संक्षिप्त श्रीस्कन्द महापुराण।
संक्षिप्त श्रीस्कन्द महापुराण
श्रीअयोध्या-माहात्म्य
गोप्रतारतीर्थकी महिमा और श्रीरामके परमधामगमनकी कथा...(भाग 2)
श्रीस्कन्द महापुराण–श्रीअयोध्या-माहात्म्य में गोप्रतारतीर्थ की महिमा, श्रीराम के परमधामगमन तथा ग्रहों के अनुसार पूजन, प्रभाव, महत्व, फल, नियम और उपाय — भाग 2
श्री वैदिक ज्योतिषशास्त्रविद्या, श्री खगोड़शास्त्रविद्या अर्थात् श्री नक्षत्रपद्धतिविद्या, श्री कृष्णमूर्तिपद्धतिविद्या, श्री अंकशास्त्रविधा, श्री हस्तरेखाशास्त्रविधा, श्री सामुद्रिकशास्त्रविधा, श्री वास्तुशास्त्रविधा, श्री ऋग्वेद, श्री भविष्यपुराण, श्री भृगुसंहिता, श्री गर्गसंहिता तथा अन्य पुराणीय परंपराओं के संदर्भ में मनुष्य के जीवन में ग्रहों, कर्म, काल, संस्कार और ईश्वर - भक्ति को महत्वपूर्ण माना गया है।
जन्मकुंडली, प्रश्नकुंडली और गोचर का अध्ययन ज्योतिष की परंपरागत पद्धतियों से किया जाता है, जबकि ग्रहों की शांति के लिए पूजा, मंत्र, दान, व्रत और देवता - उपासना को आध्यात्मिक उपाय के रूप में अपनाया जाता है।
ऐसा कहकर श्रीरामचन्द्रजीने शेष वानरोंसे कहा- 'तुम सब लोग मेरे साथ चलो।'
अयोध्या केवल एक प्राचीन नगरी नहीं, बल्कि श्रीराम की जन्मभूमि, कर्मभूमि और उनकी मर्यादा, धर्म, त्याग तथा लोककल्याण की स्मृति से जुड़ी हुई पावन भूमि है।
श्रीराम के जीवन का प्रत्येक प्रसंग मनुष्य को धर्म के मार्ग पर चलने, कर्तव्य निभाने और अंततः ईश्वर की शरण में जाने की प्रेरणा देता है।
तदनन्तर रात बीतनेपर जब प्रातःकाल हुआ, तब विशालवक्ष और कमलदलके समान नेत्रोंवाले महाबाहु श्रीराम अपने पुरोहित वशिष्ठजीसे बोले- 'भगवन् ।
श्रीराम के राज्यकाल का अंतिम अध्याय :
लंका विजय, अयोध्या वापसी और श्रीरामराज्य की स्थापना के पश्चात् अयोध्या में धर्म, न्याय और लोककल्याण की प्रतिष्ठा हुई।
श्रीराम ने राजा के रूप में अपने व्यक्तिगत सुख से अधिक प्रजा के हित को महत्व दिया।
उनके शासन में सत्य, मर्यादा, करुणा और न्याय को सर्वोच्च स्थान प्राप्त था।
किन्तु संसार में अवतरित प्रत्येक दिव्य लीला का एक निश्चित पूर्णत्व भी होता है।
भगवान श्रीराम का अवतार भी केवल राज्य करने के लिए नहीं था।
रावण जैसे अधर्म के प्रतीक का विनाश, धर्म की स्थापना और आदर्श जीवन का संदेश देने के पश्चात् उनकी पृथ्वी पर लीला अपने अंतिम चरण की ओर बढ़ी।
परंपरागत कथा के अनुसार जब श्रीराम के पृथ्वी पर रहने की अवधि पूर्ण होने लगी, तब उनके परमधाम लौटने का समय आया।
यह घटना सामान्य मनुष्य की मृत्यु जैसी नहीं मानी जाती, बल्कि भगवान के अवतार की लीला का समापन और अपने दिव्य धाम की ओर प्रस्थान माना जाता है।
प्रज्वलित अग्निहोत्रकी अग्नि आगे चले।
