नवरात्रि में नवार्ण मंत्र महत्व ?
!! नवरात्रि में नवार्ण मंत्र महत्व : - !!
नवरात्रि में नर्वाण मंत्र का महत्व, प्रभाव, फल और साधना के नियम ;
श्री वैदिक ज्योतिषशास्त्रविद्या तथा पुराण-परम्परा आधारित आध्यात्मिक प्रवचन ;
माता भगवती जगत् जननी दुर्गा जी की साधना - उपासना के क्रम में, नवार्ण मंत्र एक ऐसा महत्त्वपूर्ण महामंत्र है।
नर्वाण मंत्र को शास्त्रीय रूप से नवार्ण मंत्र या नवाक्षरी मंत्र कहा जाता है।
यह भगवती दुर्गा की उपासना का अत्यंत प्रसिद्ध मंत्र है।
नवरात्रि में इसकी साधना शक्ति, भक्ति, आत्मशुद्धि और देवी-कृपा की कामना से की जाती है।
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मूल पाठ है—
श्री दुर्गा नवार्ण मंत्र
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे॥
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे
इस मंत्र की साधना का प्रमुख शास्त्रीय आधार देवीमाहात्म्य है, जिसे दुर्गासप्तशती या चण्डीपाठ भी कहा जाता है।
नवरात्रि में देवी की उपासना करते समय मंत्र का शुद्ध उच्चारण, श्रद्धा, संयम और सदाचार को विशेष महत्त्व दिया जाता है।
नवार्ण अर्थात नौ अक्षरों का इस नौ अक्षर के महामंत्र में नौ ग्रहों को नियंत्रित करने की शक्ति है, जिसके माध्यम से सभी क्षेत्रों में पूर्ण सफलता प्राप्त की जा सकती है और भगवती दुर्गा का पूर्ण आशीर्वाद प्राप्त किया जा सकता है यह महामंत्र शक्ति साधना में सर्वोपरि तथा सभी मंत्रों - स्तोत्रों में से एक महत्त्वपूर्ण महामंत्र है।
यह माता भगवती दुर्गा जी के तीनों स्वरूपों माता महासरस्वती, माता महालक्ष्मी व माता महाकाली की एक साथ साधना का पूर्ण प्रभावक बीज मंत्र है और साथ ही माता दुर्गा के नौ रूपों का संयुक्त मंत्र है और इसी महामंत्र से नौ ग्रहों को भी शांत किया जा सकता है।
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शास्त्रीय आधार और नवार्ण नाम का रहस्य;
नवार्ण मंत्र का मुख्य सम्बन्ध मार्कण्डेय पुराण के देवीमाहात्म्य से है।
देवीमाहात्म्य में भगवती की महिमा, असुरों पर विजय और धर्म की रक्षा का वर्णन है।
यह ग्रन्थ दुर्गासप्तशती, चण्डीपाठ और देवीमाहात्म्य नामों से प्रसिद्ध है।
मंत्र का पाठ इस प्रकार है—
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे॥
नवार्ण का अर्थ नौ अक्षरों वाला मंत्र है।
परम्परागत गणना में ॐ को प्रणव मानकर शेष नौ अक्षरों की गणना की जाती है।
देवीमाहात्म्य की साधना - परम्परा में यह मंत्र अत्यंत महत्त्वपूर्ण माना गया है और सप्तशती पाठ के आरम्भ तथा समापन में इसका प्रयोग होता है।
मंत्र के बीजाक्षरों का भावार्थ ;
ॐ
परमात्मा और सम्पूर्ण सृष्टि की स्मृति।
ऐं महासरस्वती बीज
विद्या, बुद्धि, वाणी और ज्ञान का भाव।
ह्रीं
महामाया / महालक्ष्मी का बीज
देवी की सृजनात्मक शक्ति, हृदय की शुद्धि और संरक्षण।
क्लीं
शक्ति का बीज
परम्परागत व्याख्या में आकर्षण, प्रेम और देवी-शक्ति का भाव।
चामुण्डायै
चामुण्डा देवी को नमस्कार
