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Tuesday, December 16, 2025

मलमास, अधिकमास, पुरुषोत्तम मास,

मलमास, अधिकमास, पुरुषोत्तम मास,

अधिक मास, मलमास और पुरुषोत्तम मास की दिव्य कथा : 

जन्मकुंडली • प्रश्नकुंडली • गोचर • प्रभाव • महत्व • फल • नियम • उपाय :    

बहुत प्राचीन समय की बात है। 

एक नगर में एक महान ज्योतिषाचार्य रहते थे। 

वे वेद - वेदांग, ज्योतिषशास्त्र, नक्षत्र, तिथि, योग, करण, जन्मकुंडली, प्रश्नकुंडली और गोचर का गहरा अध्ययन करते थे। 

उनके पास दूर - दूर से लोग अपने जीवन की समस्याओं का समाधान पूछने आते थे।

अहंस्पति, मलिम्लुच और संसर्प।

खर मास प्रारंभ :

मंत्र – 

गोवर्धनधरं वन्दे गोपालं गोपरूपिणम्।

  गोकुलोत्सवमीशानं गोविन्दं गोपिकाप्रियम्।।

यह पुरुषोत्तम मास का सबसे विशेष मंत्र है।

श्रद्धापूर्वक इस मंत्र के जाप से व्यक्ति के जीवन से नकारात्मकता दूर होती है और जीवन में खुशियों का वास होता है मलमास, अधिकमास या पुरुषोत्तम मास एक ही माह के नाम है और इनका संबंध चंद्र की गति से है जबकि खरमास का संबंध सूर्य की गति से है। 

हर सौर वर्ष में 2 बार खरमास आते हैं। 

पहला सूर्य जब धनु राशि में प्रवेश करता है और दूसरा सूर्य जब मीन राशि में प्रवेश करता है तब खरमास प्रारंभ होता है।


मलमास,अधिकमास,पुरुषोत्तम मास : http://Sarswatijyotish.com


OLEVS Automatic Watch for Men Self Winding Mechanical Luxury Business Stainless Steel Multi Calendar Waterproof Luminous Wrist Watches

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{ Case diameter
41 Millimetres
Band colour
Gold
Band material type
Stainless Steel
Warranty type
Manufacturer
Watch movement type
Automatic
Item weight
250 Grams

Country of Origin
China }






{ About this item

  • ⌚ Automatic Watch for Men: Calendar display window of week and month, match with skeleton tourbillon, Roman numerals time scaleand, Whether in formal or casual occasions, this men Luxury Business watches is suitable for wearing.
  • ⌚ Self Winding Mechanical Watches: Original mechanical movement, which can be wound manual and self winding.The tourbillon gear can reduce errors and make travel time more accurate,and more than 10 years of use.
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  • ⌚ OLEVS Wrist Watches After-sales Service: If you encounter problems while using your watch, please feel free to contact us. We will provide you with professional services! }


एक दिन एक गृहस्थ उनके पास आया। 

उसने गुरु के चरणों में प्रणाम करके कहा—

“गुरुदेव! मेरे जीवन में पिछले कुछ समय से कार्यों में विलंब हो रहा है। 

कभी धन की समस्या आती है, कभी परिवार में तनाव रहता है, कभी कोई शुभ कार्य रुक जाता है।

मैंने सुना है कि अधिक मास आने वाला है। 

कोई इसे मलमास कहता है और कोई पुरुषोत्तम मास।

कृपया बताइए कि इसका वास्तविक महत्व क्या है ?”

ऐसी मान्यता है कि इस मंत्र का जप करते समय पीले वस्त्र धारण करने चाहिए, अत्यंत लाभ प्राप्त होता है।

इस के साथ ही पूजा तथा हवन के साथ दान करना भी लाभकारी माना गया है।

इसे मल मास काला महीना भी कहा जाता है। 

इस महीने का आरंभ से होता है और ठीक मकर संक्रांति को खर मास की समाप्ति होती है। 

खर मास के दौरान हिन्दू जगत में कोई भी धार्मिक कृत्य और शुभ मांगलिक कार्य नहीं किए जाते हैं। 

इसके अलावा यह महीना अनेक प्रकार के घरेलू और पारम्परिक शुभकार्यों की चर्चाओं के लिए भी वर्जित है।

+++ +++

ज्योतिषाचार्य मुस्कुराए और बोले —

“वत्स! अधिक मास को समझने के लिए पहले हमें काल और खगोलीय गणना को समझना होगा।”

उन्होंने कहा—

“चंद्र मास और सौर वर्ष की गणना में अंतर होने के कारण पंचांग में समय - समय पर एक अतिरिक्त चंद्र मास आता है। 

इसी को परंपरा में अधिक मास कहा जाता है। 

जब इस अतिरिक्त मास के भीतर सूर्य की संक्रांति नहीं पड़ती, तब इसे अधिक मास के रूप में माना जाता है। 

धार्मिक परंपरा में इसे पहले ‘मलमास’ कहा गया, लेकिन भगवान विष्णु से जुड़े माहात्म्य में यही मास पुरुषोत्तम मास के नाम से अत्यंत पवित्र माना गया।”

देशाचार के अनुसार नवविवाहिता कन्या भी खर मास के अन्दर पति के साथ संसर्ग नहीं कर सकती है । 

और उसे इस पूरे महीने के दौरान अपने मायके में आकर रहना पड़ता है । 

इस वर्ष भी खर मास से आरम्भ हो रहे है।

खर मास में सभी प्रकार के हवन, विवाह चर्चा, गृह प्रवेश, भूमि पूजन, द्विरागमन, यज्ञोपवीत,विवाह या अन्य हवन कर्मकांड आदि तक का निषेध है। 

सिर्फ भागवत कथा या रामायण कथा का सामूहिक श्रवण ही खर मास में किया जाता है।

ब्रह्म पुराण के अनुसार खर मास में मृत्यु को प्राप्त व्यक्ति नर्क का भागी होता है। 

अर्थात चाहे व्यक्ति अल्पायु हो या दीर्घायु अगर वह पौष के अन्तर्गत खर मास यानी मल मास की अवधि में अपने प्राण त्याग रहा है तो निश्चित रूप से उसका इहलोक और परलोक नर्क के द्वार की तरफ खुलता है।

+++ +++

इस बात की पुष्टि महाभारत में होती है जब खर मास के अन्दर अर्जुन ने भीष्म पितामह को धर्म युद्ध में बाणों की शैया से वेध दिया था। 

सैकड़ों बाणों से विद्ध हो जाने के बावजूद भी भीष्म पितामह ने अपने प्राण नहीं त्यागे। 

प्राण नहीं त्यागने का मूल कारण यही था कि अगर वह इस खर मास में प्राण त्याग करते हैं तो उनका अगला जन्म नर्क की ओर जाएगा। 

इसी कारण उन्होंने अर्जुन से पुनः एक ऐसा तीर चलाने के लिए कहा जो उनके सिर पर विद्ध होकर तकिए का काम करे। 

इस प्रकार से भीष्म पितामह पूरे खर मास के अन्दर अर्द्ध मृत अवस्था में बाणों की शैया पर लेटे रहे और जब सौर माघ मास की मकर संक्रांति आई उसके बाद शुक्ल पक्ष की एकादशी को उन्होंने अपने प्राणों का त्याग किया। 

इस लिए कहा गया है कि माघ मास की देह त्याग से व्यक्ति सीधा स्वर्ग का भागी होता है।

+++ +++

गृहस्थ ने पूछा—

“गुरुदेव! यदि इसका नाम मलमास है तो फिर यह पुरुषोत्तम मास कैसे बन गया?”