वाजपेय यज्ञ भी और अतिरात्र यज्ञकी अग्नि आगे - आगे ले जायी जाय।'
यहाँ यह समझना आवश्यक है कि ग्रहों के अनुसार की जाने वाली पूजा की परंपरा ज्योतिषीय और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है; प्रत्येक ग्रह के लिए एक ही पूजा सभी व्यक्तियों पर समान रूप से लागू नहीं होती।
जन्मकुंडली में ग्रह की राशि, भाव, नक्षत्र, दृष्टि, युति, दशा - अंतरदशा और गोचर आदि देखकर किसी योग्य ज्योतिषी द्वारा उपाय निर्धारित करना अधिक उचित माना जाता है।
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| Brand | anciently |
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गोप्रतारतीर्थ की ओर प्रस्थान :
अयोध्या में जब यह दिव्य समाचार फैला कि श्रीराम अपनी पृथ्वी - लीला पूर्ण करके परमधाम की ओर प्रस्थान करने वाले हैं, तब उनके प्रति प्रेम रखने वाले अनेक जन उनके साथ चलने के लिए तैयार हुए।
श्रीराम ने सरयू नदी के पवित्र तट की ओर प्रस्थान किया।
अयोध्या और सरयू का संबंध सनातन धार्मिक परंपरा में अत्यंत पवित्र माना गया है।
सरयू केवल एक नदी नहीं, बल्कि भक्तिभाव, पवित्रता और मोक्ष की आकांक्षा से जुड़ा हुआ तीर्थस्वरूप जल माना जाता है।
गोप्रतारतीर्थ इसी दिव्य प्रसंग से विशेष रूप से स्मरण किया जाता है।
भक्तों की दृष्टि में वह स्थान भगवान श्रीराम की अंतिम पृथ्वी - लीला का साक्षी बन गया।
कथा का भाव यह है कि श्रीराम जब सरयू के पावन जल की ओर बढ़े, तब उनके साथ अयोध्या की प्रजा और अनेक भक्त भी चल पड़े।
वातावरण में शोक भी था और आध्यात्मिक आनंद भी।
शोक इसलिए कि अयोध्यावासी अपने प्रिय राजा से पृथ्वी पर विदा लेने वाले थे, और आनंद इस लिए कि वे जानते थे कि श्रीराम कोई साधारण राजा नहीं, स्वयं भगवान विष्णु के अवतार हैं।
तब महातेजस्वी वशिष्ठजीने अपने मनमें सब बातोंका निश्चय करके विधिपूर्वक महाप्रस्थान - कालोचित कर्म किया।
तदनन्तर ब्रह्मचर्यपूर्वक रेशमी वस्त्र धारण किये भगवान् श्रीराम दोनों हाथोंमें कुश लेकर महाप्रस्थानको उद्यत हुए।
वे नगरसे बाहर निकलकर शुभया अशुभ कोई वचन नहीं बोले।
( भगवान् श्रीरामके वामपार्श्वमें हाथमें कमल लिये लक्ष्मीजी खड़ी हुईं और दाहिने पार्श्वमें विशाल नेत्रोंवाली लज्जा देवी उपस्थित हुईं।
आगे मूर्तिमान् व्यवसाय उद्योग एवं दृढ़निश्चय ) विद्यमान था।
धनुष, प्रत्यंचा और बाण आदि नाना प्रकारके अस्त्र - शस्त्र पुरुषशरीर धारण करके भगवान्के पीछे - पीछे चले।
ब्राह्मणरूपधारी वेद वामभागमें और गायत्री दक्षिण भागमें स्थित हुई।
ॐकार, वषट्कार सभी श्रीरामचन्द्रजीके साथ चले।
ऋषि, महात्मा और पर्वत सभी स्वर्गद्वारपर उपस्थित भगवान् श्रीरामके पीछे - पीछे चले।
अन्तःपुरकी स्त्रियाँ वृद्ध, बालक, दासी और द्वाररक्षक सबको साथ लेकर श्रीरामचन्द्रजीके साथ प्रस्थित हुईं।