चण्ड और मुण्ड का संहार करने वाली भगवती का आह्वान।
विच्चे
मंत्र का अंतिम बीज
तांत्रिक परम्पराओं में इसका अर्थ बन्धनों और अविद्या को काटने वाली शक्ति से जोड़ा जाता है।
बीजाक्षरों के ये अर्थ साधना - परम्परा की व्याख्याएँ हैं; इन्हें साधारण शब्दकोशीय अनुवाद न समझें।
नवरात्रि में भगवती के नौ रूपों की पूजा की जाती है।
देवीमाहात्म्य की परम्परा में भी भगवती को महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती के रूप में स्तुति की जाती है।
नवार्ण मंत्र इन शक्तियों को एक साथ स्मरण करने वाला प्रमुख मंत्र माना जाता है।
नवरात्रि की नौ रातें साधक को बाहरी उत्सव के साथ - साथ भीतर के अज्ञान, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार पर विजय का अवसर देती हैं।
भगवती चामुण्डा का असुर - वध इसी आध्यात्मिक भाव का प्रतीक माना जाता है।
इस प्रकार मंत्र का लक्ष्य केवल किसी सांसारिक इच्छा की पूर्ति नहीं, बल्कि देवी के प्रति समर्पण और आत्मबल की वृद्धि भी है।
नवार्ण मंत्र :
|| ऐं ह्रीं क्लीं चामुंडायै विच्चे ||
नौ अक्षर वाले इस अद्भुत नवार्ण मंत्र में देवी दुर्गा की नौ शक्तियां समायी हुई है।
जिसका सम्बन्ध नौ ग्रहों से भी है।
ऐं = सरस्वती का बीज मन्त्र है ।
ह्रीं = महालक्ष्मी का बीज मन्त्र है ।
क्लीं = महाकाली का बीज मन्त्र है ।
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मंत्र के प्रभाव और फल ;
नवार्ण मंत्र के प्रभावों का वर्णन धार्मिक परम्परा और साधना के संदर्भ में करना उचित है।
इसे किसी रोग, धन, विवाह या भविष्य की निश्चित सफलता की गारंटी नहीं माना जाना चाहिए।
मन की एकाग्रता और आत्मशुद्धि ;
नियमित जप से मन को एक पवित्र ध्येय पर स्थिर करने और विचारों में संयम लाने का अभ्यास होता है।
आध्यात्मिक रक्षा का भाव ;
देवी को चण्डिका और चामुण्डा रूप में स्मरण करने से भय, नकारात्मक प्रवृत्तियों और संकटों का सामना करने के लिए श्रद्धा और साहस का भाव जागृत होता है।
विद्या और विवेक ;
ऐं बीज के द्वारा महासरस्वती का स्मरण ज्ञान, वाणी और सही निर्णय की साधना से जोड़ा जाता है।
भक्ति और देवी - कृपा ;
ह्रीं, क्लीं तथा चामुण्डायै का जप भगवती के प्रति प्रेम, समर्पण और आन्तरिक शक्ति की उपासना का साधन है।
ये फल परम्परागत आध्यात्मिक अर्थों में हैं, प्रत्यक्ष भौतिक परिणामों का प्रमाणित दावा नहीं।
इसके साथ नवार्ण मंत्र के प्रथम बीज ” ऐं “ से माता दुर्गा की प्रथम शक्ति माता शैलपुत्री की उपासना की जाती है, जिस में सूर्य ग्रह को नियंत्रित करने की शक्ति समायी हुई है।
नवार्ण मंत्र के द्वितीय बीज ” ह्रीं “ से माता दुर्गा की द्वितीय शक्ति माता ब्रह्मचारिणी की उपासना की जाती है, जिस में चन्द्र ग्रह को नियंत्रित करने की शक्ति समायी हुई है।
नवार्ण मंत्र के तृतीय बीज ” क्लीं “ से माता दुर्गा की तृतीय शक्ति माता चंद्रघंटा की उपासना की जाती है, जिस में मंगल ग्रह को नियंत्रित करने की शक्ति समायी हुई है।