गुरु बोले—

“यही इसकी सबसे सुंदर कथा है।”

खर मास को खर मास क्यों कहा जाता है यह भी एक पौराणिक किंवदंती है। 

खर गधे को कहते हैं। 

मार्कण्डेय पुराण के अनुसार सूर्य अपने साथ घोड़ों के रथ में बैठकर ब्रह्मांड की परिक्रमा करते है। 

और परिक्रमा के दौरान कहीं भी सूर्य को एक क्षण भी रुकने की इजाजत नहीं है। 

लेकिन सूर्य के सातों घोड़े सारे साल भर दौड़ लगाते- लगाते प्यास से तड़पने लगे। 

उनकी इस दयनीय स्थिति से निबटने के लिए सूर्य एक तालाब के निकट अपने सातों घोड़ों को पानी पिलाने हेतु रुकने लगे।

+++ +++

लेकिन तभी उन्हें यह प्रतिज्ञा याद आई कि घोड़े बेशक प्यासे रह जाएं लेकिन उनकी यात्रा ने विराम नहीं लेना है। 

नहीं तो सौर मंडल में अनर्थ हो जाएगा। 

सूर्य भगवान ने चारों ओर देखा… तत्काल ही सूर्य भगवान पानी के कुंड के आगे खड़े दो गधो को अपने रथ पर जोत कर आगे बढ़ गए और अपने सातों घोड़े तब अपनी प्यास बुझाने के लिए खोल दिए गए। 

अब स्थिति ये रही कि गधे यानी खर अपनी मन्द गति से पूरे पौष मास में ब्रह्मांड की यात्रा करते रहे और सूर्य का तेज बहुत ही कमजोर होकर धरती पर प्रकट हुआ।

+++ +++

मकर संक्रांति के दिन से सूर्य पुनः अपने सात अश्वों पर सवार होकर आगे बढ़े और धरती पर सूर्य का तेजोमय प्रकाश धीरे - धीरे बढ़ने लगा। 

मकर संक्रांति एक महत्व यह भी है कि उस दिन सूर्य अपने अधम सवारी से मुक्त होकर असली अश्व रथ पर आरूढ़ हुए और दुनिया को अपनी ऊर्जा से प्रभावित करते रहे।


आगामी मलमास ( खरमास )  से शुरू होकर  तक रहेगा, जिसमें सूर्य के धनु राशि में प्रवेश के कारण विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन जैसे सभी शुभ और मांगलिक कार्य वर्जित रहेंगे, और इस दौरान जप, तप, दान तथा सूर्य देव की पूजा का विशेष महत्व है, खासकर मकर संक्रांति तक।


मलमास,अधिकमास,पुरुषोत्तम मास : http://Sarswatijyotish.com


जयत्यंजनी - गर्भ - अंभोधि - संभूत

विधु विबुध - कुल - कैरवानंदकारी।


केसरी - चारु - लोचन - चकोरक - सुखद,

  लोकगन शोक - संतापहारी।।


जयति जय बालकपि केलि - कौतुक

 उदित - चंडकर - मंडल - ग्रासकर्त्ता ।


राहु - रवि - शक्र,पवि - गर्व - खर्वीकरण

 शरण - भयहरण जय भुवन भर्त्ता ।।

+++ +++

हे हनुमान जी आपकी जय हो।

आप अंजनी के गर्भ रूपी समुद्रसे चन्द्ररूप उत्पन्न होकर देव - कुलरूपी कुमुदों को प्रफुल्लित करने वाले हैं, पिता केसरी के सुंदर नेत्र रूपी चकोरों को आनन्द देने वाले हैंऔर समस्त लोकों का शोक-संताप हरने वाले हैं।

आपकी जय हो,जय हो।

अपने बचपन में ही बाललीलासे उदयकालीन प्रचण्ड सूर्य के मण्डल को लाल - लाल खिलौना समझकर निगल लिए थे।

उस समय आपने राहु, सूर्य, इन्द्र और वज्रका गर्व चूर्ण कर दिया था। 

हे शरणागत के भय हरने वाले!हे विश्वका भरण - पोषण करने वाले!!आपकी जय हो।

श्रीवत्साकं महादेवं देवगुह्यमनौपमम् 

  प्रपद्ये सूक्ष्ममचलं वरेण्यमभयप्रदम्।

+++ +++

प्रभवं सर्वभूतानां निर्गुणं परमेश्वरम्

प्रपद्ये  मुक्तसङ्गानां यतीनां परमां गतिम्।।





The Spiritual Living Brass Meditating Lord Shiva Idols | 2 Inch | God Idol Gift for Diwali | Shivji | Mahadev Murti | Shiva | Bholenath Murti | God Idol for Car | ॐ नमः शिवाय

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{ About this item

  • Quality - Brass | Size 2 Inch ( Please Note This Product Is Zoomed In For Showing Details Of The Product ) | Weight - 40 Grams | Color - Golden | Please Note - This is A Small Idol |
  • This Shiv Ji Idol is Fine Handcrafted with Pure BRASS Melting at 930°C and artisians spending upto 2 hours for each piece carving it to perfection. LIMITED STOCK AVAILABLE.
  • A Meditating Shiva idol is a timeless choice for home decor, symbolizing peace, inner balance, and spiritual strength. Place the idol facing east or north-east for spiritual alignment and positivity. Use a clean and elevated surface, like a dedicated table or altar. Decorate with fresh flowers, a lamp, and incense for a sacred touch.
  • The Spiritual Living is just a supplier of Religious Products. Please Consult a Vastu Expert Or a Pandit Ji before installing. It May or May not be effective Depending on the Scenario.
  • Each Product is Unique and Handcrafted just for you, please allow some change in color/shape/size. The Spiritual Living is just a supplier of Religious Products. Please Consult a Vastu Expert Or a Pandit Ji before installing. It May or May not be effective Depending on the Scenario
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मैं श्रीवत्स - चिह्र धारण करने वाले, महान् देव,देवताओं में गुह्य, उपमा से रहित, सूक्ष्म, अचल तथा अभय देने वाले वरेण्य देव की शरण ग्रहण करता हूं।