रनिवासकी स्त्रियोंको साथ ले शत्रुघ्नसहित भरत भी चले।
रघुकुलसे अनुराग रखनेवाले महात्मा ब्राह्मण स्त्री, पुत्र और अग्निहोत्रसहित जाते हुए श्रीरामचन्द्रजीके पीछे-पीछे चले।
मन्त्री भी सेवक, पुत्र, बन्धु-बान्धव तथा अनुगामियोंसहित श्रीरामचन्द्रजीके पीछे गये।
भगवान्के गुणोंसे सतत प्रसन्न रहनेवाली अयोध्याकी सारी प्रजा हृष्ट - पुष्ट मनुष्योंसे घिरी हुई श्रीरामचन्द्रजीका अनुगमन करनेके लिये घरसे चल दी।
उस समय वहाँ कोई दीन, भयभीत अथवा दुःखी नहीं था, सभी हर्ष और आनन्दमें मग्न थे।
अयोध्यामें उस समय कोई अत्यन्त सूक्ष्म प्राणी भी ऐसा नहीं था जो स्वर्गद्वारके समीप खड़े हुए श्रीरामचन्द्रजीके पीछे न गया हो।
वहाँ से आधा योजन दक्षिण जाकर भगवान् पश्चिमकी ओर मुख करके चलने लगे।
आगे जाकर रघुनाथजीने पुण्यसलिला सरयूका दर्शन किया।
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गोप्रतारतीर्थ और श्रीराम के परमधामगमन की कथा :
अयोध्या सनातन परंपरा में भगवान श्रीराम की पवित्र जन्मभूमि और उनकी दिव्य लीलाओं की भूमि मानी जाती है।
श्रीस्कन्द महापुराण के श्रीअयोध्या - माहात्म्य से जुड़ी परंपरा में अयोध्या के विभिन्न तीर्थों की महिमा का वर्णन मिलता है।
इन्हीं में गोप्रतारतीर्थ को श्रीराम की अंतिम पृथ्वी - लीला और सरयू से जुड़े उनके परमधामगमन के प्रसंग के कारण विशेष श्रद्धा से स्मरण किया जाता है।
श्रीराम ने अपने जीवन में केवल राजसत्ता का आदर्श नहीं दिया, बल्कि धर्म, सत्य, त्याग, मर्यादा, सेवा और कर्तव्य का आदर्श स्थापित किया।
रावण - वध के बाद अयोध्या लौटकर उन्होंने राजधर्म का पालन किया और प्रजा के हित को सर्वोच्च स्थान दिया।
जब पृथ्वी पर उनकी अवतारी लीला का समय पूर्ण होने लगा, तब श्रीराम के परमधामगमन का दिव्य प्रसंग आया।
परंपरागत कथा के अनुसार श्रीराम सरयू के पावन तट की ओर गए।
उनके प्रति प्रेम रखने वाले अनेक अयोध्यावासी भी उनके साथ चले।
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{ Additional Information
यह प्रसंग सामान्य मृत्यु के रूप में नहीं, बल्कि भगवान की पृथ्वी - लीला के पूर्ण होने और उनके दिव्य धाम की ओर प्रस्थान के रूप में देखा जाता है।
इस लिए गोप्रतारतीर्थ का स्मरण मनुष्य को जीवन की नश्वरता और परमात्मा की शरण की ओर प्रेरित करता है।
परंपरागत धार्मिक मान्यता में तीर्थ केवल भौगोलिक स्थान नहीं होता।
तीर्थ का अर्थ ऐसा पवित्र स्थल भी है जहाँ मनुष्य अपने भीतर परिवर्तन की भावना लेकर जाता है।
गोप्रतारतीर्थ की महिमा का मुख्य संदेश यही माना जा सकता है कि मनुष्य अपने अहंकार, भय, मोह और सांसारिक आसक्ति को कम करके भगवान की शरण ग्रहण करे।
