सूर्य की गति से ऋतुचक्र तक ;
सूर्य की गति से ऋतुचक्र तक, श्रीमद्भागवत में बताया गया कुम्हार के घूमते चाक का रहस्य :
सूर्य की गति से ऋतुचक्र तक और कुम्हार के घूमते चाक का रहस्य :
जन्मकुंडली, प्रश्नकुंडली, गोचर, नक्षत्र और कालचक्र का शास्त्रीय विवेचन :
भारतीय ज्ञानपरम्परा में सूर्य केवल आकाश में दिखाई देने वाला प्रकाश - पिण्ड नहीं, बल्कि काल की गणना, ऋतु के परिवर्तन और जीवन की नियमितता को समझने का प्रमुख आधार है।
वैदिक साहित्य में काल को चक्र कहा गया है और श्रीमद्भागवत में सूर्य की गति को समझाने के लिए कुम्हार के चाक का दृष्टान्त दिया गया है।
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यहाँ एक महत्वपूर्ण बात पहले समझ लेना आवश्यक है।
ऋग्वेद, पुराण और प्राचीन ज्योतिषग्रन्थों में सूर्य, काल, ऋतु, राशि और नक्षत्र का विवेचन मिलता है; लेकिन आधुनिक कृष्णमूर्ति पद्धति, आधुनिक अंकशास्त्र आदि को सीधे ऋग्वेद या भागवत का सिद्धान्त कहना शास्त्रीय दृष्टि से उचित नहीं है।
कृष्णमूर्ति पद्धति बीसवीं शताब्दी में के. एस. कृष्णमूर्ति द्वारा विकसित आधुनिक ज्योतिषीय पद्धति है और उसमें नक्षत्र के भीतर Sub-lord जैसी सूक्ष्म गणना जोड़ी गई।
श्रीमद्भागवत महापुराण के पंचम स्कंध के 21वें और 22वें अध्याय में सूर्य की गति, कालचक्र, ऋतुओं तथा विभिन्न ग्रहों और नक्षत्रों की स्थिति का विशद वर्णन मिलता है।
यह वर्णन प्राचीन भारतीय ब्रह्मांड-विज्ञान की एक महत्वपूर्ण झलक प्रस्तुत करता है, जिसमें सूर्य को काल की गणना और लोक-व्यवस्था का प्रमुख आधार माना गया है।
इस भेद को ध्यान में रखकर ही शास्त्र का वास्तविक सार समझना चाहिए।
ऋग्वेद का कालचक्र — बारह आरे वाला चक्र ;
ऋग्वेद 1.164 में ऋषि दीर्घतमा ने एक रहस्यमय चक्र का वर्णन किया है।
मंत्र में कहा गया है—
“द्वादशारं नहि तज्जराय...”
अर्थात् ऐसा चक्र है जिसके बारह भाग हैं और जो क्षीण नहीं होता।
आगे 360 की संख्या और चक्र के केन्द्रों का उल्लेख आता है।
परम्परागत भाष्य में इस चक्र को वर्ष और उसके काल - विभागों से जोड़ा गया है।
इसका गहरा अर्थ यह है कि भारतीय दृष्टि में समय सीधी रेखा मात्र नहीं है।
समय चलता है, घूमता है, पुनः लौटता है—
दिन के बाद रात, रात के बाद दिन; ऋतु के बाद ऋतु; मास के बाद मास और वर्ष के बाद वर्ष।
यही कारण है कि ज्योतिष में कालचक्र शब्द इतना महत्वपूर्ण बनता है।
श्रीमद्भागवत में सूर्य की गति को समझाने के लिए कुम्हार के घूमते हुए चाक का उदाहरण दिया गया है।