मैं  समस्त प्राणियों की सृष्टि करने वाले, निर्गुण, नि: सङ्ग, यम और नियम का पालन करने वाले संन्यासियों की परम गति स्वरूप परमेश्वर की शरण ग्रहण करता हूं।'

+++ +++

🌺 मलमास से पुरुषोत्तम मास बनने की कथा :

पुराणिक परंपरा में एक प्रसिद्ध कथा आती है कि अतिरिक्त मास को अन्य मासों के समान प्रतिष्ठा नहीं मिल रही थी। 

वह स्वयं भगवान विष्णु के पास गया और अपनी पीड़ा व्यक्त की।

उसने कहा—

“हे प्रभु! अन्य मासों के अपने - अपने देवता, महत्व और यश हैं, लेकिन मेरा कोई सम्मान नहीं करता। लोग मुझे मलमास कहते हैं। मैं क्या करूँ?”

भगवान विष्णु ने उस मास पर करुणा की।

उन्होंने कहा—

“तुम मेरे शरणागत हो। 

इस लिए आज से तुम्हारा संबंध मेरे नाम से होगा। 

तुम मेरे लिए अत्यंत प्रिय रहोगे।”

भगवान ने उसे पुरुषोत्तम मास का गौरव प्रदान किया।

इसी कारण धार्मिक परंपरा में अधिक मास के समय भगवान विष्णु, श्रीकृष्ण, पुरुषोत्तम भगवान की भक्ति, नाम - स्मरण, कथा - श्रवण, जप, दान, व्रत और सत्कर्म को विशेष महत्व दिया जाता है।

गुरु ने कहा—

“वत्स! इस कथा का सबसे बड़ा संदेश यह है कि जिसे संसार कम समझे, भगवान उसकी भी महिमा बढ़ा सकते हैं।”

+++ +++

🕉️ अधिक मास का आध्यात्मिक महत्व :

गुरु ने आगे कहा—

“अधिक मास को केवल अशुभ मास समझना उचित नहीं है। 

परंपरा में इसे सांसारिक भोग की अपेक्षा आध्यात्मिक साधना के लिए विशेष अवसर माना गया है।”

इस समय व्यक्ति अपनी दिनचर्या में—

भगवान का नाम - स्मरण, विष्णु पूजा, श्रीमद्भागवत या पुराण कथा श्रवण, गीता - पाठ, मंत्र - जप, ध्यान, दान, सेवा और आत्मचिंतन बढ़ा सकता है।

इस मास का उद्देश्य केवल बाहरी पूजा नहीं, बल्कि अपने भीतर के दोषों को कम करना भी है।

गुरु बोले—

“यदि कोई व्यक्ति अधिक मास में प्रतिदिन थोड़ा समय ईश्वर के लिए निकालता है, किसी जरूरतमंद की सहायता करता है और अपनी वाणी तथा व्यवहार को शुद्ध करता है तो वही इस मास की वास्तविक साधना है।”

+++ +++

☀️ सूर्य, चंद्रमा और अधिक मास :

ज्योतिषाचार्य ने आकाश की ओर देखकर कहा—

“ज्योतिष और पंचांग की दृष्टि से यह विषय सूर्य और चंद्रमा की गतियों से जुड़ा हुआ है।”

चंद्र मास लगभग 29.5 दिनों का होता है, जबकि सौर वर्ष उससे अलग अवधि का होता है। 

इन दोनों गणनाओं के अंतर को संतुलित करने के लिए समय - समय पर अतिरिक्त चंद्र मास आता है।

इस लिए अधिक मास कोई अचानक बना हुआ धार्मिक विचार नहीं है; यह भारतीय पंचांग की सौर - चंद्र कालगणना की एक विशेष व्यवस्था है।

यही कारण है कि अधिक मास का निर्धारण पंचांग की गणना से होता है और इसका समय हर वर्ष नहीं आता।

🔮 जन्मकुंडली के अनुसार अधिक मास का प्रभाव :

गृहस्थ ने पूछा—

“गुरुदेव! क्या अधिक मास का फल सभी लोगों के लिए समान होता है?”

गुरु ने कहा—

“नहीं वत्स। ज्योतिषीय फलादेश में प्रत्येक व्यक्ति की जन्मकुंडली अलग होती है।”

जन्मकुंडली में लग्न, चंद्रमा, सूर्य, गुरु, शनि, राहु - केतु, दशा - अंतरदशा, गोचर और संबंधित भावों को देखकर अधिक मास के समय की परिस्थितियों का विचार किया जा सकता है।

यदि गुरु शुभ और बलवान हो तो धार्मिक कार्य, ज्ञान, गुरु - कृपा, शिक्षा, आध्यात्मिक प्रगति और सद्कर्मों की ओर रुचि बढ़ने की संभावना परंपरागत रूप से मानी जाती है।

यदि चंद्रमा शुभ हो तो मन को भक्ति, ध्यान और आत्मचिंतन में लगाने में सरलता हो सकती है।

यदि शनि का प्रभाव अधिक हो तो व्यक्ति को धैर्य, अनुशासन, सेवा और पुराने कर्मों की समीक्षा करने का अवसर मिल सकता है।

यदि राहु - केतु का प्रभाव हो तो भ्रम, असमंजस या अनावश्यक भय से बचने के लिए नियमित साधना और विवेक का सहारा लेना उचित माना जाता है।

यदि पंचम, नवम या द्वादश भाव से धार्मिक और आध्यात्मिक ग्रहों का संबंध बने तो धर्म, मंत्र, तीर्थ, ध्यान और ज्ञान की ओर रुचि बढ़ सकती है।

लेकिन केवल “अधिक मास आ गया” कहकर किसी व्यक्ति को निश्चित सुख या दुख का फल देना उचित नहीं है। 
व्यक्तिगत फल के लिए पूरी जन्मकुंडली आवश्यक है।

+++ +++

🔯 प्रश्नकुंडली के अनुसार पुरुषोत्तम मास :

गुरु ने कहा —

“यदि किसी व्यक्ति की जन्मकुंडली उपलब्ध नहीं है तो परंपरागत प्रश्न - ज्योतिष में प्रश्न पूछे जाने के समय की ग्रहस्थिति से भी संकेत प्राप्त किए जा सकते हैं।”

