मलमास, अधिकमास, पुरुषोत्तम मास,
अधिक मास, मलमास और पुरुषोत्तम मास की दिव्य कथा :
जन्मकुंडली • प्रश्नकुंडली • गोचर • प्रभाव • महत्व • फल • नियम • उपाय :
खर मास प्रारंभ :
मंत्र –
गोवर्धनधरं वन्दे गोपालं गोपरूपिणम्।
गोकुलोत्सवमीशानं गोविन्दं गोपिकाप्रियम्।।
यह पुरुषोत्तम मास का सबसे विशेष मंत्र है।
श्रद्धापूर्वक इस मंत्र के जाप से व्यक्ति के जीवन से नकारात्मकता दूर होती है और जीवन में खुशियों का वास होता है मलमास, अधिकमास या पुरुषोत्तम मास एक ही माह के नाम है और इनका संबंध चंद्र की गति से है जबकि खरमास का संबंध सूर्य की गति से है।
हर सौर वर्ष में 2 बार खरमास आते हैं।
पहला सूर्य जब धनु राशि में प्रवेश करता है और दूसरा सूर्य जब मीन राशि में प्रवेश करता है तब खरमास प्रारंभ होता है।
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एक दिन एक गृहस्थ उनके पास आया।
उसने गुरु के चरणों में प्रणाम करके कहा—
“गुरुदेव! मेरे जीवन में पिछले कुछ समय से कार्यों में विलंब हो रहा है।
कभी धन की समस्या आती है, कभी परिवार में तनाव रहता है, कभी कोई शुभ कार्य रुक जाता है।
मैंने सुना है कि अधिक मास आने वाला है।
कोई इसे मलमास कहता है और कोई पुरुषोत्तम मास।
कृपया बताइए कि इसका वास्तविक महत्व क्या है ?”
ऐसी मान्यता है कि इस मंत्र का जप करते समय पीले वस्त्र धारण करने चाहिए, अत्यंत लाभ प्राप्त होता है।
इस के साथ ही पूजा तथा हवन के साथ दान करना भी लाभकारी माना गया है।
इसे मल मास काला महीना भी कहा जाता है।
इस महीने का आरंभ से होता है और ठीक मकर संक्रांति को खर मास की समाप्ति होती है।
खर मास के दौरान हिन्दू जगत में कोई भी धार्मिक कृत्य और शुभ मांगलिक कार्य नहीं किए जाते हैं।
इसके अलावा यह महीना अनेक प्रकार के घरेलू और पारम्परिक शुभकार्यों की चर्चाओं के लिए भी वर्जित है।
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ज्योतिषाचार्य मुस्कुराए और बोले —
“वत्स! अधिक मास को समझने के लिए पहले हमें काल और खगोलीय गणना को समझना होगा।”
उन्होंने कहा—
“चंद्र मास और सौर वर्ष की गणना में अंतर होने के कारण पंचांग में समय - समय पर एक अतिरिक्त चंद्र मास आता है।
इसी को परंपरा में अधिक मास कहा जाता है।
जब इस अतिरिक्त मास के भीतर सूर्य की संक्रांति नहीं पड़ती, तब इसे अधिक मास के रूप में माना जाता है।
धार्मिक परंपरा में इसे पहले ‘मलमास’ कहा गया, लेकिन भगवान विष्णु से जुड़े माहात्म्य में यही मास पुरुषोत्तम मास के नाम से अत्यंत पवित्र माना गया।”
देशाचार के अनुसार नवविवाहिता कन्या भी खर मास के अन्दर पति के साथ संसर्ग नहीं कर सकती है ।
और उसे इस पूरे महीने के दौरान अपने मायके में आकर रहना पड़ता है ।
इस वर्ष भी खर मास से आरम्भ हो रहे है।
खर मास में सभी प्रकार के हवन, विवाह चर्चा, गृह प्रवेश, भूमि पूजन, द्विरागमन, यज्ञोपवीत,विवाह या अन्य हवन कर्मकांड आदि तक का निषेध है।
