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Wednesday, November 19, 2025

|| गोपाष्टमी महोत्सव ||

||  गोपाष्टमी महोत्सव ||

 गोपाष्टमी महोत्सव :

श्री वैदिक ज्योतिषशास्त्रविद्या, श्री खगोलशास्त्रविद्या, वेदाङ्ग ज्योतिष, श्री विष्णुपुराण, श्री भविष्य पुराण एवं श्री पद्म पुराण के आलोक में गोपाष्टमी महोत्सव का महत्व, नियम, फल एवं वैदिक उपाय 

यह पर्व कार्तिक शुक्ल अष्टमी तिथि को मनाया जाता है और इस साल यह तिथि 29 अक्टूबर को सुबह शुरू होकर 30 अक्टूबर की सुबह 10:06 बजे तक रहेगी, इस लिए उदया तिथि के अनुसार यह 30 अक्टूबर को मनाई जाएगी।


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कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की अष्टमी को ‘गोपाष्टमी’ के रूप में मनाया जाता है। 

सनातन धर्म में गौ को केवल एक पशु नहीं, बल्कि धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की आधारशिला माना गया है। 

वेदों में गौ को समृद्धि, शुद्धता, पोषण और देवत्व का प्रतीक कहा गया है। 

श्री विष्णुपुराण, पद्म पुराण, भविष्य पुराण तथा वैदिक परंपरा में गोपाष्टमी का विशेष महत्व वर्णित है।

यह पर्व भगवान श्रीकृष्ण, गोमाता और गोसेवा के प्रति श्रद्धा, कृतज्ञता तथा धर्मपालन का दिव्य उत्सव है।

इस दिन भगवान वासुदेव ने गोचारण की सेवा प्रारंभ की थी। 

इस के पूर्व वे केवल बछड़ों की देखभाल करते थे। 

कथा है कि बालक कृष्ण पहले केवल बछड़ों को चराने जाते थे और उन्हें अधिक दूर जाने की भी अनुमति नहीं थी। 

एक दिन कृष्ण ने मां यशोदा से गायों की सेवा करने की इच्छा व्यक्त की और कहा कि मां मुझे गाय चराने की अनुमति चाहिए। 

उनके अनुग्रह पर नंद बाबा और यशोदा मैया ने शांडिल्य ऋषि से अच्छा समय देखकर मुहूर्त निकालने के लिए कहा। 

ऋषि ने गाय चराने ले जाने के लिए जो समय निकाला, वह गोपाष्टमी का शुभ दिन था।

गोपाष्टमी सामान्यतः कार्तिक शुक्ल अष्टमी को मनाई जाती है। 

परंपरा के अनुसार इसी दिन भगवान श्रीकृष्ण ने पहली बार बछड़ों के स्थान पर गायों को चराने का दायित्व संभाला था। 

तभी से यह दिन गोपालन, गोपूजन और गोसेवा का महापर्व माना जाता है।

यशोदा मैया ने कृष्ण को अच्छे से तैयार किया। 

उन्हें बड़े गोप - सखाओं जैसे वस्त्र पहनाए। 

सिर पर मोर - मुकुट, पैरों में पैजनिया पहनाई, परंतु जब मैया उन्हें सुंदर - सी पादुका पहनाने लगीं, तो वे बोले यदि वे सभी गौओं और गोप - सखाओं को भी पादुकाएं पहनाएंगी, तभी वे भी पहनेंगे। 

कान्हा के इस प्रेमपूर्ण व्यवहार से मैया का हृदय भर आया और वे भाव - विभोर हो गईं। 

इसके पश्चात कृष्ण ने गायों की पूजा तथा प्रदक्षिणा करते हुए साष्टांग प्रणाम किया और बिना पादुका पहने गोचारण के लिए निकल पड़े।

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ब्रज में किंवदंती यह भी है कि राधारानी भी भगवान के साथ गोचारण के लिए जाना चाहती थीं, परंतु स्त्रियों को इसकी अनुमति नहीं थी, इस लिए वे और उनकी सखियां गोप - सखाओं का भेष धारण करके उनके समूह में जा मिलीं, परंतु भगवान ने राधारानी को तुरंत पहचान लिया। 

इसी लीला के कारण आज के दिन ब्रज के सभी मंदिरों में राधारानी का गोप - सखा के रूप में शृंगार किया जाता है।