नवार्ण मंत्र के चतुर्थ बीज ” चा “ से माता दुर्गा की चतुर्थ शक्ति माता कुष्मांडा की उपासना की जाती है, जिस में बुध ग्रह को नियंत्रित करने की शक्ति समायी हुई है।
नवार्ण मंत्र के पंचम बीज ” मुं “ से माता दुर्गा की पंचम शक्ति माँ स्कंदमाता की उपासना की जाती है, जिस में बृहस्पति ग्रह को नियंत्रित करने की शक्ति समायी हुई है।
नवार्ण मंत्र के षष्ठ बीज ” डा “ से माता दुर्गा की षष्ठ शक्ति माता कात्यायनी की उपासना की जाती है, जिस में शुक्र ग्रह को नियंत्रित करने की शक्ति समायी हुई है।
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नवरात्रि में नवार्ण मंत्र जप की विधि ;
नवरात्रि में साधना के लिए सबसे महत्त्वपूर्ण बात है कि मंत्र का जप श्रद्धा, शुद्ध आचरण और नियमितता से किया जाए।
विस्तृत तांत्रिक अनुष्ठान की विधि अलग - अलग सम्प्रदायों में भिन्न होती है।
सामान्य गृहस्थ भक्त के लिए सरल देवी - पूजा और मंत्र - स्मरण उपयुक्त आरम्भ है।
नवार्ण मंत्र के सप्तम बीज ” यै “ से माता दुर्गा की सप्तम शक्ति माता कालरात्रि की उपासना की जाती है, जिस में शनि ग्रह को नियंत्रित करने की शक्ति समायी हुई है।
नवार्ण मंत्र के अष्टम बीज ” वि “ से माता दुर्गा की अष्टम शक्ति माता महागौरी की उपासना की जाती है, जिस में राहु ग्रह को नियंत्रित करने की शक्ति समायी हुई है।
नवार्ण मंत्र के नवम बीज ” चै “ से माता दुर्गा की नवम शक्ति माता सिद्धीदात्री की उपासना की जाती है, जिस में केतु ग्रह को नियंत्रित करने की शक्ति समायी हुई है।
स्नान और शुद्ध स्थान ;
देवी का ध्यान ;
संकल्प ;
नवार्ण मंत्र का जप ;
कितनी माला करें ?
समापन प्रार्थना ;
नवार्ण मंत्र साधना विधी :
विनियोग:
ll ॐ अस्य श्रीनवार्णमंत्रस्य ब्रम्हाविष्णुरुद्राऋषय:गायत्र्युष्णिगनुष्टुभश्छंन्दांसी, श्रीमहाकालीमहालक्ष्मीमहासर स्वत्यो देवता: , ऐं बीजम , ह्रीं शक्ति: ,क्लीं कीलकम श्रीमहाकालीमहालक्ष्मीमहासर स्वत्यो प्रीत्यर्थे जपे विनियोग: ll
विलोम बीज न्यास :
ॐ च्चै नम: गूदे ।
ॐ विं नम: मुखे ।
ॐ यै नम: वाम नासा पूटे ।
ॐ डां नम: दक्ष नासा पुटे ।
ॐ मुं नम: वाम कर्णे ।
ॐ चां नम: दक्ष कर्णे ।
ॐ क्लीं नम: वाम नेत्रे ।
ॐ ह्रीं नम: दक्ष नेत्रे ।
ॐ ऐं ह्रीं नम: शिखायाम ॥
( विलोम न्यास से सर्व दुखोकी नाश होता है,संबन्धित मंत्र उच्चारण की साथ दहीने हाथ की उँगलियो से संबन्धित स्थान पे स्पर्श की जिये )
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ॐ च्चै नम: गूदे ।
ॐ विं नम: मुखे ।
ॐ यै नम: वाम नासा पूटे ।
ॐ डां नम: दक्ष नासा पुटे ।
ॐ मुं नम: वाम कर्णे ।
ॐ चां नम: दक्ष कर्णे ।
ॐ क्लीं नम: वाम नेत्रे ।
ॐ ह्रीं नम: दक्ष नेत्रे ।
ॐ ऐं ह्रीं नम: शिखायाम ॥
( विलोम न्यास से सर्व दुखोकी नाश होता है,संबन्धित मंत्र उच्चारण की साथ दहीने हाथ की उँगलियो से संबन्धित स्थान पे स्पर्श की जिये )
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ब्रम्हारूप न्यास:-