जिस प्रकार घूमते हुए चाक पर बैठी चींटी चक्र के अलग - अलग स्थानों पर दिखाई देती है, उसी प्रकार कालचक्र में स्थित सूर्य भी अपनी गति के कारण विभिन्न राशियों और नक्षत्रों में स्थित दिखाई देता है।
सूर्य मेरु पर्वत और ध्रुव को अपने दाईं ओर रखते हुए कालचक्र में भ्रमण करता है।
श्रीमद्भागवत के अनुसार साक्षात् आदि पुरुष भगवान नारायण ने लोकों के कल्याण तथा कर्मों की सिद्धि के लिए अपने वेदमय स्वरूप काल को बारह भागों में विभाजित किया है।
इन बारह भागों को बारह मास कहा गया है तथा इन्हें छह ऋतुओं, वसंत, ग्रीष्म, वर्षा, शरद, हेमंत और शिशिर में व्यवस्थित किया गया है।
श्रीमद्भागवत का कुम्हार का चाक ;
अब आते हैं आपके प्रश्न के मुख्य रहस्य पर।
श्रीमद्भागवत महापुराण के पंचम स्कन्ध, 22वें अध्याय में राजा परीक्षित सूर्य की गति के संबंध में प्रश्न करते हैं।
शुकदेवजी उत्तर देते हुए कहते हैं कि जैसे कुम्हार का चाक घूमता है और उस चाक पर चलने वाली छोटी - छोटी चींटियाँ अपनी गति से भी चलती हैं, वैसे ही कालचक्र में सूर्य और दूसरे ग्रहों की गति को समझना चाहिए।
यह दृष्टान्त अत्यंत महत्वपूर्ण है।
एक ही चाक पर तीन प्रकार की गति दिखाई दे सकती है—
पहली—चाक की अपनी गति।
दूसरी—उस पर स्थित वस्तु की गति।
तीसरी—उस वस्तु के भीतर चलने वाली सूक्ष्म गति।
इसी प्रकार ज्योतिषीय दृष्टि से एक व्यक्ति का जीवन केवल जन्मकुंडली से नहीं समझा जाता।
उसमें—
जन्मकाल का स्थिर संस्कार + वर्तमान ग्रहगोचर + दशा / अन्तर्दशा + नक्षत्रीय स्थिति + प्रश्नकाल
इन सबको मिलाकर काल की अभिव्यक्ति को समझा जाता है।
श्रीमद्भागवत का चाक इसलिए केवल कहानी नहीं है; यह सापेक्ष गति को समझाने वाला दार्शनिक दृष्टान्त है।
सूर्य और ग्रह एक व्यवस्था के भीतर गति करते हुए भी अलग - अलग राशियों और नक्षत्रों में दिखाई देते हैं।
श्रीमद्भागवत में सूर्य को समस्त लोकों की आत्मा कहा गया है।
वह पृथ्वी और द्युलोक के मध्य स्थित आकाशमंडल में कालचक्र के भीतर भ्रमण करता हुआ संवत्सर के विभिन्न अंगों अर्थात् बारह मासों का निर्माण करता है।
सूर्य के वार्षिक मार्ग का छठा भाग एक ऋतु के रूप में माना गया है।
इस प्रकार सूर्य की गति केवल आकाशीय पिंड की गति के रूप में ही नहीं, बल्कि काल की गणना और ऋतु - चक्र की व्यवस्था के आधार के रूप में भी वर्णित की गई है।
सूर्य के मार्ग के आधे भाग को पार करने में जितना समय लगता है, उसे अयन कहा जाता है।
इसी प्रकार सूर्य के वार्षिक चक्र से संबंधित विभिन्न काल - संज्ञाएँ, संवत्सर, परिसंवत्सर, इडावत्सर, अनुवत्सर और वत्सर का भी वर्णन मिलता है।
सूर्य से वर्ष और ऋतु कैसे बनती है ?