प्रश्नकुंडली में लग्न और चंद्रमा की स्थिति, प्रश्न से संबंधित भाव, उनके स्वामी और शुभ - अशुभ ग्रहों के संबंध का विचार किया जाता है।

यदि प्रश्न के समय चंद्रमा बलवान और शुभ प्रभाव में हो तो मन में स्पष्टता तथा कार्य के समाधान की संभावना का संकेत माना जा सकता है।

यदि चंद्रमा पीड़ित हो तो गुरु व्यक्ति को जल्दबाजी से बचने और पहले मानसिक स्थिति को स्थिर करने की सलाह देगा।

पुरुषोत्तम मास का एक सुंदर संदेश यहाँ भी लागू होता है—

पहले मन को स्थिर करो, फिर निर्णय करो।

+++ +++

🪐 गोचर के ग्रह और अधिक मास :

गुरु ने कहा—

“गोचर के ग्रह व्यक्ति के वर्तमान समय का वातावरण बताते हैं। 

अधिक मास के दौरान ग्रहों के गोचर को जन्मकुंडली से जोड़कर देखना चाहिए।”


🌟 गुरु का प्रभाव :

गुरु शुभ हो तो ज्ञान, धर्म, गुरु - सेवा, दान, मंत्र - जप, शिक्षा और आध्यात्मिक कार्यों को बढ़ाना शुभ माना जाता है।


🪔 शनि का प्रभाव :

शनि अनुशासन, कर्म, सेवा, धैर्य और जिम्मेदारी का संदेश देता है। 

इस समय जरूरतमंद, वृद्ध या श्रमिक की सेवा करना श्रेष्ठ कर्म माना जा सकता है।


🔥 मंगल का प्रभाव :

मंगल सक्रियता और ऊर्जा का ग्रह माना जाता है। 

इस लिए क्रोध, विवाद, जल्दबाजी और कटु वाणी से बचना आवश्यक है।


🌙 चंद्रमा का प्रभाव :

चंद्रमा मन का कारक माना जाता है। 

ध्यान, जप, शांत वातावरण और सात्त्विक जीवन मन को स्थिर रखने में सहायक हो सकते हैं।


☊ राहु - केतु :

इन ग्रहों से जुड़े ज्योतिषीय प्रभाव में भ्रम और अनिश्चितता से बचना, अंधविश्वास के बजाय विवेक रखना और नियमित ईश्वर - स्मरण करना उचित माना जाता है।

+++ +++

🌸 पुरुषोत्तम मास के प्रमुख नियम :

परंपरा के अनुसार इस मास में व्यक्ति अपनी सामर्थ्य के अनुसार निम्न नियम अपना सकता है—


१. प्रातः स्नान करके भगवान का स्मरण करें।

२. भगवान विष्णु अथवा अपने इष्टदेव की पूजा करें।

३. “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” का जप करें।

४. विष्णु सहस्रनाम, गीता या धार्मिक ग्रंथ का पाठ करें।

५. कथा और सत्संग सुनें।

६. अन्न, वस्त्र, फल, गौ-सेवा अथवा जरूरतमंदों को यथाशक्ति दान करें।

७. अपनी क्षमता के अनुसार उपवास या सात्त्विक आहार रखें।

८. झूठ, निंदा, चुगली और अनावश्यक विवाद से बचें।

९. माता-पिता, गुरु, वृद्ध और जरूरतमंदों का सम्मान करें।

१०. प्रतिदिन कुछ समय आत्मचिंतन और ध्यान में लगाएँ।

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🪔 पुरुषोत्तम मास के सरल उपाय :

गुरु ने गृहस्थ को कहा —

“महंगे उपाय करना आवश्यक नहीं है। 

श्रद्धा और नियमितता सबसे महत्वपूर्ण हैं।”


भगवान विष्णु का उपाय:

प्रतिदिन भगवान विष्णु या श्रीकृष्ण का स्मरण करें।


गुरु ग्रह के लिए:

गुरु, विद्वान, शिक्षक या जरूरतमंद व्यक्ति का सम्मान और यथाशक्ति सेवा करें।


चंद्रमा के लिए:

मन को शांत रखें, माता का सम्मान करें और ध्यान-जप करें।


शनि के लिए:

गरीब, वृद्ध, श्रमिक या असहाय व्यक्ति की सेवा करें।


पितृ - स्मरण:

परिवार की परंपरा के अनुसार पितरों का स्मरण और दान करें।


धन-संबंधी चिंता में:

अनावश्यक खर्च रोकें, ईमानदार कर्म करें और जरूरतमंद को अन्नदान करें।


मानसिक अशांति में:

प्रतिदिन कुछ समय मोबाइल, विवाद और अनावश्यक बातचीत से दूर रहकर भगवान का नाम लें।

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🚫 अधिक मास में क्या नहीं करना चाहिए ?

यहाँ भी शास्त्रीय परंपराओं में क्षेत्र और संप्रदाय के अनुसार मतभेद मिलते हैं। 

इस लिए हर प्रकार के विवाह, गृहप्रवेश या अन्य संस्कार को “हर स्थिति में निषिद्ध” कहना उचित नहीं है।

सामान्य धार्मिक परंपरा में अधिक मास को नए सांसारिक मांगलिक कार्यों की अपेक्षा भक्ति, तप, दान और आध्यात्मिक साधना के लिए अधिक उपयुक्त माना जाता है।

इस लिए व्यक्ति को अपने परिवार की परंपरा और योग्य आचार्य की सलाह के अनुसार निर्णय लेना चाहिए।

लेकिन जो कार्य धर्म, सेवा और सदाचार से संबंधित हैं, उनके लिए यह मास विशेष प्रेरणा देता है।

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🌺 कथा का अंतिम संदेश :

गृहस्थ ने पूछा —

“गुरुदेव! यदि मुझे पुरुषोत्तम मास में केवल एक ही उपाय करना हो तो कौन - सा करूँ?”

गुरु मुस्कुराए और बोले—

“वत्स! एक उपाय चुनना हो तो अपने जीवन में एक अच्छा परिवर्तन कर लो।”

“एक महीने तक झूठ कम कर दो।”

“एक महीने तक किसी की निंदा मत करो।”

“एक महीने तक प्रतिदिन भगवान का नाम लो।”

“एक जरूरतमंद व्यक्ति की सहायता करो।”

“अपने माता-पिता और गुरु का सम्मान करो।”

“अपने क्रोध पर नियंत्रण रखो।”

“और प्रत्येक रात स्वयं से पूछो—

आज मैंने कौन-सा अच्छा कर्म किया?

किसी को दुख तो नहीं दिया?