सिर्फ भागवत कथा या रामायण कथा का सामूहिक श्रवण ही खर मास में किया जाता है।
ब्रह्म पुराण के अनुसार खर मास में मृत्यु को प्राप्त व्यक्ति नर्क का भागी होता है।
अर्थात चाहे व्यक्ति अल्पायु हो या दीर्घायु अगर वह पौष के अन्तर्गत खर मास यानी मल मास की अवधि में अपने प्राण त्याग रहा है तो निश्चित रूप से उसका इहलोक और परलोक नर्क के द्वार की तरफ खुलता है।
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इस बात की पुष्टि महाभारत में होती है जब खर मास के अन्दर अर्जुन ने भीष्म पितामह को धर्म युद्ध में बाणों की शैया से वेध दिया था।
सैकड़ों बाणों से विद्ध हो जाने के बावजूद भी भीष्म पितामह ने अपने प्राण नहीं त्यागे।
प्राण नहीं त्यागने का मूल कारण यही था कि अगर वह इस खर मास में प्राण त्याग करते हैं तो उनका अगला जन्म नर्क की ओर जाएगा।
इसी कारण उन्होंने अर्जुन से पुनः एक ऐसा तीर चलाने के लिए कहा जो उनके सिर पर विद्ध होकर तकिए का काम करे।
इस प्रकार से भीष्म पितामह पूरे खर मास के अन्दर अर्द्ध मृत अवस्था में बाणों की शैया पर लेटे रहे और जब सौर माघ मास की मकर संक्रांति आई उसके बाद शुक्ल पक्ष की एकादशी को उन्होंने अपने प्राणों का त्याग किया।
इस लिए कहा गया है कि माघ मास की देह त्याग से व्यक्ति सीधा स्वर्ग का भागी होता है।
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गृहस्थ ने पूछा—
“गुरुदेव! यदि इसका नाम मलमास है तो फिर यह पुरुषोत्तम मास कैसे बन गया?”
गुरु बोले—
“यही इसकी सबसे सुंदर कथा है।”
खर मास को खर मास क्यों कहा जाता है यह भी एक पौराणिक किंवदंती है।
खर गधे को कहते हैं।
मार्कण्डेय पुराण के अनुसार सूर्य अपने साथ घोड़ों के रथ में बैठकर ब्रह्मांड की परिक्रमा करते है।
और परिक्रमा के दौरान कहीं भी सूर्य को एक क्षण भी रुकने की इजाजत नहीं है।
लेकिन सूर्य के सातों घोड़े सारे साल भर दौड़ लगाते- लगाते प्यास से तड़पने लगे।
उनकी इस दयनीय स्थिति से निबटने के लिए सूर्य एक तालाब के निकट अपने सातों घोड़ों को पानी पिलाने हेतु रुकने लगे।
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लेकिन तभी उन्हें यह प्रतिज्ञा याद आई कि घोड़े बेशक प्यासे रह जाएं लेकिन उनकी यात्रा ने विराम नहीं लेना है।
नहीं तो सौर मंडल में अनर्थ हो जाएगा।
सूर्य भगवान ने चारों ओर देखा… तत्काल ही सूर्य भगवान पानी के कुंड के आगे खड़े दो गधो को अपने रथ पर जोत कर आगे बढ़ गए और अपने सातों घोड़े तब अपनी प्यास बुझाने के लिए खोल दिए गए।
अब स्थिति ये रही कि गधे यानी खर अपनी मन्द गति से पूरे पौष मास में ब्रह्मांड की यात्रा करते रहे और सूर्य का तेज बहुत ही कमजोर होकर धरती पर प्रकट हुआ।
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मकर संक्रांति के दिन से सूर्य पुनः अपने सात अश्वों पर सवार होकर आगे बढ़े और धरती पर सूर्य का तेजोमय प्रकाश धीरे - धीरे बढ़ने लगा।
