकाला गया अन्न कौआको, कुत्ताका अन्न कुत्ताको और सब गायको देनेके बाद निम्नलिखित मन्त्रसे ब्राह्मणोंके पैर धोकर भोजन कराये।

यत् फलं कपिलादाने कार्तिक्यां ज्येष्ठपुष्करे।

तत्फलं पाण्डवश्रेष्ठ विप्राणां पादसेचने ।।

ब्राह्मण - भोजनके बाद उन्हें अन्न, वस्त्र और द्रव्य-

दक्षिणा देकर तिलक करके नमस्कार करे। 

तत्पश्चात् नीचे लिखे वाक्य यजमान और ब्राह्मण दोनों बोलें-


यजमान - शेषान्नेन किं कर्तव्यम्। ( श्राद्धमें बचे अन्नका क्या करूँ? )

ब्राह्मण- इष्टैः सह भोक्तव्यम्। ( अपने इष्ट मित्रोंके साथ भोजन करें। )

इसके बाद अपने परिवारवालोंके साथ स्वयं भी भोजन करे तथा निम्न मन्त्रद्वारा भगवान्‌को नमस्कार करे-

प्रमादात् कुर्वतां कर्म प्रच्यवेताध्वरेषु यत्।

स्मरणादेव तद्विष्णोः सम्पूर्ण स्यादिति श्रुतिः ॥

ऋग्वेद में कहा गया है -*
     
*सितासिते सरिते यत्र संगते,*
*तत्राप्लुतासो दिवमुत्पतन्ति।*
 
*ये वै तन्वं विसृजन्ति धीरास्ते* 
*जनासो अमृतत्वं भजन्ते।।*

*अर्थ - 

जो मनुष्य श्वेत - श्याम दो नदियों के संगम स्थल पर स्नान करते हैं , वे स्वर्ग को प्राप्त करते हैं। 

जो धीर मनुष्य वहां शरीर त्याग करते हैं , वे मोक्ष को प्राप्त करते हैं।*

*महाभारत के वनपर्व में उल्लेख है कि सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा जी की यज्ञभूमि प्रयाग ही रही है।*

*गंगायमुनयोर्मध्ये सङ्गमं लोकविश्रुतम्।* 
*यत्त्रयजल भूतात्मा पूर्वमेव पितामह*
*प्रयागमिति विख्यातं तस्मात् भरत सत्तम।।*

*तीर्थराज प्रयाग की महिमा का गुणगान करती हुई पद्मपुराण की पंक्तियां मुखरित हो उठती हैं -*

*कलिन्दजा संगममाप्य यत्र।*
*प्रत्यागता स्वर्गधुनी धनोति।*
 
*अध्यात्मतापत्रितयं जनस्य,*
*स तीर्थराजो जयति प्रयाग:।।*

*अर्थ - 

जहां आयी हुई गंगा कलिंदनंदिनी यमुना का संगम प्रकार मनुष्यों के तीन तापों - आध्यात्मिक , आधिदैविक और आधिभौतिक - का नाश करती है , उस तीर्थराज की जय हो।*

*भारत में तीर्थ तो बहुत से हैं , परंतु तीर्थराज तो एकमात्र प्रयाग ही है। 

अत्यंत प्राचीन काल से यह शिक्षा का एक महत्वपूर्ण केंद्र भी था। 

महर्षि भरद्वाज का गुरुकुल यहीं पर था। 

वाल्मीकि रामायण के अयोध्या कांड में प्रयागगत भरद्वाज आश्रम का जैसा विस्तृत वर्णन है.....! 

उसके अनुसार महर्षि भरद्वाज के आश्रम को एक विशाल आवासीय विश्वविद्यालय के रूप में समझा जा सकता है।

प्रभु श्री राम भी प्रयाग में भरद्वाज आश्रम में आए थे तथा महर्षि भारद्वाज ने राष्ट्रहित व संस्कृति की रक्षा हेतु उन्हें दक्षिण की ओर जाने का निर्देश दिया था। 

राम वनगमन के कुछ समय बाद महाराज दशरथ का अंतिम संस्कार करने के बाद भरत , परिवारजन , पुरजन , गुरु वशिष्ठ एवं अन्य मंत्रियों के साथ श्री राम को अयोध्या वापस लाने के प्रयास में मार्ग में प्रयाग में महर्षि भरद्वाज के आश्रम गए थे।