श्रीराम का जीवन बताता है कि शक्ति मिलने पर अहंकार नहीं करना चाहिए, राज्य मिलने पर अन्याय नहीं करना चाहिए, विपत्ति आने पर धर्म नहीं छोड़ना चाहिए और जीवन के अंतिम चरण में परमात्मा का स्मरण नहीं भूलना चाहिए।
इस दृष्टि से गोप्रतारतीर्थ की कथा का प्रभाव सबसे पहले मन पर पड़ता है।
जो व्यक्ति श्रद्धा से इस कथा को सुनता या पढ़ता है, उसके भीतर अपने जीवन को धर्ममय बनाने की प्रेरणा उत्पन्न हो सकती है।
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ज्योतिषीय दृष्टि से इस कथा का संकेत :
वैदिक ज्योतिष में जीवन को कर्म, काल और ग्रहगत परिस्थितियों के संदर्भ में समझने की परंपरा रही है।
जन्मकुंडली से व्यक्ति के जीवन के विभिन्न क्षेत्रों का पारंपरिक अध्ययन किया जाता है, जबकि प्रश्नकुंडली किसी विशेष समय पर पूछे गए प्रश्न के संकेतों को समझने की पद्धति मानी जाती है।
गोचर से वर्तमान समय में ग्रहों की स्थिति का अध्ययन किया जाता है।
लेकिन भगवान श्रीराम के परमधामगमन जैसी दिव्य घटना को सामान्य मनुष्य की जन्मकुंडली के नियमों से सीधे नहीं तौला जाना चाहिए।
अवतार की लीला का आध्यात्मिक स्वरूप सामान्य जीव के कर्मफल से भिन्न माना जाता है।
फिर भी इस कथा से ज्योतिषीय साधक एक महत्वपूर्ण सिद्धांत ग्रहण कर सकता है—
काल परिवर्तनशील है और जीवन में प्रत्येक अवस्था का एक आरंभ तथा एक पूर्णत्व होता है।
शनि हमें कर्म और धैर्य की शिक्षा देता है, गुरु धर्म और ज्ञान की ओर संकेत करता है, सूर्य आत्मबल तथा राजधर्म का प्रतीक माना जाता है और चंद्रमा मन एवं भावनाओं का प्रतिनिधित्व करता है।
इन ग्रह - तत्वों को आध्यात्मिक प्रतीकों के रूप में देखने पर श्रीराम का जीवन धर्म, आत्मसंयम, कर्तव्य और त्याग की पूर्ण शिक्षा देता दिखाई देता है।
+++ +++
ब्रह्म का ही सदा सेवन करना चाहिए।
ब्रह्म ही परम सुख है।
वह हाथ पैर से रहित, जीभ मुख से रहित अत्यन्त सूक्ष्म है, वह बिना आँखों के ही देखता है, बिना कान के सुनता है तथा सबको देखता है, सब को जानता है उसी को महान पुरुष कहते हैं।
जैसे पवन सब जगह विचरण करता है वैसे ही वह सब पुरी ( शरीर ) में रहने से पुरुष कहलाता है।
वही अपने धर्म को त्यागकर माया के वशीभूत हो शुक्र शोणित होकर गर्भ में वास करता है और नौवें महीने में उत्पन्न होकर पाप कर्म रत होकर नर्क के भोगों को भोगता है।
इसी प्रकार जीव अपने कर्मों के फल से नाना प्रकार के भोगों को भोगते हैं।
अकेला ही अपने कर्मों को भोगता है और अकेला ही सबको छोड़कर जाता है।
इस लिये सदैव सुकृत ही करने चाहिए।
फल और आध्यात्मिक लाभ :
पुराणीय परंपरा में पवित्र तीर्थों, भगवान के नाम और दिव्य कथाओं के श्रवण को पुण्यदायक माना गया है।