श्रीमद्भागवत 5.22.5 में सूर्य के बारह राशियों से गुजरने और वर्ष के विभाजन का वर्णन मिलता है।
वहाँ कहा गया है कि सूर्य कालचक्र में बारह मासों से होकर गुजरता है और दो मास का काल एक ऋतु माना जाता है।
इस प्रकार छह ऋतुएँ वर्ष का निर्माण करती हैं।
भारतीय षड्ऋतु व्यवस्था है—
वसन्त
ग्रीष्म
वर्षा
शरद्
हेमन्त
शिशिर
इस लिए ऋतु केवल मौसम का नाम नहीं है। शास्त्रीय दृष्टि में ऋतु काल की एक संगठित अवस्था है।
सूर्य की स्थिति बदलती है → काल-विभाग बदलता है → ऋतु बदलती है → प्रकृति की दशा बदलती है → मनुष्य के कर्म और जीवनचर्या पर उसका प्रभाव पड़ता है।
शुकदेव जी महाराज राजा परीक्षित को बताते हैं कि सूर्यदेव उत्तरायण, दक्षिणायन और वैषुवत नामक तीन प्रकार की गतियों से विचरण करते हैं।
जब सूर्य उत्तर दिशा की ओर गमन करता है तो उसकी गति को उदगयन कहा जाता है, दक्षिण दिशा की ओर गमन को दक्षिणायन तथा विषुवत् स्थिति से होकर गमन को वैषुवत कहा गया है।
श्रीमद्भागवत में इन तीनों गतियों को क्रमशः मन्द, शीघ्र और समान गति से संबद्ध किया गया है।
सूर्य की इन गतियों के अनुसार दिन और रात की अवधि दीर्घ, ह्रस्व अथवा समान होती है।
इस प्रकार श्रीमद्भागवत में सूर्य प्रकाश देने वाले देवता के रूप के साथ काल, ऋतु और संवत्सर की व्यवस्था के प्रमुख आधार के रूप में वर्णित हैं।
उत्तरायण, दक्षिणायन और सूर्य की दिशा ;
भागवत के पंचम स्कन्ध में सूर्य की गति के संदर्भ में उत्तरायण और दक्षिणायन का भी वर्णन मिलता है।
सूर्य की गति को विभिन्न अवस्थाओं में देखकर दिन - रात्रि के परिवर्तन तथा ऋतु की प्रकृति को समझाया गया है।
जब सूर्य की उत्तर - दक्षिण स्थिति बदलती है, तब प्रकाश की अवधि और दिन - रात्रि के अनुपात में परिवर्तन दिखाई देता है।
प्राचीन भारतीय समय - विज्ञान में इस लिए सूर्य केवल ग्रह नहीं, बल्कि काल - मापक है।
यही कारण है कि ज्योतिष में सूर्य को—
आत्मतत्त्व,
प्रकाश,
तेज,
अधिकार,
पिता,
प्रतिष्ठा,
जीवनशक्ति
आदि से जोड़ा गया है।
लेकिन यहाँ भी सावधानी आवश्यक है—
इन ज्योतिषीय फलितों को आधुनिक वैज्ञानिक कारण - कार्य संबंध की तरह नहीं, बल्कि ज्योतिषीय प्रतीक - व्यवस्था के रूप में समझना चाहिए।
जन्मकुंडली में सूर्य की गति कैसे पढ़ें ?
जन्मकुंडली वास्तव में व्यक्ति के जन्मक्षण पर आकाशीय ग्रहस्थितियों का ज्योतिषीय मानचित्र है।
इसमें सूर्य को पढ़ते समय केवल यह देखना पर्याप्त नहीं कि सूर्य किस राशि में है।
शास्त्रीय ज्योतिषीय पद्धति में देखा जाता है—
सूर्य किस राशि में है ?
किस भाव में है ?
किस नक्षत्र में है ?
किस ग्रह से सम्बन्ध रखता है ?
किस ग्रह की दृष्टि प्राप्त करता है ?
किस दशा में फल दे रहा है ?
गोचर में वर्तमान स्थिति क्या है ?