वैदिक ज्योतिष में भी गोपाष्टमी का महत्व केवल धार्मिक नहीं, बल्कि ग्रहशांति, पुण्यवृद्धि और शुभ कर्मों के लिए अत्यंत फलदायी माना गया है। 

जन्मकुंडली, प्रश्नकुंडली तथा गोचर में यदि चन्द्रमा, गुरु, शुक्र अथवा नवम एवं द्वादश भाव से संबंधित शुभ योग बनते हों, तो इस दिन किए गए पुण्य कर्मों का प्रभाव और अधिक श्रेष्ठ माना जाता है। 

गोपाष्टमी के अवसर पर गौशाला में गोसंवर्धन हेतु गौ पूजन का आयोजन किया जाता है। 

गौमाता पूजन कार्यक्रम में सभी लोग परिवार सहित उपस्थित होकर पूजा अर्चना करते हैं। 

महिलाएं श्रीकृष्ण की पूजा कर गऊओं को तिलक लगाती हैं। 

गायों को हरा चारा, गुड़ इत्यादि खिलाया जाता है तथा सुख - समृद्धि की कामना की जाती है। 

गोपाष्टमी, ब्रज में भारतीय संस्कृति का एक प्रमुख पर्व है। 

गाय की रक्षा और गोचारण करने के कारण भगवान कृष्ण को ‘गोविंद’ और ‘गोपाल’ नाम से भी संबोधित किया जाता है।

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गोपाष्टमी का आध्यात्मिक महत्व :

शास्त्रों के अनुसार गौ में समस्त देवताओं का निवास माना गया है। 

गोमाता की सेवा केवल जीवदया नहीं, बल्कि ईश्वर सेवा का ही एक स्वरूप है। 

भगवान श्रीकृष्ण स्वयं "गोविन्द", "गोपाल" और "गोवर्धनधारी" कहलाए। 

इससे स्पष्ट होता है कि गौ एवं श्रीकृष्ण का संबंध सनातन धर्म में अत्यंत पवित्र माना गया है।

गोपाष्टमी हमें यह शिक्षा देती है कि जो व्यक्ति प्रकृति, गौ, माता-पिता, गुरु और धर्म का सम्मान करता है, उसके जीवन में सुख, शांति और समृद्धि का विस्तार होता है।

एक अन्य मान्यता के अनुसार श्रीकृष्ण ने कार्तिक शुक्ल पक्ष, प्रतिपदा से सप्तमी तक ‘गो - गोप - गोपियों’ की रक्षा के लिए गोवर्धन पर्वत को धारण किया था। 

तभी से अष्टमी को ‘गोपाष्टमी’ के तौर पर मनाया जाने लगा। 

अष्टमी के दिन ही कृष्ण ने इंद्र का मान - मर्दन किया था और इंद्र ने अपने व्यवहार के लिए कृष्ण से क्षमा मांगी।



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आजन्म ते परद्रोह रत पापौघमय तव तनु अयं।

तुम्हहू दियो निज धाम राम नमामि ब्रह्म निरामयं।।


यदि कोई व्यक्ति दिन रात पापकर्म करे,उसका जीवन अनाचार दुराचार में व्यतीत हो रहा हो...!

तो उसके जो सच्चे हितैषी होते हैं उन्हें उसके परिणाम की चिंता रहती है...! 

अतः  रावण के हित के प्रति रावण भार्या मंदोदरी के चिंता स्वाभाविक है।

जब रावण युद्ध भूमि में अंतिम युद्ध कर रहा था उस समय भी मंदोदरी मां भवानी मंदिर में उनके मूर्ति के सामने दैन्य भाव से पति हित की ही याचना कर रही थी।

( इस का प्रमाण है कि जब रावण वध के समय आया तो मां भवानी पार्वती जी के प्रतिमा भी रोने लगी - )

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प्रतिमा स्रवहिं नयन मग बारी

          (6/102/10)


वो जब भी याचना करती तो सुहाग की -

        मम अहिवात न जाइ।


किन्तु मन में ये था कि जो जैसा कर्म करता है उसे उसका फल अवश्य मिलता है अतः दिन रात यही सोचती थी कि रावण को कौन सी अधोगति प्राप्त होगी। 

इसने तो आज तक वैर करने के अतिरिक्त किया ही क्या है ?