और कल मैं अपने जीवन को थोड़ा और अच्छा कैसे बनाऊँगा?”

गुरु ने कहा—

“यही पुरुषोत्तम मास का सार है।”

“अधिक मास हमें अतिरिक्त समय देता है, लेकिन पुरुषोत्तम मास हमें उस अतिरिक्त समय का श्रेष्ठ उपयोग करना सिखाता है।”

जिस प्रकार वर्ष में आया हुआ अतिरिक्त मास कालगणना को संतुलित करता है, उसी प्रकार जीवन में किया गया आत्मचिंतन हमारे कर्म और विचारों को संतुलित कर सकता है।

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इस लिए —

🌸 अधिक मास को केवल मलमास समझकर भय मत करो।

🌸 इसे पुरुषोत्तम मास समझकर साधना का अवसर बनाओ।

🌸 ग्रहों को दोष देने से पहले अपने कर्मों को देखो।

🌸 भाग्य की प्रतीक्षा से पहले पुरुषार्थ करो।

🌸 धन से पहले धर्म, वाणी से पहले संयम और इच्छा से पहले विवेक रखो।


और अंत में भगवान पुरुषोत्तम से प्रार्थना करें—

“हे श्रीहरि! हमारे मन को शुद्ध करें, बुद्धि को विवेक दें, कर्मों को धर्ममय बनाएं, परिवार में शांति दें और हमें ऐसा जीवन दें जिससे हमारे कारण किसी प्राणी को अनावश्यक दुःख न पहुँचे।”


🙏🏻 ॐ नमो भगवते वासुदेवाय। 🙏🏻 श्री पुरुषोत्तम भगवान की जय। 🌸 सनातन धर्म की जय।

⭐ सद्कर्म ही श्रेष्ठ उपाय है। ⭐

+++ +++

!!!!! शुभमस्तु !!!

🙏हर हर महादेव हर...!!

जय माँ अंबे ...!!!🙏🙏

पंडित राज्यगुरु प्रभुलाल पी. वोरिया क्षत्रिय राजपूत जड़ेजा कुल गुर: -

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जय द्वारकाधीश....

जय जय परशुरामजी...🙏🙏🙏


Friday, December 5, 2025

मार्गशीर्ष मास अनंत व्रत :

मार्गशीर्ष मास अनंत व्रत :

मगशर मास का अनंत व्रत पूजन : वैदिक, पुराणिक एवं ज्योतिषीय दृष्टि से महत्व, नियम, फल एवं उपाय 

अनंत व्रत से श्रेष्ठ संतान के साथ प्राप्त होता है ऐश्वर्य,कथा और विधि हिंदू धर्म में अनंत व्रत का मार्गशीर्ष मास से शुरू होने वाला व्रत है....! 

पौराणिक मान्यता के अनुसार इस व्रत से व्रतकर्ता को संतान व एैश्वर्य की प्राप्ति होती है....! 

इस व्रत में बारह महीनों में नक्षत्र के हिसाब से भगवान विष्णु की पूजा करने का विधान है।

संतान सुख व ऐश्वर्य पाने के लिए हिंदू धर्म में अनंत व्रत का विधान है....! 

मार्गशीर्ष मास में शुरू होने वाले इस व्रत में भगवान विष्णु की बारह मास की पूजा की जाती है....! 


मार्गशीर्ष मास अनंत व्रत : http://Sarswatijyotish.com



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{ About this item

  • Panchmukhi Hanuman Ji Idol (5-Faced) Symbolizes protection from all directions – East, West, North, South, and Sky. A sacred form of Lord Hanuman known to remove negative energies and evil influences.
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  • Ideal for Vastu, Gifting & Festivals A powerful Vastu remedy for protection and harmony. A thoughtful gift for Hanuman Jayanti, housewarmings, Diwali, weddings, or any religious celebration.
  • Spiritual Symbol of Strength & Devotion Lord Hanuman is worshipped as the epitome of loyalty, courage, and dedication. Keep this idol in your space to inspire inner strength and peace. }


ॐ श्री अनंताय नमः।
सनातन धर्म में प्रत्येक मास का अपना विशेष आध्यात्मिक महत्व है। 
मार्गशीर्ष ( मगशर ) मास को भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं भगवद्गीता में अपना स्वरूप बताया है— "मासानां मार्गशीर्षोऽहम्।" 
इस लिए यह मास धर्म, भक्ति, तप, दान और व्रत के लिए अत्यंत शुभ माना जाता है। 
श्री ऋग्वेद, श्री यजुर्वेद, श्री विष्णु पुराण तथा अनेक व्रतकथाओं में भगवान विष्णु की आराधना को जीवन में सुख, शांति और समृद्धि का आधार बताया गया है।
पौराणिक मान्यता के अनुसार जो भी सन्तानहीन स्त्री - पुरुष इस व्रत को करते हैं...! 

उन्हें नीरोगी, दीर्घायु, बलवान, धर्मज्ञ, भाग्यवान और सभी गुणों से संपन्न संतान की प्राप्ति होती है।

अनंत व्रत की कथा :

प्राचीन समय में हैहयवंश में महिष्मति नगरी में कृत्यवीर्य नाम के राजा की शीलधना नाम की एक रानी थी....! 

अनंत व्रत का संबंध भगवान श्री अनंत नारायण से है, जो भगवान विष्णु का अनंत स्वरूप हैं। 
"अनंत" का अर्थ है जिसका आदि और अंत नहीं है। 
यह व्रत केवल धन प्राप्ति के लिए ही नहीं, बल्कि जीवन के संकटों, ग्रहदोषों और मानसिक अशांति को दूर करने का भी एक श्रेष्ठ साधन माना गया है। 
वैदिक ज्योतिष तथा प्रश्नकुंडली की परंपरा के अनुसार जब व्यक्ति के जीवन में बार - बार बाधाएँ, आर्थिक हानि, पारिवारिक कलह या कार्यों में रुकावट आने लगे, तब भगवान अनंत की श्रद्धापूर्वक उपासना विशेष फलदायी मानी जाती है।
जिसने संतान प्राप्ति के लिए ब्रह्मावादिनी मैत्रयी से उपाय पूछा था...! 
इस पर मैत्रेयी ने उसे अनंत व्रत की विधि बताई....! 
जिसे विधिपूर्वक करने पर शीलधना को कार्तवीर्यार्जुन नाम का ओजस्वी पुत्र प्राप्त हुआ....! 
एक प्राचीन कथा के अनुसार महाभारत काल में जब पांडव अनेक कठिनाइयों से घिरे हुए थे, तब भगवान श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को अनंत व्रत का महत्व बताया। 
युधिष्ठिर ने श्रद्धा से व्रत किया और धीरे - धीरे उनके जीवन के संकट समाप्त होने लगे। 
इसी प्रकार कौंडिन्य ऋषि और उनकी पत्नी सुशीला की कथा भी प्रसिद्ध है, जिसमें भगवान अनंत की कृपा से दरिद्रता दूर होकर पुनः वैभव प्राप्त हुआ। 
यह कथा सिखाती है कि श्रद्धा, संयम और विश्वास से किया गया व्रत कभी निष्फल नहीं जाता।
जिसने भगवान विष्णु के अवतार श्री दत्तात्रेय की आराधना कर चक्रवर्ती सम्राट बनने का वर प्राप्त कर देवताओं की तरह पूजनीय स्थान प्राप्त किया था।
वैदिक दृष्टि से मार्गशीर्ष मास में प्रातःकाल स्नान, जप, दान और विष्णु पूजा का विशेष महत्व है। ऋग्वेद में ईश्वर की उपासना द्वारा जीवन में प्रकाश, सत्य और कल्याण की कामना की गई है। 
यजुर्वेद में यज्ञ, दान और अनुशासन को धर्म का आधार बताया गया है। 
इन्हीं सिद्धांतों के अनुसार अनंत व्रत केवल एक धार्मिक कर्म नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि और सदाचार का अभ्यास भी है।
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अनंत व्रत की विधि :