यहीं से जन्मकुंडली और गोचर का संबंध स्थापित होता है।
जन्मकुंडली को बीज और गोचर को उस बीज पर आने वाला काल समझना एक उपयोगी ज्योतिषीय उपमा है।
गोचर का वास्तविक अर्थ :
गोचर का अर्थ है—
वर्तमान समय में ग्रहों की आकाशीय स्थिति को जन्मकुंडली के संदर्भ में देखना।
उदाहरण के लिए सूर्य लगभग एक मास में एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश करता है।
इस लिए सूर्य का गोचर अपेक्षाकृत तेज परिवर्तन दिखाता है।
ज्योतिषीय फलित में सूर्य का गोचर विशेष रूप से—
आत्मविश्वास,
प्रतिष्ठा,
पिता - संबंध,
प्रशासन,
अधिकार,
कार्यक्षेत्र,
स्वास्थ्य और ऊर्जा
से जुड़े विषयों को देखने में प्रयुक्त होता है।
लेकिन किसी एक गोचर को देखकर निश्चित घटना घोषित करना उचित नहीं।
जन्मकुंडली में उस विषय की संभावना हो और दशा तथा अन्य ग्रहस्थितियाँ उसका समर्थन करें, तभी फलित की शक्ति बढ़ती है।
प्रश्नकुंडली में कालचक्र का महत्व :
प्रश्नकुंडली में जन्मसमय के स्थान पर प्रश्न पूछे जाने का समय महत्वपूर्ण होता है।
अर्थात्—
“प्रश्न किस क्षण उत्पन्न हुआ ?”
यहाँ कुम्हार के चाक का सिद्धान्त और भी सुंदर हो जाता है।
व्यक्ति स्वयं कालचक्र के एक क्षण में प्रश्न लेकर आता है।
उस क्षण का लग्न, चन्द्रमा, सूर्य, नक्षत्र तथा ग्रहस्थिति उस प्रश्न की ज्योतिषीय संरचना को दर्शाती है।
परन्तु प्रश्नकुंडली को जन्मकुंडली का विकल्प नहीं माना जाना चाहिए।
दोनों की अपनी - अपनी भूमिका है।
नक्षत्र-पद्धति और सूर्य :
वैदिक परम्परा में नक्षत्र अत्यंत प्राचीन तत्व है।
श्रीमद्भागवत भी सूर्य की गति को नक्षत्रों और राशियों के संदर्भ में वर्णित करता है।
5.22.5 में एक मास को तारकीय गणना में लगभग दो और एक - चौथाई नक्षत्रों के बराबर बताया गया है।
इस से स्पष्ट होता है कि प्राचीन भारतीय कालगणना में—
राशि + मास + नक्षत्र + ऋतु + अयन + वर्ष
एक दूसरे से जुड़े हुए थे।
यही नक्षत्रीय परम्परा बाद की ज्योतिषीय प्रणालियों में अलग - अलग रूपों में विकसित हुई।
कृष्णमूर्ति पद्धति को कहाँ रखें ?
यहाँ शास्त्रीय सत्य को स्पष्ट रखना आवश्यक है।
कृष्णमूर्ति पद्धति वैदिक ऋषियों द्वारा बनाई गई मूल पद्धति नहीं है।
यह के. एस. कृष्णमूर्ति द्वारा बीसवीं शताब्दी में विकसित की गई आधुनिक ज्योतिषीय प्रणाली है।
इसमें नक्षत्र को आगे असमान Sub भागों में विभाजित करके सूक्ष्म फलित और समय निर्धारण का प्रयास किया जाता है।
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अतः इसका सही स्थान यह है—
वैदिक नक्षत्र परम्परा → बाद की ज्योतिषीय व्याख्याएँ → आधुनिक कृष्णमूर्ति पद्धति।
इसे सीधे “ऋग्वेद में कृष्णमूर्ति पद्धति कही गई है” कहना ऐतिहासिक रूप से सही नहीं होगा।
अंकशास्त्र, हस्तरेखा और सामुद्रिकशास्त्र ;