मकर संक्रांति एक महत्व यह भी है कि उस दिन सूर्य अपने अधम सवारी से मुक्त होकर असली अश्व रथ पर आरूढ़ हुए और दुनिया को अपनी ऊर्जा से प्रभावित करते रहे।
आगामी मलमास ( खरमास ) से शुरू होकर तक रहेगा, जिसमें सूर्य के धनु राशि में प्रवेश के कारण विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन जैसे सभी शुभ और मांगलिक कार्य वर्जित रहेंगे, और इस दौरान जप, तप, दान तथा सूर्य देव की पूजा का विशेष महत्व है, खासकर मकर संक्रांति तक।
जयत्यंजनी - गर्भ - अंभोधि - संभूत
विधु विबुध - कुल - कैरवानंदकारी।
केसरी - चारु - लोचन - चकोरक - सुखद,
लोकगन शोक - संतापहारी।।
जयति जय बालकपि केलि - कौतुक
उदित - चंडकर - मंडल - ग्रासकर्त्ता ।
राहु - रवि - शक्र,पवि - गर्व - खर्वीकरण
शरण - भयहरण जय भुवन भर्त्ता ।।
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हे हनुमान जी आपकी जय हो।
आप अंजनी के गर्भ रूपी समुद्रसे चन्द्ररूप उत्पन्न होकर देव - कुलरूपी कुमुदों को प्रफुल्लित करने वाले हैं, पिता केसरी के सुंदर नेत्र रूपी चकोरों को आनन्द देने वाले हैंऔर समस्त लोकों का शोक-संताप हरने वाले हैं।
आपकी जय हो,जय हो।
अपने बचपन में ही बाललीलासे उदयकालीन प्रचण्ड सूर्य के मण्डल को लाल - लाल खिलौना समझकर निगल लिए थे।
उस समय आपने राहु, सूर्य, इन्द्र और वज्रका गर्व चूर्ण कर दिया था।
हे शरणागत के भय हरने वाले!हे विश्वका भरण - पोषण करने वाले!!आपकी जय हो।
श्रीवत्साकं महादेवं देवगुह्यमनौपमम्
प्रपद्ये सूक्ष्ममचलं वरेण्यमभयप्रदम्।
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प्रभवं सर्वभूतानां निर्गुणं परमेश्वरम्
प्रपद्ये मुक्तसङ्गानां यतीनां परमां गतिम्।।
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| { Theme | Religious |
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| Number of Pieces } | 1 |
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मैं श्रीवत्स - चिह्र धारण करने वाले, महान् देव,देवताओं में गुह्य, उपमा से रहित, सूक्ष्म, अचल तथा अभय देने वाले वरेण्य देव की शरण ग्रहण करता हूं।
मैं समस्त प्राणियों की सृष्टि करने वाले, निर्गुण, नि: सङ्ग, यम और नियम का पालन करने वाले संन्यासियों की परम गति स्वरूप परमेश्वर की शरण ग्रहण करता हूं।'
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🌺 मलमास से पुरुषोत्तम मास बनने की कथा :
पुराणिक परंपरा में एक प्रसिद्ध कथा आती है कि अतिरिक्त मास को अन्य मासों के समान प्रतिष्ठा नहीं मिल रही थी।
वह स्वयं भगवान विष्णु के पास गया और अपनी पीड़ा व्यक्त की।
उसने कहा—
“हे प्रभु! अन्य मासों के अपने - अपने देवता, महत्व और यश हैं, लेकिन मेरा कोई सम्मान नहीं करता। लोग मुझे मलमास कहते हैं। मैं क्या करूँ?”