हठि सबहिं के पंथहि लागा


अतः कर्मफल सिद्धान्त के अनुसार सबसे निम्न और दुखद रौरव नर्क मिलना चाहिए। 

वो रावण वध के बाद रावण के मृत शरीर पर शीर पीट पीट कर रो रही थी कि कवि महोदय अपने काव्य रचना में ही रोने लगे -


रोवत करहिं प्रलाप बखाना :

तो किसी भाव को व्यक्त करने के लिए उसकी गहराई में जाना ही पड़ता है अतः चले गए।

अतः प्रभु ने सोचा कि इस करूण क्रंदन में संख्या बढ़ते जा रही है,अतः क्यों न मुख्य को सत्य से अवगत करा दूं!और यदि उसने समझ लिया तो फिर सब समझ जाएंगे।

इस लिए मंदोदरी को तारा की भांति ही दिव्य ज्ञान प्रदान कर दिए -

 दीन्हि ग्यान हर लीन्ही माया।


तो मंदोदरी ने उन दिव्य दृष्टि से देखा तो परम आश्चर्य!मैं जिसे रौरव आदि नर्क में ढूंढ रही वो तो ब्रह्म धाम / साकेत धाम में हैं। 

राम जी ने रावण को भी अपना धाम दे दिया जबकि ऐसा विधि के विधान में है ही नहीं।

अतः उन परम सत्ता के परम कृपा देखकर अभिभूत हो गई और छाती पीटने के स्थान पर हाथ जोड़कर वंदन करने लगी कि -

तुम्हहू दियो निज धाम राम नमामि ब्रह्म निरामयं कहा जाता है कि निर्दोषो हि समं ब्रह्मःतो आप सचमुच निर्दोष हो!आपको तो रावण में भी गुण दिखाई दिया कि वैर में ही सही किन्तु मुझे स्मरण करता है।

अतः आप धन्य हो प्रभु!

हे निर्विकार ब्रह्म राम! आप मेरा प्रणाम स्वीकार करें..।


          || सीताराम जय सीताराम ||

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|| 🌾गोपाष्टमी पर्व 🌾 || 

गौ माता की सेवा एवं सामीप्य से आयुर्विद्या, यश - श्री, आयुष्य और कैवल्य सहज ही प्राप्त हो जाता है! 

और मानव जाति की समृद्धि गौ - माता की समृद्धि से जुड़ी है, इस लिए गोपाष्टमी पर्व इनके प्रति कृतज्ञता प्रकट करने का दिवस है।

गौ - माता भगवान श्रीकृष्ण की परम अराध्या हैं, वे भवसागर से पार लगाने वाली हैं। 

गौ - माता की सेवा तीर्थ - सेवा के समान है। 

गौ - माता ऐसा देवस्थान हैं, जिसमें हजारों देवता एक साथ निवास करते हैं। 
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ऐसा दिव्य स्थान, ऐसा दिव्य मंदिर, ऐसा दिव्य तीर्थ देखना हो तो वह हैं - गौ  - माता; और इन से बढ़कर सनातनधर्मी के लिए न कोई देव - स्थान है, न कोई जप - तप है और न ही कोई सुगम कल्याणकारी मार्ग है। 

वैदिक ज्योतिष में गोपाष्टमी

वैदिक ज्योतिष में गुरु धर्म, ज्ञान और पुण्य का कारक है। चन्द्रमा मन एवं करुणा का प्रतिनिधि है। शुक्र सुख, ऐश्वर्य और समृद्धि का कारक है। 

यदि ये ग्रह शुभ हों तो गोसेवा का पुण्य अनेक गुना बढ़ जाता है।

यदि जन्मकुंडली में गुरु निर्बल हो, चन्द्रमा पीड़ित हो, नवम भाव कमजोर हो अथवा गोचर में ग्रह बाधा दे रहे हों, तो गोपाष्टमी के दिन गोपूजन, दान और भगवान श्रीकृष्ण की आराधना शुभ फल देने वाली मानी जाती है।

न कोई योग - यज्ञ है और न कोई मोक्ष का साधन ही है। 

कलियुग में गौ - सेवा ही सबसे बड़ा पुण्य का कार्य है। 

अब तो विज्ञान भी कहता है कि भारतीय गाय के संपूर्ण तत्व अमृततुल्य है। 

चाहे फिर वह दूध - घी - दही हो या फिर गाय का गोबर या गोमूत्र हो, गाय जहां शांति से श्वास लेती है उसके आसपास का वातावरण भी ऊर्जावान व पवित्र हो जाता है।