ॐ ब्रम्हा सनातन: पादादी नाभि पर्यन्तं मां पातु ॥
ॐ जनार्दन: नाभेर्विशुद्धी पर्यन्तं नित्यं मां पातु ॥
ॐ रुद्र स्त्रीलोचन: विशुद्धेर्वम्हरंध्रातं मां पातु ॥
ॐ हं स: पादद्वयं मे पातु ॥
ॐ वैनतेय: कर इयं मे पातु ॥
ॐ वृषभश्चक्षुषी मे पातु ॥
ॐ गजानन: सर्वाड्गानी मे पातु ॥
ॐ सर्वानंन्द मयोहरी: परपरौ देहभागौ मे पातु ॥
( ब्रम्हारूपन्यास से सभी मनोकामनाये पूर्ण होती है, संबन्धित मंत्र उच्चारण की साथ दोनों हाथो की उँगलियो से संबन्धित स्थान पे स्पर्श कीजिये )
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ध्यान मंत्र :
खड्गमं चक्रगदेशुषुचापपरिघात्र्छुलं भूशुण्डीम शिर: शड्ख संदधतीं करैस्त्रीनयना सर्वाड्ग भूषावृताम ।
नीलाश्मद्दुतीमास्यपाददशकां सेवे महाकालीकां यामस्तौत्स्वपिते हरौ कमलजो हन्तुं मधु कैटभम ॥
नवार्ण मंत्र के नियम ;
सत्य और सदाचार: जप के साथ झूठ, छल, हिंसा और अनुचित कर्मों से बचने का प्रयास करें।
नियमित समय: प्रतिदिन एक ही समय पर जप करने से साधना में अनुशासन बना रहता है।
उच्चारण: मंत्र को शुद्ध रूप से बोलने का प्रयास करें। विशेष रूप से चामुण्डायै और विच्चे के उच्चारण में सावधानी रखें।
आहार और संयम: नवरात्रि में सात्त्विक आहार, संयमित वाणी और शांत मन का अभ्यास करें।
दीक्षा का सम्मान: गहन तांत्रिक प्रयोग, न्यास, विशेष बीज - साधना या अनुष्ठान गुरु - परम्परा के निर्देश से करें।
ये सामान्य साधना-संबंधी अनुशासन हैं।
सभी नियम हर परम्परा में एक जैसे नहीं होते; इस लिए किसी एक ऑनलाइन विधि को सर्वमान्य शास्त्रीय आदेश न मानें।
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माला पूजन :
जाप आरंभ करने से पूर्व ही इस मंत्र से माला का पुजा की जिये , इस विधि से आपकी माला भी चैतन्य हो जाती है.
“ ऐं ह्रीं अक्षमालिकायै नंम:’’
ॐ मां माले महामाये सर्वशक्तिस्वरूपिनी ।
चतुर्वर्गस्त्वयि न्यस्तस्तस्मान्मे सिद्धिदा भव ॥
ॐ अविघ्नं कुरु माले त्वं गृहनामी दक्षिणे करे ।
जपकाले च सिद्ध्यर्थ प्रसीद मम सिद्धये ॥
ॐ अक्षमालाधिपतये सुसिद्धिं देही देही सर्वमन्त्रार्थसाधिनी साधय साधय सर्वसिद्धिं परिकल्पय परिकल्पय मे स्वाहा।
अब आप चैतन्य माला से नवार्ण मंत्र का जाप करे-
नवार्ण मंत्र :
ll ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ll
नवार्ण मंत्र की सिद्धि 9 दिनो मे 1, 25 , 000 मंत्र जाप से होती है...!
परंतु आप ऐसे नहीं कर सकते है तो रोज 1 , 3 , 5 , 7 , 11 , 21….!
इत्यादि माला मंत्र जाप भी कर सकते है...!
इस विधि से सारी इच्छाये पूर्ण होती है...!
दुख कम होते है और धन की वसूली भी सहज ही हो जाती है।
हमे शास्त्र के हिसाब से यह सोलह प्रकार के न्यास देखने मिलती है जैसे ऋष्यादी,कर , हृदयादी , अक्षर , दिड्ग , सारस्वत , प्रथम मातृका , द्वितीय मातृका , तृतीय मातृका , षडदेवी , ब्रम्हरूप , बीज मंत्र , विलोम बीज , षड,सप्तशती , शक्ति जाग्रण न्यास और बाकी के 8 न्यास गुप्त न्यास नाम से जाने जाते है....!