इसी प्रकार अंकशास्त्र और आधुनिक रूप में प्रयुक्त कई अंक - आधारित फलित प्रणालियों को सीधे ऋग्वेद अथवा श्रीमद्भागवत का सिद्धान्त कहना उचित नहीं है।
हस्तरेखा और सामुद्रिक परम्परा की अपनी प्राचीन भारतीय साहित्यिक परम्पराएँ हैं, लेकिन इनके प्रत्येक आधुनिक नियम को वेद या पुराण का मंत्र बताना भी उचित नहीं।
इस लिए यदि कोई कहे—
“ऋग्वेद में लिखा है कि अमुक रेखा इतनी आयु देगी”
तो ऐसे दावे को मूल मंत्र के प्रमाण के बिना स्वीकार नहीं करना चाहिए।
शास्त्रसम्मत अध्ययन का पहला नियम ही प्रमाण और परम्परा में भेद करना है।
वास्तु से इसका संबंध :
वास्तुशास्त्र का मुख्य क्षेत्र स्थान, दिशा, निर्माण, अनुपात और निवास - व्यवस्था है।
ज्योतिष का मुख्य क्षेत्र ग्रह, राशि, भाव, नक्षत्र और कालगत फलित है।
दोनों को जोड़कर देखने की परम्परा बाद में विकसित हुई है।
लेकिन यह कहना कि “ऋग्वेद का कुम्हार चाक सीधे घर के वास्तु - दोष को बताता है”—
ऐसा प्रत्यक्ष शास्त्रीय प्रमाण उपलब्ध नहीं माना जा सकता।
हाँ, दार्शनिक समानता अवश्य है—
ज्योतिष = काल का क्रम
वास्तु = स्थान का क्रम
काल और स्थान दोनों में व्यवस्था हो तो भारतीय दर्शन की दृष्टि से जीवन में ऋत अर्थात् सुव्यवस्था की भावना प्रकट होती है।
“चाक” का सबसे बड़ा रहस्य :
कुम्हार का चाक घूमता रहता है।
उसके ऊपर बैठी चींटी को कभी लगता है कि वह आगे जा रही है, कभी पीछे, कभी केन्द्र की ओर, कभी बाहर की ओर।
लेकिन वास्तविकता यह है कि—
चाक की एक गति है और चींटी की अपनी दूसरी गति।
श्रीमद्भागवत इसी सिद्धान्त से सूर्य, ग्रह, राशि और नक्षत्र की दिखाई देने वाली विभिन्न गतियों को समझाता है।
यही ज्योतिषीय दृष्टि का एक महत्वपूर्ण सूत्र है—
एक ही काल में सभी व्यक्तियों पर एक जैसा फल नहीं दिखाई देता, क्योंकि प्रत्येक जन्मकुंडली का आधार अलग है।
सूर्य सभी पर समान प्रकाश देता है, लेकिन जन्मकुंडली में उसकी स्थिति अलग-अलग होती है।
इस लिए गोचर एक ही हो सकता है, फल की अभिव्यक्ति अलग हो सकती है।
उपाय का शास्त्रीय आधार :
जब ग्रह और काल की चर्चा होती है तो उपाय की बात भी आती है।
लेकिन उपाय का अर्थ केवल “ग्रह को रिश्वत देकर फल बदल देना” नहीं है।
भारतीय शास्त्रीय परम्परा में उपाय के व्यापक रूप हैं—
सत्कर्म, दान, तप, जप, देवपूजन, यज्ञ, संयम, सेवा, प्रार्थना और धर्माचरण।
सूर्य से संबंधित परम्परा में प्रातःकाल सूर्य का स्मरण, अर्घ्य, आदित्य - उपासना, सत्याचरण, अनुशासन और कर्तव्यपालन जैसी साधनाएँ विशेष रूप से जुड़ी हुई हैं।
सबसे महत्वपूर्ण उपाय यह है कि व्यक्ति ग्रह के प्रतीकात्मक गुण को अपने जीवन में सकारात्मक रूप से विकसित करे।
यदि सूर्य आत्मबल का प्रतीक है तो उपाय केवल मंत्र नहीं—
सत्य + अनुशासन + कर्तव्य + पिता/गुरु का सम्मान + अहंकार का संयम
भी सूर्योपासना का व्यावहारिक रूप माना जा सकता है।
सूर्य की गति से मनुष्य को क्या शिक्षा मिलती है ?
