।। पितृ पक्ष का शास्त्रोक्त रहस्य ।।
पितृ पक्ष का शास्त्रोक्त रहस्य ;
पितृ पक्ष का शास्त्रोक्त रहस्य — वेद, उपनिषद, स्मृति, महाभारत और पुराणों में पितृ - यज्ञ, श्राद्ध, तर्पण एवं पिण्डदान ;
पितृ पक्ष सनातन परंपरा में केवल मृत पूर्वजों को याद करने का समय नहीं है।
इस के पीछे ऋण, कर्तव्य, श्रद्धा, तर्पण, पितृ - यज्ञ और वंश - परंपरा का अत्यंत प्राचीन वैदिक सिद्धांत है।
INDIAN ART VILLA Pure Copper Round Shape Pooja Kalash Lota With Om, Swastik & Shree Embossed Kalshi Design, Traditional Worship Vessel For Temple And Home, 750 Milliliter Capacity
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सबसे पहले यह समझना आवश्यक है कि शास्त्रों में पितृ शब्द केवल पिता के लिए नहीं, बल्कि दिवंगत पूर्वजों तथा पितृ-परंपरा के व्यापक अर्थ में प्रयुक्त होता है।
ऋग्वेद में पितरों के लिए स्वतंत्र सूक्त है।
ऋग्वेद मण्डल 10, सूक्त 15 में पितरों का आवाहन, उन्हें नमस्कार, हवि स्वीकार करने का निमंत्रण तथा उनकी रक्षा की प्रार्थना स्पष्ट रूप से आती है।
पितृपक्ष
पञ्चसूनाजनितदोषपरिहारार्थं च पञ्चबलिदानं करिष्ये।
पंचबलि- विधि ;
(१) गोबलि (पत्तेपर) - मण्डलके बाहर पश्चिमकी और निम्नलिखित मन्त्र पढ़ते हुए सव्य होकर गोबलि पत्तेपर दे-
ॐ सौरभेय्यः सर्वहिताः पवित्राः पुण्यराशयः ।
प्रतिगृह्णन्तु मे ग्रासं गावस्त्रैलोक्यमातरः ॥
इदं गोभ्यो न मम।
यदि मन्त्र स्मरण न रहे तो केवल 'गोभ्यो नमः' आदि नाम-मन्त्रसे बलि-प्रदान कर सकते हैं।
(२) श्वानबलि (पत्तेपर) - जनेऊको कण्ठीकर निम्नलिखित मन्त्रसे कुत्तोंको बलि दे-
द्वौ श्वानौ श्यामशबलौ वैवस्वतकुलोद्भवी।
ताभ्यामन्नं प्रयच्छामि स्यातामेतावहिंसकौ ।।
इदं श्वभ्यां न मम।
(३) काकबलि (पृथ्वीपर) - अपसव्य होकर निम्नलिखित मन्त्र पढ़कर कौओंको भूमिपर अन्न दे-
ॐ ऐन्द्रवारुणवायव्या याम्या वै नैर्ऋतास्तथा।
वायसाः प्रतिगृह्णन्तु भूमौ पिण्डं मयोज्झितम् ॥
इदमन्नं वायसेभ्यो न मम।
(४) देवादिबलि (पत्तेपर) सव्य होकर
निम्नलिखित मन्त्र पढ़कर देवता आदिके लिये अन्न दे-
ॐ देवा मनुष्याः पशवो वयांसि
सिद्धाः
सयक्षोरगदैत्यसङ्घाः ।
प्रेताः पिशाचास्तरवः समस्ता
ये चान्नमिच्छन्ति मया प्रदत्तम् ॥
इदमन्नं देवादिभ्यो न मम।
(५) पिपीलिकादिबलि (पत्तेपर)- इसी प्रकार निम्नांकित मन्त्रसे चींटी आदिको बलि दे-
पिपीलिकाः
कीटपतङ्गकाद्या
बुभुक्षिताः
कर्मनिबन्धबद्धाः ।
तेषां हि तृप्त्यर्थमिदं मयान्नं
तेभ्यो विसृष्टं सुखिनो भवन्तु ॥
इदमन्नं पिपीलिकादिभ्यो न मम।
पंचबलि देनेके बाद एक थालीमें सभी रसोई परोसकर अपसव्य और दक्षिणाभिमुख होकर निम्न संकल्प करे-
अद्यामुक गोत्र अमुकशर्माऽहममुकगोत्रस्य मम पितुः ( पितामहस्य मातुः वा ) वार्षिकश्राद्धे ( महालय - श्राद्धे वा अक्षयतृप्त्यर्थमिदमन्नं तस्मै ( तस्यै वा ) स्वधा ।
उपर्युक्त संकल्प करनेके बाद ॐ इदमन्नम्', 'इमा आपः', 'इदमाज्यम्', 'इदं हविः' इस प्रकार बोलते हुए स्पर्श करे।