भगवान विष्णु ने उस मास पर करुणा की।
उन्होंने कहा—
“तुम मेरे शरणागत हो।
इस लिए आज से तुम्हारा संबंध मेरे नाम से होगा।
तुम मेरे लिए अत्यंत प्रिय रहोगे।”
भगवान ने उसे पुरुषोत्तम मास का गौरव प्रदान किया।
इसी कारण धार्मिक परंपरा में अधिक मास के समय भगवान विष्णु, श्रीकृष्ण, पुरुषोत्तम भगवान की भक्ति, नाम - स्मरण, कथा - श्रवण, जप, दान, व्रत और सत्कर्म को विशेष महत्व दिया जाता है।
गुरु ने कहा—
“वत्स! इस कथा का सबसे बड़ा संदेश यह है कि जिसे संसार कम समझे, भगवान उसकी भी महिमा बढ़ा सकते हैं।”
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🕉️ अधिक मास का आध्यात्मिक महत्व :
गुरु ने आगे कहा—
“अधिक मास को केवल अशुभ मास समझना उचित नहीं है।
परंपरा में इसे सांसारिक भोग की अपेक्षा आध्यात्मिक साधना के लिए विशेष अवसर माना गया है।”
इस समय व्यक्ति अपनी दिनचर्या में—
भगवान का नाम - स्मरण, विष्णु पूजा, श्रीमद्भागवत या पुराण कथा श्रवण, गीता - पाठ, मंत्र - जप, ध्यान, दान, सेवा और आत्मचिंतन बढ़ा सकता है।
इस मास का उद्देश्य केवल बाहरी पूजा नहीं, बल्कि अपने भीतर के दोषों को कम करना भी है।
गुरु बोले—
“यदि कोई व्यक्ति अधिक मास में प्रतिदिन थोड़ा समय ईश्वर के लिए निकालता है, किसी जरूरतमंद की सहायता करता है और अपनी वाणी तथा व्यवहार को शुद्ध करता है तो वही इस मास की वास्तविक साधना है।”
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☀️ सूर्य, चंद्रमा और अधिक मास :
ज्योतिषाचार्य ने आकाश की ओर देखकर कहा—
“ज्योतिष और पंचांग की दृष्टि से यह विषय सूर्य और चंद्रमा की गतियों से जुड़ा हुआ है।”
चंद्र मास लगभग 29.5 दिनों का होता है, जबकि सौर वर्ष उससे अलग अवधि का होता है।
इन दोनों गणनाओं के अंतर को संतुलित करने के लिए समय - समय पर अतिरिक्त चंद्र मास आता है।
इस लिए अधिक मास कोई अचानक बना हुआ धार्मिक विचार नहीं है; यह भारतीय पंचांग की सौर - चंद्र कालगणना की एक विशेष व्यवस्था है।
यही कारण है कि अधिक मास का निर्धारण पंचांग की गणना से होता है और इसका समय हर वर्ष नहीं आता।
🔮 जन्मकुंडली के अनुसार अधिक मास का प्रभाव :
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🔯 प्रश्नकुंडली के अनुसार पुरुषोत्तम मास :
गुरु ने कहा —
“यदि किसी व्यक्ति की जन्मकुंडली उपलब्ध नहीं है तो परंपरागत प्रश्न - ज्योतिष में प्रश्न पूछे जाने के समय की ग्रहस्थिति से भी संकेत प्राप्त किए जा सकते हैं।”
प्रश्नकुंडली में लग्न और चंद्रमा की स्थिति, प्रश्न से संबंधित भाव, उनके स्वामी और शुभ - अशुभ ग्रहों के संबंध का विचार किया जाता है।
यदि प्रश्न के समय चंद्रमा बलवान और शुभ प्रभाव में हो तो मन में स्पष्टता तथा कार्य के समाधान की संभावना का संकेत माना जा सकता है।
यदि चंद्रमा पीड़ित हो तो गुरु व्यक्ति को जल्दबाजी से बचने और पहले मानसिक स्थिति को स्थिर करने की सलाह देगा।
पुरुषोत्तम मास का एक सुंदर संदेश यहाँ भी लागू होता है—