प्रयागराज मेंअक्षयवट के विषय में मान्यता है कि यह अजर,अमर व चिरंतन है। 

यह अनादि सनातन वृक्ष है। 

अक्षयवट का पूजन श्रद्धालुजन एन मनवांछित फल प्राप्त करने के लिए तथा मोक्ष प्राप्ति के लिए करते रहे हैं।

सनकादि कुमारों के पूछने पर अक्षयवट* 
  *के संबंध में विष्णु भगवान जी कहते हैं -*
          
*प्रयागं वैष्णवं क्षेत्रं,वैकुंठादधिकं मम।*
*वृक्षोऽक्षयश्चतत्रैव,मदाचारी विराजते ।।*

*अर्थ - 

प्रयाग मेरा क्षेत्र है,वह वैकुंठ से भी....!*

 *अधिक है। 

वहां अक्षयवट है,जो मेरा आश्रय है।*

ऐसे महिमामंडित प्रयागराज के बारे में तुलसीदास जी अयोध्या कांड में लिख ही डालते हैं -*

को कहि सकइ प्रयाग प्रभाऊ।*
        
अर्थात् प्रयागराज के माहात्म्य को कौन कह सकता है ?

ऐसे पावन प्रयागराज में पुण्यमय पूर्ण महाकुंभ लगा है। 

उसमें डुबकी लगाकर अपने तन - मन दोनों को पवित्र कर परमात्मा से मिलन की अभीप्सा अपने अंतःकरण में जागृत करें। 

( अगले अंक में प्रयागराज में महाकुंभ पर एक दृष्टि डाली जाएगी।)*
     *|| तीर्थराज प्रयाग की जय हो ||*
हर हर महादेव जय मां अंबे मां !!!!! शुभमस्तु !!! 
+++ +++
+++ +++

Tuesday, January 21, 2025

|| माघ महात्म्य ||

||  माघ महात्म्य  ||

|| माघ महात्म्य पांचवाँ अध्याय ||

   
दत्तात्रेय जी कहते हैं कि हे राजन! 

एक प्राचीन इतिहास कहता हूँ। 

भृगुवंश में ऋषिका नाम की एक ब्राह्मणी थी जो बाल्यकाल में ही विधवा हो गई थी। 

वह रेवा नदी के किनारे विन्ध्याचल पर्वत के नीचे तपस्या करने लगी। 

वह जितेन्द्रिय, सत्यवक्ता, सुशील, दानशीलता तथा तप करके देह को सुखाने वाली थी।

वह अग्नि में आहुति देकर उच्छवृत्ति द्वारा छठे काल में भोजन करती थी। 







eSplanade Brass Saraswati Maa Murti Idol Statue Sculpture for Home Decor and Temple - Multicolour - 6" Inches

https://amzn.to/4mMlsGq



वह वल्कल धारण करती थी और संतोष से अपना जीवन व्यतीत करती थी। 

उसने रेवा और कपिल नदी के संगम में साठ वर्ष तक माघ स्नान किया और फिर वहीं पर ही मृत्यु को प्राप्त हो गई ।

माघ स्नान के फल से वह दिव्य चार हजार वर्ष तक विष्णु लोक में वास करके सुंद और उपसुंद दैत्यों का नाश करने के लिए ब्रह्मा द्वारा तिलोत्तमा नाम की अप्सरा के रूप में ब्रह्मलोक में उत्पन्न हुई। 

+++ +++

वह अत्यंत रुपवती, गान विद्या में अति प्रवीण तथा मुकुट कुंडल से शोभायमान थी। 

उसका रूप, यौवन और सौंदर्य देखकर ब्रह्मा भी चकित हो गये. वह तिलोत्तमा, रेवा नदी के पवित्र जल में स्नान करके वन में बैठी थी।

तब सुंद व उपसुंद के सैनिकों ने चन्द्रमा के समान उस रुपवती को देखकर अपने राजा सुंद और उपसुंद से उसके रुप की शोभा का वर्णन किया और कहने लगे कि कामदेव को लज्जित करने वाली ऎसी परम सुंदरी स्त्री हमने कभी नहीं देखी। 