अन्न, जल, घी तथा पुनः अन्नको दाहिने हाथके अँगूठेसे
पश्चात् दाहिने हाथमें जल, अक्षत आदि लेकर
निम्न संकल्प करे-
ब्राह्मण-भोजनका संकल्प- अद्यामुक गोत्र अमुको मम पितुः (मातुः वा) वार्षिकश्राद्धे यथा-
संख्याकान् ब्राह्मणान् भोजयिष्ये ।
पंचबलि निकालकर कौआके निमित्त निकाला गया अन्न कौआको, कुत्ताका अन्न कुत्ताको और सब गायको देनेके बाद निम्नलिखित मन्त्रसे ब्राह्मणोंके पैर धोकर भोजन कराये।
यत् फलं कपिलादाने कार्तिक्यां ज्येष्ठपुष्करे।
तत्फलं पाण्डवश्रेष्ठ विप्राणां पादसेचने ।।
ब्राह्मण - भोजनके बाद उन्हें अन्न, वस्त्र और द्रव्य-
दक्षिणा देकर तिलक करके नमस्कार करे।
तत्पश्चात् नीचे लिखे वाक्य यजमान और ब्राह्मण दोनों बोलें-
यजमान - शेषान्नेन किं कर्तव्यम्।
( श्राद्धमें बचे अन्नका क्या करूँ?)
ब्राह्मण- इष्टैः सह भोक्तव्यम्। (अपने इष्ट मित्रोंके साथ भोजन करें।)
इसके बाद अपने परिवारवालोंके साथ स्वयं भी भोजन करे तथा निम्न मन्त्रद्वारा भगवान्को नमस्कार करे-
प्रमादात् कुर्वतां कर्म प्रच्यवेताध्वरेषु यत्।
स्मरणादेव तद्विष्णोः सम्पूर्ण स्यादिति श्रुतिः ॥
ऋग्वेद — पितृ उपासना का मूल वैदिक प्रमाण ;
पितृ पक्ष की चर्चा करते समय सबसे पहले ऋग्वेद 10.15 — पितृसूक्त को देखना चाहिए।
मंत्र में कहा गया है—
“इदं पित्र्भ्यो नमो अस्त्वद्य…”
अर्थात् आज पितरों को नमस्कार हो।
इसी सूक्त में पूर्वजों का स्मरण, पितरों का आवाहन तथा अग्नि द्वारा पितरों तक हवि पहुँचाने की भावना दिखाई देती है।
ऋग्वेद 10.15 में अग्नि को पितरों के लिए प्रस्तुत हवि पहुँचाने वाला माध्यम भी माना गया है।
एक अन्य मंत्र में पितरों को इस प्रकार संबोधित किया गया है कि वे हवि स्वीकार करें और संतति की रक्षा करें।
इस से स्पष्ट होता है कि पितृ-श्रद्धा कोई केवल बाद की पुराणिक कल्पना नहीं है; इसकी जड़ वैदिक साहित्य में है।
इस लिए पितृ पक्ष के मूल को समझना हो तो ऋग्वेद 10.14 और 10.15 अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
ऋग्वेद 10.15 विशेष रूप से पितरों को समर्पित सूक्त है।
यजुर्वेदीय परंपरा — पितृयज्ञ और श्राद्ध की कर्म - विधि ;
ऋग्वेद जहाँ पितरों के प्रति वैदिक श्रद्धा और हवि की मूल भावना दिखाता है, वहीं यजुर्वेदीय श्रौत एवं गृह्य परंपराएँ पितृयज्ञ तथा संस्कारों की कर्म-पद्धति को अधिक व्यवस्थित रूप देती हैं।
यहाँ से हमें यह समझ आता है कि पितरों के लिए केवल स्मरण पर्याप्त नहीं माना गया, बल्कि नियमपूर्वक कर्म का भी महत्व है।
इसी वैदिक कर्मपरंपरा में देवयज्ञ के साथ पितृयज्ञ को गृहस्थ के कर्तव्यों में स्थान मिलता है।
आगे चलकर यही परंपरा श्राद्ध, तर्पण, पिण्ड तथा पितृकर्म के विस्तृत विधान में विकसित हुई।
इस लिए यदि कोई पूछे कि पितृ पक्ष केवल पुराणों से आया है या वेद से भी इसका संबंध है, तो उत्तर स्पष्ट है—
पितृ-यज्ञ और पितृ-उपासना का मूल वैदिक है।
अथर्ववेद — पूर्वज, मृत्यु और जीवन की वैदिक दृष्टि ;
अथर्ववेद में भी मृत्यु, मृत व्यक्ति, पूर्वजों तथा जीवन - मृत्यु के संबंध में अनेक मंत्र मिलते हैं।