जन्मकुंडली के अनुसार यदि बृहस्पति कमजोर हो, पंचम या नवम भाव पीड़ित हो, चंद्रमा अशुभ प्रभाव में हो या राहु - केतु के कारण मानसिक एवं आर्थिक परेशानियाँ बनी रहती हों, तो भगवान विष्णु की आराधना और अनंत व्रत लाभकारी माना जाता है। 
प्रश्नकुंडली में यदि कार्य सिद्धि में बार-बार विलंब दिखाई दे, शुभ ग्रह निर्बल हों अथवा भाग्य भाव बाधित हो, तब भी भगवान अनंत की पूजा से सकारात्मक मानसिक बल और आध्यात्मिक शांति प्राप्त होती है।
भविष्यपुराण के अनुसार मैत्रेयी के बताये अनुसार अनंत व्रत की विधि भगवान श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को भी बताई थी....! 
मगशर मास में अनंत व्रत की पूजा प्रातः ब्रह्ममुहूर्त में स्नान करके प्रारंभ करनी चाहिए। 
पूजा स्थान को स्वच्छ रखें। 
भगवान विष्णु या श्री अनंत नारायण का चित्र अथवा विग्रह स्थापित करें। 
कलश की स्थापना करें, दीपक जलाएँ, धूप अर्पित करें तथा तुलसी दल, पीले पुष्प, चंदन, अक्षत और नैवेद्य अर्पित करें। 
"ॐ अनंताय नमः" अथवा "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" मंत्र का श्रद्धापूर्वक जप करें। 
विष्णु सहस्रनाम, श्रीसूक्त, पुरुषसूक्त या गीता के बारहवें अध्याय का पाठ करना भी अत्यंत शुभ माना जाता है।
जिसके अनुसार मार्गशीर्ष मास में जिस दिन मृगशिरा नक्षत्र हो उस दिन व्रत शुरू करना चाहिए....! 
इस वर्ष यह व्रत मार्गशीर्ष मास मे 29 नवम्बर एवं 26 दिसंबर से आरम्भ करना चाहिये। 
पूजा के समय चौदह गाँठ वाला अनंत सूत्र भी धारण करने की परंपरा है। 
पुरुष इसे दाहिने हाथ में और महिलाएँ बाएँ हाथ में बाँधती हैं। 
यह सूत्र भगवान के अनंत संरक्षण, धर्म, संयम और सत्कर्म का प्रतीक माना जाता है।
इस दिन स्नान कर गंध, पुष्प, धूप, दीप आदि से अनंत भगवान के बाएं चरण का पूजन कर ब्राह्मण को दक्षिणा देनी चाहिए. रात के समय तेल रहित भोजन करना चाहिए....! 

इसी विधि से पौष मास में पुष्य नक्षत्र में भगवान के बाएं कटी प्रदेश, माघ मास में मघा नक्षत्र में भगवान की बाईं भुजा और फाल्गुन मास में फाल्गुनी नक्षत्र में बायें कंधे का पूजन करें....! 

इन 4 महीनों में व्रती गोमूत्र का सेवन कर ब्राह्मण को तिल का दान करें।
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चैत्र से कार्तिक तक यूं करें पूजन :

भविष्य पुराण के अनुसार चैत्र मास में चित्रा नक्षत्र में भगवान के दाहिने कंधे, वैशाख में विशाखा नक्षत्र में दाहिनी भुजा, ज्येष्ठ में ज्येष्ठा नक्षत्र में दाहिने कटी प्रदेश और आषाढ़ में आषाढ़ा नक्षत्र में दाहिने पैर का पूजन करें....! 
व्रत के नियमों में सत्य बोलना, क्रोध से बचना, सात्त्विक भोजन करना, नशा, हिंसा और छल - कपट से दूर रहना, माता - पिता और गुरु का सम्मान करना तथा यथाशक्ति दान करना विशेष रूप से शामिल है। 
व्रत केवल भोजन त्याग का नाम नहीं, बल्कि मन, वाणी और कर्म की शुद्धि का भी संकल्प है।
इन 4 महीनों में पंचगव्य का सेवन कर व्रती को रात को भोजन  कर ब्राह्मण को दान देना चाहिए....! 
इस व्रत के फल अनेक बताए गए हैं। 
श्रद्धा और नियमपूर्वक किए गए अनंत व्रत से परिवार में सुख - शांति, आर्थिक स्थिरता, कार्यों में सफलता, मानसिक संतुलन, दाम्पत्य जीवन में मधुरता, संतान सुख की कामना तथा आध्यात्मिक उन्नति का आशीर्वाद प्राप्त होने की मान्यता है। 
भगवान विष्णु की कृपा से जीवन में धैर्य, विवेक और धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा मिलती है।
श्रावण मास में श्रवण नक्षत्र में भगवान विष्णु के दोनों चरणों, भाद्रपद में उत्तराभाद्रपद नक्षत्र में गुह्या स्थान, अश्विन मास में अश्विनी नक्षत्र में ह्रदय और कार्तिक मास में कृतिका नक्षत्र में भगवान के सिर का पूजन करना चाहिए...! 
यदि जन्मकुंडली में धनभाव, भाग्यभाव या कर्मभाव पर अशुभ प्रभाव हो तो प्रत्येक गुरुवार भगवान विष्णु को पीले पुष्प अर्पित करें, तुलसी की सेवा करें तथा जरूरतमंदों को पीले वस्त्र, चना दाल, हल्दी या अन्न का दान करें। 
यह उपाय श्रद्धा के साथ किए जाएँ तो व्यक्ति के मन में सकारात्मकता और सेवा की भावना बढ़ती है।
इन 4 महीनों में व्रतकर्ता को घी का सेवन कर ब्राह्मण को दान देना चाहिए।
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हर महीने हवन, चार महीने से पारणा :