आप भी चलकर देखें तब वह दोनों मदिरा के पात्र रखकर वहाँ पर आए जहाँ पर वह सुंदरी बैठी हुई थी और मदिरा के पान विह्वल होकर काम - क्रीड़ा से पीड़ित हुए और दोनों ही आपस में उस स्त्री - रत्न को प्राप्त करने के लिए विवाद ग्रस्त हुए और फिर आपस में युद्ध करते हुए वहीं समाप्त हो गये ।
+++ +++
उन दोनों का मरा हुआ देखकर उनके सैनिकों ने बड़ा कोलाहल मचाया और तब तिलोत्तमा कालरात्रि के समान उनको पर्वत से गिराती हुई दसों दिशाओं को प्रकाशमान करती हुई आकाश में चली गई और देव कार्य सिद्ध करके ब्रह्मा के सामने आई तो ब्रह्माजी ने प्रसन्नता से कहा कि हे चन्द्रवती मैंने तुमको सूर्य के रथ पर स्थान दिया। 

जब तक आकाश में सूर्य स्थित है नाना प्रकार के भोगों को भोगो। 

सो हे राजन! वह ब्राह्मणी अब भी सूर्य के रथ पर माघ मास स्नान के उत्तम भोगों को भोग रही है इस लिए श्रद्धावान पुरुषों को उत्तम गति पाने के लिए यत्न के साथ माघ मास में विधिपूर्वक स्नान करना चाहिए।

 || माघ महात्म्य पांचवाँ अध्याय पूर्ण ||
+++ +++
*जब आप किसी भी कार्य, व्यवसाय, परिवार का नेतृत्व करते हैं। 

सबसे आवश्यक होता है कि बार बार नवीनता लाते रहें। 

जिससे लोगों में ऊर्जा बनी रहे।

कोई भी काम कितना भी रोमांचक हो उसमें
धीरे धीरे बोरियत आने लगती है। 

नौकरी पेशा व्यक्ति इसीलिये उदासीन होता है।

उसका सब कुछ निश्चित है। 
+++ +++
वह जो पाँच वर्ष पूर्व कर रहा था। 

वही आज भी करता है। 

उसे कोई असुरक्षा का भाव नहीं है। 

वह जल्दी ही बूढ़ा हो जाता है।
+++ +++
अभी कितनी नौकरी बची इसी ख्याल में जीता है।

वास्तव में हम सुरक्षा के लिये चिंतित रहते हैं।

जबकि जीवन का रोमांच असुरक्षा में होता है।

तो कुछ बड़ा करने कि प्रतीक्षा से अच्छा है।

कि कुछ नवीन अप्रत्याशित करना है।

इससे आप में और आपके साथ काम करने वालों में ऊर्जा बनी रहती है।





भव: शर्वो रुद्र: पशुपतिरथोग्र: सहमहां-
स्तथा भीमेशानाविति यदभिधानाष्टकमिदम्।

अमुष्मिन् प्रत्येकं प्रविचरति देव श्रुतिरपि
 प्रियायास्मै धाम्ने प्रविहितनमस्योऽस्मि भवते।।

हे महादेव!आपके जो आठ अभिधान ( नाम ) - भव,शर्व, रुद्र, पशुपति, उग्र, महादेव,भीम और ईशान हैं।
+++ +++
उनमें प्रत्येक में वेदमन्त्र भी पर्याप्त मात्रा में विचरण करते हैं और वेदानुगामी पुराण भी इन नामों में विचरते हैं; 

अर्थात 

वेद, पुराण सभी उन आठों नामों का अतिशय प्रतिपादन करते हैं। 

अतः परमप्रिय एवं प्रत्यक्ष समस्त जगत के आश्रय आपको मैं साष्टांग प्रणाम करता हूं।

*|| जय गौरीशंकर महादेव ||*
+++ +++
कुंभ में स्नान का महत्व-
     
*सहस्त्र कार्तिके स्नानं माघे स्नान शतानि च।*
*वैशाखे नर्मदाकोटिः कुंभस्नानेन तत्फलम्।।*

*अश्वमेघ सहस्त्राणि वाजवेय शतानि च।*
*लक्षं प्रदक्षिणा भूम्याः कुंभस्नानेन तत्फलम्।*
 