इन सारे न्यासो का अपना एक अलग ही महत्व होता है...!
उदाहरण के लिये शक्ति जाग्रण न्यास से माँ सुष्म रूप से साधकोके सामने शीघ्र ही आ जाती है और मंत्र जाप की प्रभाव से प्रत्यक्ष होती है और जब माँ चाहे कि सिभी रूप मे क्यू न आये हमारी कल्याण तो निच्छित ही कर देती है।
आप नवरात्री एवं अन्य दिनो मे भी इस मंत्र के जाप कर सकते है.मंत्र जाप काली हकीक माला अथवा रुद्राक्ष माला से ही किया करे।
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वैदिक ज्योतिष और नक्षत्र पद्धति से नवरात्रि साधना ;
श्री वैदिक ज्योतिषशास्त्रविद्या, श्री खगोलशास्त्रविद्या तथा नक्षत्र पद्धति में सूर्य, चन्द्र, तिथि और नक्षत्र के आधार पर काल - विचार किया जाता है।
नवरात्रि की तिथि और घटस्थापना के समय का निर्धारण भी पंचांग परम्परा से किया जाता है।
परन्तु नवार्ण मंत्र की साधना के लिए जन्मकुंडली में किसी विशेष ग्रह का होना अनिवार्य नहीं है।
ग्रहों के साथ देवी - उपासना का सम्बन्ध ;
ज्योतिषीय विषय साधना में भाव ;
चन्द्रमा मन की स्थिरता और भक्ति
सूर्य आत्मबल, तेज और अनुशासन
गुरु ज्ञान, धर्म और सद्बुद्धि
मंगल साहस, शक्ति और कर्म
बुध वाणी, विवेक और मंत्रोच्चार
शुक्र श्रद्धा, सौन्दर्य और प्रेम
शनि धैर्य, कर्म और संयम
राहु-केतु भ्रम, आसक्ति और आत्मचिन्तन
यह तालिका ज्योतिषीय प्रतीकों और आध्यात्मिक भावों का सम्बन्ध बताती है।
इस से यह निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए कि नवार्ण मंत्र किसी निश्चित ग्रहदोष को अवश्य समाप्त कर देगा।
जन्मकुंडली, दशा, गोचर और नक्षत्रों के फल का विश्लेषण अलग विषय है।
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कृष्णमूर्ति पद्धति और अंकशास्त्र ;
श्री कृष्णमूर्तिपद्धतिविद्या में भावों, नक्षत्र स्वामियों और उपस्वामियों के आधार पर ज्योतिषीय घटनाओं का विश्लेषण किया जाता है।
नवार्ण मंत्र का जप एक आध्यात्मिक अनुशासन है;
इसे किसी भाव के निश्चित फल का प्रमाणित कारण नहीं कहा जा सकता।
अंकशास्त्र में नौ अंक और नवग्रहों के प्रतीकात्मक सम्बन्ध का प्रयोग होता है।
नवार्ण नाम में नौ अक्षरों की परम्परागत गणना के कारण कुछ साधक इसे नवग्रहों और नवदुर्गा से जोड़ते हैं।
यह धार्मिक प्रतीकात्मक व्याख्या है, स्वतंत्र वैज्ञानिक प्रमाण नहीं।
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हस्तरेखा, सामुद्रिक और वास्तुशास्त्र के अनुसार ;
श्री हस्तरेखाशास्त्रविद्या तथा श्री सामुद्रिकशास्त्रविद्या में शरीर और हाथ के चिह्नों को परम्परागत संकेतों के रूप में देखा जाता है।
किसी व्यक्ति के हाथ की रेखा, ललाट या शरीर के चिह्न देखकर यह निश्चित नहीं कहा जा सकता कि उसे नवार्ण मंत्र की दीक्षा मिलेगी, सिद्धि प्राप्त होगी अथवा उसकी इच्छा अवश्य पूर्ण होगी।
श्री वास्तुशास्त्रविद्या के अनुसार पूजा - स्थान स्वच्छ, शांत और व्यवस्थित रखना उपयोगी है।
नवरात्रि में देवी का चित्र या विग्रह रखकर दीपक और पुष्प अर्पित करना भक्ति का सरल माध्यम है।
पूजा के लिए दिशा, आसन और विशेष स्थान सम्बन्धी नियम परम्परा के अनुसार अलग हो सकते हैं;
किसी एक दिशा को सभी साधकों के लिए अनिवार्य न मानें।