प्रश्नकुंडली में यदि किसी कार्य के सफल होने में संदेह दिखाई दे तो भगवान विष्णु के समक्ष दीपक जलाकर "ॐ नमो नारायणाय" मंत्र का 108 बार जप करें और धैर्यपूर्वक उचित प्रयास जारी रखें। धार्मिक उपायों का उद्देश्य मन को स्थिर करना और सद्कर्मों के प्रति प्रेरित करना है; इन्हें कर्म का विकल्प नहीं माना जाना चाहिए।
भविष्य पुराण के अनुसार इस व्रत में भगवान विष्णु के व्रत के साथ हवन का विधान भी है....! 
मगशर मास में तुलसी पूजन, श्रीमद्भगवद्गीता का अध्ययन, गौसेवा, अन्नदान तथा जरूरतमंदों की सहायता करना भी अत्यंत पुण्यदायी माना गया है। 
धर्मशास्त्र बताते हैं कि भगवान विष्णु केवल बाहरी पूजा से ही नहीं, बल्कि करुणा, सत्य, सेवा और सदाचार से भी प्रसन्न होते हैं।
मार्गशीर्ष से फाल्गुन मास तक पहले चार महीनों में घी, चैत्र से आषाढ़ मास तक शालिधान्य तथा श्रावण से कार्तिक मास तक दूध से भगवान विष्णु का हवन करना चाहिए....! 
इस तरह 12 महीनों में तीन पारणा कर वर्ष के अंत में अनंत भगवान की मूर्ति और चांदी के हल व मूसल बनाएं....! 
इस व्रत का सबसे बड़ा संदेश यह है कि जीवन में कठिनाइयाँ चाहे कितनी भी बड़ी क्यों न हों, यदि मनुष्य श्रद्धा, संयम, परिश्रम और भगवान पर विश्वास बनाए रखे तो परिस्थितियाँ धीरे - धीरे अनुकूल होने लगती हैं। 
अनंत भगवान का स्मरण मनुष्य को यह शिक्षा देता है कि ईश्वर की कृपा के साथ-साथ सत्कर्म, धैर्य और निरंतर प्रयास भी सफलता के अनिवार्य आधार हैं।
बाद में मूर्ति को ताम्र पीठ पर स्थापित कर दोनों हल व मूसल रखकर पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य आदि उपचारों से पूजन करें....! 
बाद में चंद्रमा की पूजा कर सारी सामग्री ब्राह्मण को प्रदान करने पर व्रत पूर्ण होता है।
अतः मार्गशीर्ष ( मगशर ) मास में भगवान श्री अनंत नारायण का व्रत एवं पूजन श्रद्धा, विनम्रता और शास्त्रीय मर्यादा के साथ करना चाहिए। 
वैदिक परंपरा, श्री विष्णु पुराण और व्रतकथाओं का सार यही है कि धर्म, दान, भक्ति, सेवा और सदाचार से जीवन में वास्तविक समृद्धि आती है। 
जो व्यक्ति निष्काम भाव से भगवान अनंत की आराधना करता है, उसके जीवन में आध्यात्मिक शांति, आत्मविश्वास और शुभ कर्मों की प्रेरणा निरंतर बनी रहती है।
ॐ अनंताय नमः।
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।



मार्गशीर्ष मास अनंत व्रत : http://Sarswatijyotish.com



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🌿अपने जीवन के श्रीराम बनें🌿 

समस्या क्या है..? 

आज लाखों लोग जी रहे हैं - पर जीवन को जी नहीं रहे। 
हर दिन वही भागदौड़, वही थकान, वही आदतें, वही बातें — 
और मन के भीतर एक धीमी फुसफुसाहट:
“क्या यही मेरा जीवन है? 
क्या मैं इससे ज़्यादा नहीं बन सकता.?”
हम दूसरों की अपेक्षाओं में उलझकर अपने ही जीवन के डिज़ाइनर बनना भूल जाते हैं। 
जीवन बहता जाता है और हम बस बहते जाते हैं।
समाधान क्या है..? 
रामायण हमें सिखाती है कि जीवन संयोग से नहीं, संकल्प से बनता है। 
जैसे श्रीराम ने अपना हर कदम धर्म, उद्देश्य और स्पष्टता के साथ रखा...!
वैसे ही हम भी अपना भविष्य गढ़ सकते हैं।

रामायणजी बताती हैं कि आप अपने जीवन के वास्तुकार कैसे बनेंगे-: 

1. स्पष्ट दृष्टि — आपका आदर्श जीवन कैसा दिखता है?
जिस तरह राम वनवास में भी अपना धैर्य और मर्यादा नहीं भूले...!,
वैसे ही पहले यह तय करें — आप किस तरह का जीवन जीना चाहते हैं?
किस तरह के व्यक्ति बनना चाहते हैं? 
दृष्टि के बिना दिशा नहीं मिलती।

2. अपने मूल मूल्य तय करें।
राम के मूल्य स्पष्ट थे — सत्य, करुणा, कर्तव्य।
सीता के मूल्य स्पष्ट थे — धैर्य, प्रेम, त्याग।
लक्ष्मण के मूल्य स्पष्ट थे — निष्ठा, सेवा, समर्पण।
जब आपके मूल्य स्पष्ट होते हैं, तो निर्णय आसान हो जाते हैं।

3. दीर्घकालीन लक्ष्य — जो आपकी दृष्टि से मेल खाएँ।
महान कार्य एक दिन में नहीं होते।
हनुमान जी ने भी समुद्र-लांघन आकस्मिक नहीं किया —
वह उनके भीतर के वर्षों के अभ्यास, चरित्र और विश्वास का परिणाम था।      
छोटे - छोटे कदम जोड़कर ही महान यात्राएँ बनती हैं।

4. अपने सपनों को छोटे - छोटे कार्यों में बदलें।
राम ने लंका पर विजय एक ही दिन में नहीं पाई। 
पहले सेतु बना, फिर योजना बनी, फिर युद्ध हुआ। 
“बड़ा सपना — छोटे कदम — बड़ी जीत”