अथर्ववेद की परंपरा मृत्यु को केवल शरीर की समाप्ति के रूप में नहीं देखती, बल्कि मृतक के आगे के मार्ग, परिवार की रक्षा तथा जीवन में पुनः व्यवस्था स्थापित करने की धार्मिक भावना से जोड़ती है।
इस लिए पितृकर्म की व्यापक वैदिक पृष्ठभूमि बनाते समय ऋग्वेद के साथ अथर्ववेद को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
उपनिषद — पितृलोक की दार्शनिक व्याख्या ;
पितृ संबंधी विचार केवल कर्मकाण्ड तक सीमित नहीं रहे।
छान्दोग्य उपनिषद् में देवयान और पितृयान की प्रसिद्ध वैदिक-उपनिषदिक अवधारणा आती है।
यहाँ मृत्यु के बाद जीव की गति के दो मार्गों का वर्णन मिलता है— एक देवों की ओर जाने वाला मार्ग और दूसरा पितरों से संबंधित मार्ग।
इससे यह बात सामने आती है कि पितृलोक की धारणा पुराणों से पहले की है।
अर्थात् पितृ पक्ष को केवल “मृत पूर्वजों को भोजन कराने” तक सीमित कर देना शास्त्रीय दृष्टि से अधूरा होगा।
इसके पीछे जीव, कर्म, मृत्यु और पुनर्जन्म की व्यापक वैदिक-दर्शन परंपरा भी जुड़ी हुई है।
मनुस्मृति और धर्मशास्त्र — पितृयज्ञ को गृहस्थ धर्म बनाना ;
बाद में मनुस्मृति, याज्ञवल्क्य स्मृति तथा अन्य धर्मशास्त्रों ने श्राद्ध और पितृयज्ञ की सामाजिक एवं धार्मिक व्यवस्था को अधिक स्पष्ट किया।
गृहस्थ के लिए देवयज्ञ, ऋषियज्ञ, पितृयज्ञ, भूतयज्ञ और अतिथियज्ञ जैसी पंचमहायज्ञ परंपरा विकसित हुई।
यहाँ मूल सिद्धांत यह है कि मनुष्य अकेला नहीं है।
उसके जीवन में देव, ऋषि, पूर्वज, प्राणी और समाज— इन सबके प्रति दायित्व है।
इस दृष्टि से पितृयज्ञ “भय” का कर्म नहीं बल्कि ऋण और कृतज्ञता का कर्म है।
महाभारत — श्राद्ध का अत्यंत महत्वपूर्ण प्रमाण ;
पितृ पक्ष के प्रमाणों में महाभारत का अनुशासन पर्व अत्यंत महत्वपूर्ण है।
युधिष्ठिर द्वारा भीष्म से श्राद्ध के विषय में प्रश्न और भीष्म द्वारा उसके उत्तर का विस्तृत वर्णन मिलता है।
अनुशासन पर्व के श्राद्ध संबंधी अध्यायों में श्राद्ध का समय, विधि, पितरों को अर्पण, अन्न तथा विभिन्न पदार्थों का वर्णन मिलता है।
अध्याय 91 को ही श्राद्ध - विधि और वर्जित पदार्थों के विवेचन के रूप में संरचित किया गया है।
महाभारत में नक्षत्रों के अनुसार श्राद्ध के फल का भी वर्णन आता है।
इस से पता चलता है कि श्राद्ध की परंपरा को केवल अमावस्या तक सीमित नहीं किया गया था; तिथि, नक्षत्र, काल और विधि का भी विचार था।
इस लिए पितृ पक्ष की शास्त्रीय समझ में महाभारत अनुशासन पर्व को अवश्य शामिल करना चाहिए।
Anshraj Handcrafted Brass Kalash 140g for Pooja, Temple & Home Decor (140, Grams)
| { Colour | Copper |
| Brand | Anshraj |
| Product Dimensions | 8L x 8W x 8H Centimeters |
| Style | Classic |
| Special Feature | Lightweight } |
{ About this item
- ✨ Brass Construction Crafted from durable brass with a polished finish, offering a traditional appearance suitable for daily and festive use.