पहले मन को स्थिर करो, फिर निर्णय करो।
+++ +++
🪐 गोचर के ग्रह और अधिक मास :
गुरु ने कहा—
“गोचर के ग्रह व्यक्ति के वर्तमान समय का वातावरण बताते हैं।
अधिक मास के दौरान ग्रहों के गोचर को जन्मकुंडली से जोड़कर देखना चाहिए।”
🌟 गुरु का प्रभाव :
गुरु शुभ हो तो ज्ञान, धर्म, गुरु - सेवा, दान, मंत्र - जप, शिक्षा और आध्यात्मिक कार्यों को बढ़ाना शुभ माना जाता है।
🪔 शनि का प्रभाव :
शनि अनुशासन, कर्म, सेवा, धैर्य और जिम्मेदारी का संदेश देता है।
इस समय जरूरतमंद, वृद्ध या श्रमिक की सेवा करना श्रेष्ठ कर्म माना जा सकता है।
🔥 मंगल का प्रभाव :
मंगल सक्रियता और ऊर्जा का ग्रह माना जाता है।
इस लिए क्रोध, विवाद, जल्दबाजी और कटु वाणी से बचना आवश्यक है।
🌙 चंद्रमा का प्रभाव :
चंद्रमा मन का कारक माना जाता है।
ध्यान, जप, शांत वातावरण और सात्त्विक जीवन मन को स्थिर रखने में सहायक हो सकते हैं।
☊ राहु - केतु :
इन ग्रहों से जुड़े ज्योतिषीय प्रभाव में भ्रम और अनिश्चितता से बचना, अंधविश्वास के बजाय विवेक रखना और नियमित ईश्वर - स्मरण करना उचित माना जाता है।
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🌸 पुरुषोत्तम मास के प्रमुख नियम :
परंपरा के अनुसार इस मास में व्यक्ति अपनी सामर्थ्य के अनुसार निम्न नियम अपना सकता है—
१. प्रातः स्नान करके भगवान का स्मरण करें।
२. भगवान विष्णु अथवा अपने इष्टदेव की पूजा करें।
३. “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” का जप करें।
४. विष्णु सहस्रनाम, गीता या धार्मिक ग्रंथ का पाठ करें।
५. कथा और सत्संग सुनें।
६. अन्न, वस्त्र, फल, गौ-सेवा अथवा जरूरतमंदों को यथाशक्ति दान करें।
७. अपनी क्षमता के अनुसार उपवास या सात्त्विक आहार रखें।
८. झूठ, निंदा, चुगली और अनावश्यक विवाद से बचें।
९. माता-पिता, गुरु, वृद्ध और जरूरतमंदों का सम्मान करें।
१०. प्रतिदिन कुछ समय आत्मचिंतन और ध्यान में लगाएँ।
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🪔 पुरुषोत्तम मास के सरल उपाय :
गुरु ने गृहस्थ को कहा —
“महंगे उपाय करना आवश्यक नहीं है।
श्रद्धा और नियमितता सबसे महत्वपूर्ण हैं।”
भगवान विष्णु का उपाय:
प्रतिदिन भगवान विष्णु या श्रीकृष्ण का स्मरण करें।
गुरु ग्रह के लिए:
गुरु, विद्वान, शिक्षक या जरूरतमंद व्यक्ति का सम्मान और यथाशक्ति सेवा करें।
चंद्रमा के लिए:
मन को शांत रखें, माता का सम्मान करें और ध्यान-जप करें।
शनि के लिए:
गरीब, वृद्ध, श्रमिक या असहाय व्यक्ति की सेवा करें।
पितृ - स्मरण:
परिवार की परंपरा के अनुसार पितरों का स्मरण और दान करें।
धन-संबंधी चिंता में:
अनावश्यक खर्च रोकें, ईमानदार कर्म करें और जरूरतमंद को अन्नदान करें।
मानसिक अशांति में:
प्रतिदिन कुछ समय मोबाइल, विवाद और अनावश्यक बातचीत से दूर रहकर भगवान का नाम लें।
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🚫 अधिक मास में क्या नहीं करना चाहिए ?