अर्थ:- 

कुंभ में किए गए एक स्नान का फल कार्तिक मास में किए गए हजार स्नान, माघ मास में किए गए सौ स्नान व वैशाख मास में नर्मदा में किए गए करोड़ों स्नानों के बराबर होता है। 

हजारों अश्वमेघ, सौ वाजपेय यज्ञों तथा एक लाख बार पृथ्वी की परिक्रमा करने से जो पुण्य मिलता है, वह कुंभ में एक स्नान करने से प्राप्त हो जाता है।

  || तीर्थराज प्रयाग की जय हो ||
+++ +++  
अजगर बने अघासुर का*l
  
 वध किया श्री कृष्ण ने....!
        
*भागवत में श्री कृष्ण द्वारा वृंदावन मे की गई लीलाओं में एक दिन भगवान श्री कृष्ण ग्वाल-बालों के साथ गायों को चराने वन में गए। 

उसी समय वहां अघासुर नाम का भयंकर दैत्य भी आ गया । 

वह पूतना और बकासुर का छोटा भाई तथा कंस का भेजा हुआ था।

वह इतना भयंकर था कि देवता भी उससे भयभीत रहते थे और इस बात की बाट देखते थे कि किसी प्रकार से इसकी मृत्यु का अवसर आ जाए।*
+++ +++
*श्री कृष्ण को मारने के लिए अघासुर ने अजगर का रूप धारण कर लिया और मार्ग में लेट गया। 

उसका वह अजगर शरीर एक योजन लम्बे बड़े पर्वत के समान विशाल एवं मोटा था।

अघासुर का यह रूप देखकर बालकों ने समझा कि यह भी वृंदावन की कोई शोभा है।*

*उसका मुंह किसी गुफा की तरह दिखता था। 
+++ +++
बाल-ग्वाल उसे समझ न सके और कौतुकवश उसे देखने लगे।

देखते- देखते वे अजगर के मुंह में ही घुस गए। 

लेकिन श्री कृष्ण अघासुर की माया को समझ गए।*

अघासुर बछड़ों और ग्वालबालों के सहित भगवान श्री कृष्ण को अपनी डाढ़ों से चबाकर चूर-चूर कर डालना चाहता था। 
+++ +++
परन्तु उसी समय श्री कृष्ण ने अपने शरीर को बड़ी फुर्ती से बढ़ा लिया कि अजगररुपी अघासुर का गला ही फट गया। 

आंखें उलट गईं। 

सांस रुककर सारे शरीर में भर गई और उसके प्राण निकल गए।* 

इस प्रकार सारे बाल-ग्वाल और गौधन भी सकुशल ही अजगर के मुंह से बाहर निकल आए। 

कान्हा ने फिर सबको बचा लिया। 

सब मिलकर कान्हा की जय - जयकार करने लगे।*





|| कामदेव के 5 पुष्प बाण ||

1- अरविंद (कमल) सन्मोहन

 2-अशोक उत्माद

3-आम्र मंजरी दहन

 4-नवमालिका शोषण / व्याकुलता -

5-नीलोत्पल स्तभन / मूव्या का विवरण
+++ +++
1-अरविंद ( कमल ) अरविंद ( कमल ) का बाण आकर्षण और सन्मोहन का प्रतीक है। 
यह प्रेमी को मोहित और मुग्ध कर देता है।

2-अशोक उत्माद:- अशोक के फूल विरह में पागलपन ( उत्माद ) उत्पन्न करते हैं, जो भावनाओं की तीव्रता को बढ़ाते हैं।

3-आम्र मंजरी दहन:- आम की मंजरियां काम के ताप को बढ़ाती हैं, जिसे विरह में 'दहन' यानी जलाने वाला कहा गया है।

4- नवमालिका शोषण / व्याकुलता:- यह फूलों की एक लता ( नवलता ) है, जो विरह में प्रेम के सूखेपन ( शोषण ) और गहरी व्याकुलता का कारण बनती है।

5. नीलोत्पल स्तभन:- नीले कमल का बाण प्रेम में स्तब्ध या जड़ ( स्तभन ) कर देने वाली !
+++ +++
+++ +++ 
                     🙏🕉️🙏