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श्री गरुड़ पुराण — मृत्यु के बाद पितृकर्म का विस्तृत विधान ;
पितृकर्म के विषय में सबसे अधिक चर्चित पुराणों में गरुड़ पुराण है।
गरुड़ पुराण में मृत्यु के बाद किए जाने वाले संस्कार, प्रेतभाव, पिण्डदान, तर्पण, श्राद्ध और सपिण्डीकरण आदि का विस्तृत वर्णन मिलता है।
एक महत्वपूर्ण स्थान पर भगवान विष्णु गरुड़ को बताते हैं कि सपिण्डीकरण के द्वारा प्रेतावस्था से पितृवर्ग में प्रवेश का विधान समझाया जाता है।
गरुड़ पुराण के श्राद्ध संबंधी अध्यायों में यह भी वर्णित है कि मृतक के लिए अलग - अलग काल में पिण्ड तथा श्राद्धकर्म की व्यवस्था है।
इस लिए गरुड़ पुराण का मुख्य योगदान यह है कि वह मृत्यु से लेकर पितृस्थिति और श्राद्ध - सपिण्डीकरण तक की धार्मिक संरचना को विस्तार से समझाता है।
श्री विष्णु पुराण — पितृलोक और श्राद्ध परंपरा ;
विष्णु पुराण भी पितृ - संबंधी वैदिक - पौराणिक विश्वदृष्टि का महत्वपूर्ण ग्रंथ है।
इस में ब्रह्मांडीय व्यवस्था, लोकों, देवताओं, पितरों तथा कर्मफल की व्यापक चर्चा आती है।
विष्णु पुराण को केवल भगवान विष्णु की कथाओं का ग्रंथ समझना पर्याप्त नहीं है।
इस में सृष्टि, जीव, कर्म, लोक तथा धार्मिक कर्तव्यों की विस्तृत व्यवस्था है।
इस लिए पितृ विषय के अध्ययन में विष्णु पुराण को गरुड़ पुराण के साथ पढ़ना अधिक शास्त्रीय दृष्टि देता है।
श्रीमद्भागवत महापुराण — पितृकर्म से आगे भक्ति का सिद्धांत ;
श्रीमद्भागवत महापुराण में भी पितृ, श्राद्ध और धार्मिक कर्तव्य का संदर्भ आता है।
लेकिन भागवत का विशेष महत्व यह है कि वह कर्मकाण्ड से आगे जाकर भगवत् - भक्ति, वैराग्य और आत्मतत्त्व को अंतिम आध्यात्मिक लक्ष्य के रूप में स्थापित करता है।
इस लिए भागवत से पितृ पक्ष का संदेश केवल इतना नहीं निकलता कि “पितरों को अन्न दो”; बल्कि यह भी समझ आता है कि जीवन में धर्म, भक्ति और आत्मकल्याण का मार्ग सर्वोच्च उद्देश्य है।
मत्स्य पुराण — श्राद्ध की विधि का स्पष्ट प्रमाण ;
पितृ पक्ष के विषय में एक महत्वपूर्ण नाम मत्स्य पुराण का भी है।
मत्स्य पुराण में श्राद्ध के संबंध में अलग से चर्चा मिलती है।
उपलब्ध अध्ययन में इसके अध्याय 15 को श्राद्ध - विधि से संबंधित बताया गया है और उसमें अग्नि, सोम तथा यम को अर्पण के बाद पितरों को अर्पण की व्यवस्था का उल्लेख मिलता है।
अर्थात् आपकी सूची में मत्स्य पुराण अवश्य जोड़ा जाना चाहिए।
अग्नि पुराण — श्राद्ध और तर्पण की परंपरा ;
अग्नि पुराण भी कर्मकाण्ड, संस्कार, दान, श्राद्ध तथा धार्मिक विधियों के विस्तृत विवेचन वाले पुराणों में है।
इस लिए पितृ पक्ष के शास्त्रीय अध्ययन में अग्नि पुराण को भी सहायक ग्रंथ माना जा सकता है।
विशेष रूप से जब प्रश्न हो कि श्राद्ध में क्या किया जाए, किन पदार्थों का उपयोग हो, किस प्रकार दान और कर्म किए जाएँ, तब धर्मशास्त्रीय और पुराणिक विधानों को साथ देखकर ही निष्कर्ष निकालना उचित है।
अन्य महत्वपूर्ण ग्रंथ कौन - कौन से हैं ?