सूर्य प्रतिदिन उदित और अस्त दिखाई देता है।
ऋतु आती है और चली जाती है।
मास समाप्त होता है और नया मास आता है।
वर्ष समाप्त होता है और नया वर्ष प्रारम्भ होता है।
इस लिए शास्त्र का कालचक्र मनुष्य को यह बताता है कि परिवर्तन ही संसार की व्यवस्था है।
ऋग्वेद का चक्र, श्रीमद्भागवत का कालचक्र और कुम्हार के चाक का दृष्टान्त—
तीनों को साथ रखें तो एक गहरा सूत्र सामने आता है—
चक्र घूमता है, स्थान बदलते हैं, ग्रह दिखाई देने वाली स्थितियाँ बदलते हैं, ऋतु बदलती है; लेकिन व्यवस्था का मूल नियम बना रहता है।
इसी को वैदिक भाषा में व्यापक अर्थ में ऋत की भावना से जोड़ा जा सकता है।
अंतिम शास्त्रीय निष्कर्ष ;
इस पूरे विवेचन का सार यह नहीं कि कुम्हार का चाक कोई ज्योतिषीय यंत्र है।
बल्कि चाक एक दृष्टान्त है—
गति को समझाने का।
ऋग्वेद काल को चक्र के रूप में संकेत करता है।
श्रीमद्भागवत सूर्य को कालचक्र में स्थित करके बारह मास और छह ऋतुओं की व्यवस्था बताता है।
और उसी श्रीमद्भागवत का 5.22.2 कुम्हार के घूमते चाक तथा उस पर चलती चींटी का उदाहरण देकर एक साथ चलने वाली विभिन्न गतियों को समझाता है।
इस लिए जन्मकुंडली को जन्मकाल की संरचना, प्रश्नकुंडली को प्रश्नकाल की संरचना, और गोचर को वर्तमान काल की गति के रूप में पढ़ना ज्योतिषीय परम्परा के भीतर एक सार्थक ढाँचा है।
लेकिन वैदिक सत्य के नाम पर बाद की प्रत्येक पद्धति को वेद में डाल देना उचित नहीं।
कृष्णमूर्ति पद्धति आधुनिक विकास है; अंकशास्त्र, आधुनिक हस्तरेखा और आधुनिक वास्तु - फलित के प्रत्येक नियम को भी अलग - अलग स्रोत से प्रमाणित करना चाहिए।
कृष्णमूर्ति पद्धति में नक्षत्र और उसके Sub-lord का विशेष उपयोग इसी आधुनिक विकास का उदाहरण है।
और यही इस “कुम्हार के चाक” का सबसे बड़ा रहस्य है—
चाक घूम रहा है, सूर्य अपनी गति में है, ऋतु बदल रही है, नक्षत्र अपनी स्थिति में आते - जाते दिखाई दे रहे हैं और मनुष्य उसी कालचक्र में अपना कर्म कर रहा है।
ज्योतिष का वास्तविक प्रश्न केवल यह नहीं है कि “ग्रह कहाँ है?”
बल्कि अधिक गहरा प्रश्न है—
“ग्रह किस कालचक्र में, किस स्थिति में, किस जन्म-संस्कार के ऊपर और किस वर्तमान गति में अपना संकेत प्रकट कर रहा है?”
यही जन्मकुंडली, प्रश्नकुंडली, नक्षत्र और गोचर को एक साथ देखने का मूल रहस्य है।
और श्रीमद्भागवत के कुम्हार के चाक की शिक्षा यही है कि एक ही चक्र पर स्थित होकर भी प्रत्येक गति को केवल बाहरी गति देखकर नहीं समझा जा सकता; गति के भीतर की गति को समझना पड़ता है।
यही काल का रहस्य है, यही ऋतुचक्र का रहस्य है और ज्योतिषीय दृष्टि से यही कालचक्र - विचार का सार है। हर हर महादेव जय मां अंबे मां !!!!! शुभमस्तु !!!
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