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ऋग्वेद, भविष्यपुराण, भृगु-संहिता और गर्ग-संहिता का सन्दर्भ ;
आपके द्वारा बताई गई पुराण - परम्परा में देवी, शक्ति, धर्म, कर्म और उपासना के अनेक प्रसंग मिलते हैं।
किन्तु शास्त्रोक्त सच्चोंट और सटीक लेखन के लिए प्रत्येक ग्रन्थ के मूल संस्कृत पाठ, अध्याय और श्लोक का सत्यापन आवश्यक है।
विशेष सावधानी:
नवार्ण मंत्र को सीधे ऋग्वेद, भविष्यपुराण, भृगु - संहिता या गर्ग - संहिता का मूल मंत्र बताना उचित नहीं होगा, जब तक उस ग्रन्थ में प्रमाणित पाठ उपलब्ध न हो।
उपलब्ध शास्त्रीय परम्परा में इसका प्रमुख सम्बन्ध देवीमाहात्म्य और देवी - अथर्वशीर्ष की व्याख्याओं से है।
प्रमाणित पाठ के लिए ;
देवीमाहात्म्य के मूल संस्कृत पाठ तथा देवी - अथर्वशीर्ष की प्रामाणिक संस्करणों में मंत्र और उसकी व्याख्या देखें।
नवार्ण मंत्र का पाठ, देवी के तीन रूपों का भाव और साधना - परम्परा का सम्बन्ध इन स्रोतों में मिलता है।
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नवरात्रि में क्या फल माँगना चाहिए ?
भगवती की उपासना में सांसारिक इच्छा रखना अपने आप में अनुचित नहीं है, परन्तु साधक को केवल फल की लालसा में मंत्र का उपयोग नहीं करना चाहिए।
सच्ची साधना का भाव यह होना चाहिए कि देवी मुझे सद्बुद्धि, धैर्य, विवेक, आत्मबल और धर्ममय जीवन प्रदान करें।
नवार्ण मंत्र के साथ निम्न प्रार्थना की जा सकती है—
देवी प्रार्थना ;
हे भगवती चामुण्डे! मेरे मन से अज्ञान, भय, अहंकार और अधर्म को दूर करने की शक्ति प्रदान करें।
मुझे सत्य, धर्म, भक्ति, सद्बुद्धि और सभी प्राणियों के कल्याण के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दें।
मेरे परिवार और समस्त संसार पर आपकी कृपा बनी रहे।
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नवरात्रि साधना का निष्कर्ष ;
नवार्ण मंत्र केवल नौ अक्षरों का उच्चारण नहीं, बल्कि भगवती की शक्ति, ज्ञान, करुणा और आत्मशुद्धि का स्मरण है।
नवरात्रि में इसका जप करने से साधक अपने भीतर के विकारों पर विजय का संकल्प लेता है।
देवी की उपासना में नियमितता, श्रद्धा, शुद्ध आचरण, सत्य और सेवा का महत्त्व मंत्र की संख्या से कम नहीं है।
अन्तिम संदेश:
नवार्ण मंत्र का जप करें, परन्तु उसके साथ अपने कर्म, विचार और व्यवहार को भी शुद्ध करने का प्रयास करें।
देवी की कृपा का सच्चा फल यही है कि मनुष्य धर्म, विवेक और भक्ति के मार्ग पर आगे बढ़े।
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे॥
जय माता दी। सन्दर्भ और आगे का अध्ययन पंडारामा प्रभु राज्यगुरु
((((((( जय जय श्री राधे )))))))
हर हर महादेव जय मां अंबे मां !!!!! शुभमस्तु !!!
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पंडित राज्यगुरु प्रभुलाल पी. वोरिया क्षत्रिय राजपूत जड़ेजा कुल गुर: -
PROFESSIONAL ASTROLOGER EXPERT IN:-
-: 1987 YEARS ASTROLOGY EXPERIENCE :-
(2 Gold Medalist in Astrology & Vastu Science)
" Opp. Shri Satvara vidhyarthi bhuvn,
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जय जय परशुरामजी...🙏🙏🙏
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