पितृ विषय के लिए आपकी मूल सूची में निम्न ग्रंथ जोड़े जा सकते हैं—
वेद एवं वैदिक साहित्य ;
ऋग्वेद — विशेषतः 10.14 और 10.15
यजुर्वेदीय परंपरा
अथर्ववेद
ब्राह्मण एवं गृह्यसूत्र परंपरा
छान्दोग्य उपनिषद्
स्मृति एवं धर्मशास्त्र
मनुस्मृति
याज्ञवल्क्य स्मृति
अन्य श्राद्ध-विधि संबंधी धर्मसूत्र एवं गृह्यसूत्र
इतिहास
महाभारत — विशेषतः अनुशासन पर्व
महापुराण
गरुड़ पुराण
विष्णु पुराण
श्रीमद्भागवत महापुराण
मत्स्य पुराण
अग्नि पुराण
ब्रह्म पुराण
पद्म पुराण
मार्कण्डेय पुराण
कूर्म पुराण आदि में भी पितृ, श्राद्ध, दान और धर्म से संबंधित सामग्री मिलती है।
पितृ पक्ष का वास्तविक शास्त्रीय अर्थ ;
अब मूल बात सीधी समझिए।
पितृ पक्ष केवल डर का समय नहीं है।
यह पितरों के प्रति—
श्रद्धा + स्मरण + तर्पण + पिण्डदान + दान + पितृयज्ञ + धर्मपालन का समय है।
“श्राद्ध” शब्द ही श्रद्धा से संबंधित है।
इस लिए कर्म का बाहरी रूप जितना महत्वपूर्ण है, उतनी ही महत्वपूर्ण है श्रद्धा और शुद्ध भावना।
ऋग्वेद में पितरों को नमस्कार और हवि का उल्लेख मिलता है।
गरुड़ पुराण में मृत्यु के बाद की पितृकर्म व्यवस्था और सपिण्डीकरण का विस्तृत विवेचन मिलता है।
महाभारत अनुशासन पर्व में श्राद्ध के काल, विधि और अर्पणों का विस्तार है।
मत्स्य पुराण में भी श्राद्ध - विधि का स्वतंत्र विवेचन मिलता है।
इस लिए पितृ पक्ष की परंपरा को केवल किसी एक पुराण की कथा कह देना शास्त्रीय रूप से अधूरा निष्कर्ष होगा।
तर्पण, पिण्डदान और श्राद्ध — तीनों एक ही नहीं
यह अंतर भी बहुत आवश्यक है।
तर्पण में जल आदि के द्वारा पितरों का तर्पण किया जाता है।
पिण्डदान में निर्धारित विधि से पिण्ड अर्पित किए जाते हैं।
श्राद्ध व्यापक धार्मिक कर्म है, जिसमें पितरों के निमित्त श्रद्धापूर्वक निर्धारित विधि, अर्पण, ब्राह्मण - सत्कार, दान आदि का विधान परंपरा के अनुसार आता है।
गरुड़ पुराण में तर्पण, पिण्ड और सपिण्डीकरण की अलग - अलग धार्मिक भूमिका दिखाई देती है।
इस लिए “पितृ पक्ष में केवल पानी डालना ही श्राद्ध है” कहना भी पूर्ण शास्त्रीय परिभाषा नहीं है।
Putrika Traditional Brass Utensil Kudam | Ghada | Water Pot | Pooja Kalash for Ceremonies | Theertha | Kumbha | Pithalai| Handi [Weight:490g Capacity:1.5L] - Brass Kudam Size (Small)
{ About this item
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- Shape: Classic pot-bellied design with a rounded bottom and narrow neck, ensuring coolness and preventing spills.