हमारे धर्म ग्रंथ कहते हैं कि साधु और गाय की सेवा का अवसर कभी नहीं गंवाना चाहिए। 

साधु की वाणी में ईश्वर की प्रतिध्वनि होती है। 

वहीं गाय की श्वास में सभी देवी - देवताओं का आशीर्वाद होता है। 
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जन्मकुंडली के अनुसार महत्व :

यदि जन्मकुंडली में चन्द्रमा शुभ हो तो गोपाष्टमी पर किया गया जप एवं पूजन मानसिक शांति बढ़ाता है।

यदि गुरु शुभ हो तो धर्म, ज्ञान, संतान और भाग्य में उन्नति होती है।

यदि शुक्र शुभ हो तो गृहस्थ जीवन, सुख, धन और वैभव में वृद्धि होती है।

यदि शनि अथवा राहु-केतु के कारण बाधाएँ हों, तो गोसेवा और दान से मानसिक संतुलन तथा शुभ कर्मों की प्रेरणा प्राप्त होती है।

ध्यान रहे कि ग्रहों के परिणाम सदैव संपूर्ण जन्मकुंडली के समग्र विश्लेषण पर निर्भर करते हैं।

गौ - माता के लिए किया गया दान जीवन में कभी व्यर्थ नही जाता है, मनुष्य के जितने भी पाप किए गए होते हैं, उनकी मुक्ति का मात्र एक ही साधन है और वो है - गौवंश सेवा'। 

लेकिन वर्तमान में गौ - माता की जो स्थिति है उसे सुनकर दु:ख व पीड़ा होती है। 

अतः इसके लिए हम सभी सनातनियों को आगे आना पड़ेगा और सभी के सामूहिक प्रयासों से ही गौ माता को संरक्षण व संवर्धन प्राप्त हो पाएगा।

गोपाष्टमी पर्व मनाया जाएगा अतः इस अवसर पर हम सभी एक संकल्प के साथ ये प्रतिज्ञा लें कि गौ माता के संरक्षण - संवर्धन के लिए अपना यथेष्ट योगदान देंगे।

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प्रश्नकुंडली में संकेत :

यदि गोपाष्टमी के दिन प्रश्नकुंडली में लग्न, चन्द्रमा और गुरु शुभ स्थिति में हों, तो आरम्भ किए गए धार्मिक कार्य, दान, संकल्प और आध्यात्मिक प्रयासों के सफल होने की संभावना बढ़ जाती है।

यदि ग्रह बाधित हों तो पहले ईश्वर स्मरण, दान, जप और सदाचार द्वारा मानसिक स्थिरता प्राप्त कर निर्णय लेना हितकारी माना जाता है।

गोचर के अनुसार प्रभाव :

यदि गोचर में गुरु शुभ दृष्टि दे रहा हो, चन्द्रमा शुभ नक्षत्र में हो अथवा शुक्र बलवान हो, तो गोपाष्टमी पर किए गए सत्कर्मों से मनोबल, सामाजिक सम्मान और धार्मिक उत्साह में वृद्धि होती है।

गोपाष्टमी के प्रमुख नियम :

- प्रातःकाल स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
- भगवान श्रीकृष्ण का ध्यान करें।
- गोमाता को स्नान, पुष्प, रोली, अक्षत और माला अर्पित करें।
- गौ को हरा चारा, गुड़, रोटी, चना अथवा मौसमी आहार श्रद्धापूर्वक खिलाएँ।
- गौ की परिक्रमा करें और प्रणाम करें।
- गोशाला में अपनी श्रद्धानुसार दान दें।
- भगवान श्रीकृष्ण के नाम का जप करें।
- असत्य, क्रोध और हिंसा से दूर रहें।

गङ्गाधरं  शशिकिशोरधरं त्रिलोकी -
रक्षाधरं  निटिलचन्द्रधरं  त्रिधारम्।
भस्मावधूलनधरं  गिरिराजकन्या -
 दिव्यावलोकनधरं  वरदं  प्रपद्ये।।

काशीश्वरं सकलभक्तजनार्तिहारं
 विश्वेश्वरं  प्रतिपालनभव्यभारम्।
रामेश्वरं  विजयदानविधानधीरं
 गौरीश्वरं वरदहस्तधरं नमाम:।।

गोपाष्टमी के दिन क्या करें ?