5. अपने जीवन से ऊर्जा - चूसने वाली चीज़ें हटाएँ।
कुंभकरण की तरह कुछ लोग, कुछ आदतें, कुछ विचार हमारी ऊर्जा खा जाते हैं।
सीता जी का अशोक वाटिका में दुख — रावण या लंका नहीं था — वह अकेलापन और नकारात्मक वातावरण था। 
अपने जीवन में उन सबको पहचानें जो आपकी रोशनी को मंद करते हैं।

6. अपना मानसिक ढांचा उन्नत करें।
हनुमान जी अपनी शक्ति भूल गए थे और जाम्बवंत ने उन्हें याद दिलाया -
“तुममें जितनी शक्ति है, तुम कल्पना भी नहीं कर सकते।”
अपने मन को रोज़ यह याद दिलाना सीखें—
मैं सीख सकता हूँ। 
मैं बेहतर बन सकता हूँ। 
मैं अपने जीवन को बदल सकता हूँ।

7. ऐसी दिनचर्या बनाएँ जो हमको अपने सपनों के व्यक्तित्व में ढाले।
हम भविष्य से नहीं बदलते, हम आदतों से बदलते हैं।
लक्ष्मणजी की तपस्या, हनुमानजी की निष्ठा, सीताजी का धैर्य, रामजी का अनुशासन — सब आदतें थीं, चमत्कार नहीं।

8. अपने आसपास प्रेरक लोग रखें...!
हमारा वातावरण हमारा भविष्य तय करता है।
राम के पास लक्ष्मण थे, हनुमान थे, विभीषण जैसे मार्गदर्शक थे।
गलत संगत ग़लत दिशा की और ले जाती है।
सही संगत सही उन्नति की और ले जाती है ।

9. लचीले रहें — जीवन बदलता है, हम भी बदलें।
रामायण हमें सिखाती है — परिस्थितियाँ बदलें, मार्ग बदलें, पर मूल्य और उद्देश्य नहीं बदलते।
हमारी योजना कठोर नहीं होनी चाहिए, हमारा संकल्प होना चाहिए।

10. हर महीने अपने जीवन की समीक्षा करें।
राम ने भी अपने हर निर्णय पर विचार किया—
चाहे वह वनवास हो, या सीता की अग्नि परीक्षा, या लंका का अभियान।
जीवन में आगे बढ़ने का एक ही तरीका है — समीक्षा, सुधार और पुनर्संकल्प।
अपने जीवन के श्रीराम बनें। हम यह जीवन एक ही बार जीते हैं।
इसे बहने न दें — इसे बनाएं।
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हमारे निर्णय, हमारी आदतें, हमारी संगत, हमारा दृष्टिकोण और हमारा साहस — यही मिलकर वह जीवन बनाते हैं, जिसे जीकर हम गर्व महसूस करते हैं।
रामायणजी कहती हैं कि जीवन को संयोग पर मत छोड़ो, स्वयं उसका निर्माता बनो।
🙏🏼🌺 || श्रीकृष्ण ||🌺🙏🏼




मार्गशीर्ष मास अनंत व्रत : http://Sarswatijyotish.com



|| मीरा चरित ||

क्रमशः से आगे .........!

श्री कृष्ण जन्माष्टमी का समय है । 

मीरा श्याम कुन्ज में ठाकुर के आने की प्रतीक्षा में गायन कर रही है ।

उसे लीला अनुभूति हुई कि वह गोप सखा वेश में आँखों पर पट्टी बाँधे श्यामसुन्दर को ढूँढ रही है ।

तभी गढ़ पर से तोप छूटी । 

चारभुजानाथ के मन्दिर के नगारे , शंख , शहनाई एक साथ बज उठे ।

समवेत स्वरों में उठती जय ध्वनि ने दिशाओं को गुँजा दिया - 

" चारभुजानाथ की जय ! गिरिधरण लाल की जय ।"

उसी समय मीरा ने देखा - जैसे सूर्य चन्द्र भूमि पर उतर आये हो , उस महाप्रकाश के मध्य शांत स्निग्ध ज्योति स्वरूप मोर मुकुट पीताम्बर धारण किए सौन्दर्य - सुषमा सागर श्याम सुन्दर खड़े मुस्कुरा रहे हैं ।
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वे आकर्ण दीर्घ दृग ,उनकी वह ह्रदय को मथ देने वाली दृष्टि , वे कोमल अरूण अधर - पल्लव , बीच में तनिक उठी हुई सुघड़ नासिका , वह स्पृहा - केन्द्र विशाल वक्ष , पीन प्रलम्ब भुजायें ,कर - पल्लव , बिजली सा कौंधता पीताम्बर और नूपुर मण्डित चारू चरण । 

एक दृष्टि में जो देखा जा सका.......! 

फिर तो दृष्टि तीखी धार -कटार से उन नेत्रों में उलझ कर रह गई । 

क्या हुआ ? 

क्या देखा ? 

कितना समय लगा ? 

कौन जाने ? 

समय तो बेचारा प्रभु और उनके प्रेमियों के मिलन के समय प्राण लेकर भाग छूटता है ।

"इतनी व्याकुलता क्यों , क्या मैं तुमसे कहीं दूर था ?" 

श्यामसुन्दर ने स्नेहासिक्त स्वर में पूछा ।

मीरा प्रातःकाल तक उसी लीला अनुभूति में ही मूर्छित रही ।

सबह मूर्छा टूटने पर उसने देखा कि सखियाँ उसे घेर करके कीर्तन कर रही है । 

उसने तानपुरा उठाया ।सखियाँ उसे सचेत हुई जानकार प्रसन्न हुई ।

कीर्तन बन्द करके वे मीरा का भजन सुनने लगी ....!

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🌿 म्हाँरा ओलगिया घर आया जी ।
तन की ताप मिटी सुख पाया , 
हिलमिल मंगल गाया जी ॥

🌿 घन की धुनि सुनि मोर मगन भया,
यूँ मेरे आनन्द छाया जी ।
मगन भई मिल प्रभु अपणा सूँ , 
भौं का दरद मिटाया जी ॥

🌿 चंद को निरख कुमुदणि फूलै ,
हरिख भई मेरी काया जी ।
रगरग सीतल भई मेरी सजनी ,
हरि मेरे महल सिधाया जी ॥

🌿 सब भक्तन का कारज कीन्हा ,
सोई प्रभु मैं पाया जी ।
मीरा बिरहणि सीतल भई ,
दुख द्वदं दूर नसाया जी ॥
म्हाँरा ओलगिया घर आयाजी ॥🌿

इस प्रकार आनन्द ही आनन्द में अरूणोदय हो गया । 
दासियाँ उठकर उसे नित्यकर्म के लिए ले चली ।
_क्रमशः ..................!
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