यहाँ भी शास्त्रीय परंपराओं में क्षेत्र और संप्रदाय के अनुसार मतभेद मिलते हैं।
इस लिए हर प्रकार के विवाह, गृहप्रवेश या अन्य संस्कार को “हर स्थिति में निषिद्ध” कहना उचित नहीं है।
सामान्य धार्मिक परंपरा में अधिक मास को नए सांसारिक मांगलिक कार्यों की अपेक्षा भक्ति, तप, दान और आध्यात्मिक साधना के लिए अधिक उपयुक्त माना जाता है।
इस लिए व्यक्ति को अपने परिवार की परंपरा और योग्य आचार्य की सलाह के अनुसार निर्णय लेना चाहिए।
लेकिन जो कार्य धर्म, सेवा और सदाचार से संबंधित हैं, उनके लिए यह मास विशेष प्रेरणा देता है।
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🌺 कथा का अंतिम संदेश :
गृहस्थ ने पूछा —
“गुरुदेव! यदि मुझे पुरुषोत्तम मास में केवल एक ही उपाय करना हो तो कौन - सा करूँ?”
गुरु मुस्कुराए और बोले—
“वत्स! एक उपाय चुनना हो तो अपने जीवन में एक अच्छा परिवर्तन कर लो।”
“एक महीने तक झूठ कम कर दो।”
“एक महीने तक किसी की निंदा मत करो।”
“एक महीने तक प्रतिदिन भगवान का नाम लो।”
“एक जरूरतमंद व्यक्ति की सहायता करो।”
“अपने माता-पिता और गुरु का सम्मान करो।”
“अपने क्रोध पर नियंत्रण रखो।”
“और प्रत्येक रात स्वयं से पूछो—
आज मैंने कौन-सा अच्छा कर्म किया?
किसी को दुख तो नहीं दिया?
और कल मैं अपने जीवन को थोड़ा और अच्छा कैसे बनाऊँगा?”
गुरु ने कहा—
“यही पुरुषोत्तम मास का सार है।”
“अधिक मास हमें अतिरिक्त समय देता है, लेकिन पुरुषोत्तम मास हमें उस अतिरिक्त समय का श्रेष्ठ उपयोग करना सिखाता है।”
जिस प्रकार वर्ष में आया हुआ अतिरिक्त मास कालगणना को संतुलित करता है, उसी प्रकार जीवन में किया गया आत्मचिंतन हमारे कर्म और विचारों को संतुलित कर सकता है।
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इस लिए —
🌸 अधिक मास को केवल मलमास समझकर भय मत करो।
🌸 इसे पुरुषोत्तम मास समझकर साधना का अवसर बनाओ।
🌸 ग्रहों को दोष देने से पहले अपने कर्मों को देखो।
🌸 भाग्य की प्रतीक्षा से पहले पुरुषार्थ करो।
🌸 धन से पहले धर्म, वाणी से पहले संयम और इच्छा से पहले विवेक रखो।
और अंत में भगवान पुरुषोत्तम से प्रार्थना करें—
“हे श्रीहरि! हमारे मन को शुद्ध करें, बुद्धि को विवेक दें, कर्मों को धर्ममय बनाएं, परिवार में शांति दें और हमें ऐसा जीवन दें जिससे हमारे कारण किसी प्राणी को अनावश्यक दुःख न पहुँचे।”
🙏🏻 ॐ नमो भगवते वासुदेवाय। 🙏🏻 श्री पुरुषोत्तम भगवान की जय। 🌸 सनातन धर्म की जय।
⭐ सद्कर्म ही श्रेष्ठ उपाय है। ⭐
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