- श्रीकृष्ण एवं गोमाता का पूजन।
- श्रीमद्भगवद्गीता का पाठ।
- विष्णु सहस्रनाम का पाठ।
- गोशाला में सेवा।
- अन्न, वस्त्र एवं दक्षिणा का दान।
- ब्राह्मण, संत अथवा जरूरतमंदों का सम्मान।

क्या न करें?

- गौ का अपमान न करें।
- किसी भी जीव को कष्ट न दें।
- नशा, हिंसा, असत्य और कटु वचन से बचें।
- भोजन का अनादर न करें।
- धर्म का उपहास न करें।

गोपाष्टमी के शुभ फल

- मानसिक शांति।
- परिवार में सुख एवं सौहार्द।
- धर्म और पुण्य की वृद्धि।
- ईश्वर भक्ति में रुचि।
- समाज में सम्मान।
- सकारात्मक सोच।
- सेवा भावना का विकास।
- आध्यात्मिक उन्नति।

शास्त्रीय मान्यता के अनुसार श्रद्धापूर्वक किया गया दान और सेवा व्यक्ति के सद्गुणों को विकसित करता है तथा धर्मपालन की प्रेरणा देता है।

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गंगा एवं बालचन्द्र को धारण करने वाले, त्रिलोकी की रक्षा करने वाले, मस्तक पर चन्द्रमा एवं त्रिधार ( गंगा ) - को धारण करने वाले, भस्भ का उद्धूलन धारण करने वाले तथा पार्वती को दिव्य दृष्टि से देखने वाले, वरदाता भगवान् शंकर की मैं शरण में हूं।

काशी के ईश्वर, सम्पूर्ण भक्तजन की पीड़ा को दूर करने वाले, प्रणतजनों की रक्षा का भव्य भार धारण करने वाले, भगवान् राम के ईश्वर, विजय प्रदान के विधान में धीर एवं वरद मुद्रा धारण करने वाले, भगवान् गौरीश्वर को हम प्रणाम करते हैं।'
वैदिक उपाय

- "ॐ नमो भगवते वासुदेवाय" मंत्र का 108 बार जप करें।
- "गोमातरं नमाम्यहम्" का श्रद्धापूर्वक स्मरण करें।
- भगवान श्रीकृष्ण को माखन-मिश्री का भोग लगाएँ।
- गोशाला में हरा चारा या अन्न दान करें।
- तुलसी की पूजा करें।
- गौ के चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लें (यदि सुरक्षित एवं उचित परिस्थितियाँ हों)।
- जरूरतमंदों को भोजन कराएँ।
- अपने सामर्थ्य के अनुसार सेवा और दान करें।

आधुनिक जीवन में गोपाष्टमी का संदेश

गोपाष्टमी केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि प्रकृति, पशु, पर्यावरण और मानवता के प्रति करुणा का संदेश भी देती है। यह हमें सिखाती है कि सेवा, संवेदना, कृतज्ञता और धर्म का पालन ही सच्ची समृद्धि का आधार है।

आज के समय में गोसेवा का अर्थ केवल पूजा तक सीमित नहीं, बल्कि पशुओं के प्रति दया, पर्यावरण संरक्षण, स्वच्छता, जैव विविधता के प्रति सम्मान और समाजहित के कार्यों में योगदान देना भी है।

गोपाष्टमी महोत्सव भगवान श्रीकृष्ण की गोपाल लीला, गोमाता के सम्मान और धर्मपरायण जीवन का दिव्य उत्सव है। वैदिक ज्योतिष के अनुसार जन्मकुंडली, प्रश्नकुंडली और गोचर का विवेकपूर्ण अध्ययन व्यक्ति को उचित समय पर शुभ कर्म करने की प्रेरणा देता है। इस पावन अवसर पर श्रद्धा, सेवा, जप, दान और सदाचार का पालन करने से मन में शांति, धर्म के प्रति आस्था और जीवन में सकारात्मकता का विकास होता है।

अतः गोपाष्टमी का वास्तविक संदेश केवल अनुष्ठान नहीं, बल्कि करुणा, सेवा, कृतज्ञता और ईश्वर-भक्ति को जीवन में उतारना है। यही सनातन संस्कृति की महान परंपरा है और यही इस पावन पर्व का सच्चा फल है।       
   || गोपाष्टमी की हार्दिक शुभकामनाएं ||
       || ॐ नमः शिवाय ||
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