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- Care: Easy to clean with warm water and mild detergent, regular drying recommended to prevent tarnish }
पितृ पक्ष में क्या मूल भावना रखनी चाहिए ?
शास्त्र का सार निकालें तो पितृ पक्ष में पाँच बातें विशेष रूप से समझनी चाहिए—
पहली — श्रद्धा।
पितरों का स्मरण सम्मान के साथ हो।
दूसरी — तर्पण।
परंपरा में निर्धारित विधि से जल अर्पण किया जाए।
तीसरी — श्राद्ध।
अपनी कुलपरंपरा और अधिकार के अनुसार विधिपूर्वक श्राद्ध किया जाए।
चौथी — दान।
सामर्थ्य के अनुसार अन्न, वस्त्र, गौसेवा, ब्राह्मण-सत्कार या अन्य धर्मसम्मत दान किया जाए।
पाँचवीं — सदाचार।
पितरों के नाम पर कर्म करने के साथ अपने जीवन में सत्य, धर्म, संयम और कर्तव्य का पालन किया जाए।
निष्कर्ष ;
इस लिए आपके प्रश्न का सीधा शास्त्रोक्त उत्तर यह है कि पितृ पक्ष के अध्ययन में केवल ऋग्वेद, श्रीमद्भागवत, गरुड़ पुराण और विष्णु पुराण ही पर्याप्त सूची नहीं है।
सबसे महत्वपूर्ण विस्तृत आधार इस क्रम में देखा जा सकता है—
ऋग्वेद 10.14–10.15 → यजुर्वेदीय पितृयज्ञ परंपरा → अथर्ववेद → उपनिषदों की पितृयान परंपरा → मनुस्मृति/याज्ञवल्क्य स्मृति → महाभारत अनुशासन पर्व → गरुड़ पुराण → विष्णु पुराण → श्रीमद्भागवत → मत्स्य पुराण → अग्नि पुराण तथा अन्य पुराण।
इनमें ऋग्वेद 10.15 पितृसूक्त, महाभारत अनुशासन पर्व का श्राद्ध - विधान, गरुड़ पुराण का प्रेत एवं श्राद्ध - विधान और मत्स्य पुराण का श्राद्ध - विवेचन विशेष रूप से सीधे प्रमाण देते हैं।
अतः पितृ पक्ष की शास्त्रीय जड़ वेद में, उसकी दार्शनिक व्याख्या उपनिषदों में, उसकी धर्मशास्त्रीय व्यवस्था स्मृतियों में, और उसकी विस्तृत कर्म - विधि महाभारत तथा पुराणों में विकसित दिखाई देती है।
यही पितृ पक्ष का अधिक सटीक, प्रमाण-आधारित और शास्त्र-सम्मत स्वरूप है—
किसी व्यक्ति, गाँव, राज्य या देश की काल्पनिक कथा पर आधारित नहीं।
हर हर महादेव जय मां अंबे मां !!!!! शुभमस्तु !!!
🙏हर हर महादेव हर...!!
जय माँ अंबे ...!!!🙏🙏
पंडित राज्यगुरु प्रभुलाल पी. वोरिया क्षत्रिय राजपूत जड़ेजा कुल गुर: -
श्री सरस्वति ज्योतिष कार्यालय
PROFESSIONAL ASTROLOGER EXPERT IN:-
-: 1987 YEARS ASTROLOGY EXPERIENCE :-
(2 Gold Medalist in Astrology & Vastu Science)
" Opp. Shri Satvara vidhyarthi bhuvn,
" Shri Aalbai Niwas "
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नोट ये मेरा शोख नही हे मेरा जॉब हे कृप्या आप मुक्त सेवा के लिए कष्ट ना दे .....
जय द्वारकाधीश....
जय जय परशुरामजी...🙏🙏🙏