इस लिए गोप्रतारतीर्थ और श्रीराम के परमधामगमन की कथा का श्रवण श्रद्धा, भक्ति और आत्मचिंतन की भावना को बढ़ाने वाला माना जाता है।
इस कथा से प्राप्त होने वाले प्रमुख आध्यात्मिक फल इस प्रकार समझे जा सकते हैं—
प्रथम — मन की शांति: श्रीराम के चरित्र का स्मरण मन को स्थिर और धर्म की ओर प्रेरित करता है।
द्वितीय — मोह में कमी: संसार की वस्तुएँ स्थायी नहीं हैं, यह भावना मनुष्य को अनावश्यक आसक्ति से बचाती है।
तृतीय — धर्मबुद्धि: श्रीराम का जीवन कर्तव्य और मर्यादा को सर्वोच्च स्थान देने की प्रेरणा देता है।
चतुर्थ — पूर्वजों और तीर्थों के प्रति श्रद्धा: पवित्र तीर्थों की स्मृति मनुष्य में अपनी सनातन परंपरा के प्रति सम्मान उत्पन्न करती है।
पंचम — ईश्वरभक्ति: जीवन की अंतिम मंजिल धन, पद या प्रतिष्ठा नहीं, बल्कि परमात्मा की शरण है—यह भाव मजबूत होता है।
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ग्रह और भगवान श्रीराम की उपासना :
ज्योतिषीय दृष्टि से नौ ग्रहों को मानव जीवन के विभिन्न कर्मक्षेत्रों के संकेतक माना जाता है।
दूसरी ओर सनातन उपासना - पद्धति में ग्रहों की शांति के लिए संबंधित देवता की आराधना, मंत्र - जप, दान और सात्त्विक आचरण की परंपरा है।
1. सूर्य ग्रह — श्रीसूर्यदेव की पूजा :
सूर्य को आत्मबल, पिता, प्रतिष्ठा, राजसत्ता, नेतृत्व, स्वास्थ्य और आत्मविश्वास का कारक माना जाता है।
जन्मकुंडली में सूर्य कमजोर या पीड़ित माना जाए तो परंपरागत रूप से रविवार को सूर्यदेव को प्रातःकाल स्वच्छ जल से अर्घ्य देने की सलाह दी जाती है।
सूर्यदेव के सामने श्रद्धापूर्वक प्रार्थना करें और आदित्य हृदय स्तोत्र अथवा सूर्य मंत्र का पाठ करें।
पिता, गुरु और वरिष्ठ व्यक्तियों का सम्मान करना भी सूर्य तत्व को सकारात्मक बनाने वाला सात्त्विक आचरण माना जाता है।
आध्यात्मिक फल: आत्मविश्वास, अनुशासन, नेतृत्व और सकारात्मक जीवन - दृष्टि की प्रेरणा।
2. चंद्र ग्रह — भगवान शिव की पूजा :
चंद्रमा को मन, माता, भावनाओं, कल्पना, शांति और मानसिक स्थिरता का संकेतक माना जाता है।
चंद्रमा से संबंधित अशांति में सोमवार को भगवान शिव की पूजा, शिवलिंग पर जल अर्पण और “ॐ नमः शिवाय” का जप परंपरागत उपाय माना जाता है।
माता का सम्मान, जरूरतमंदों को दूध या सफेद वस्तुओं का दान और मन को शांत रखने वाला सात्त्विक जीवन भी चंद्र तत्व से जोड़ा जाता है।
आध्यात्मिक फल: मन की शांति, भावनात्मक संतुलन और धैर्य की भावना।
3. मंगल ग्रह — श्रीहनुमानजी की पूजा :
4. बुध ग्रह — श्रीगणेश और विष्णु उपासना:
5. गुरु ग्रह — भगवान विष्णु और बृहस्पति की उपासना :
6. शुक्र ग्रह — माता लक्ष्मी की पूजा :
7. शनि ग्रह — भगवान शनिदेव और श्रीहनुमानजी की उपासना :
8. राहु — देवी दुर्गा एवं शिव उपासना :
9. केतु — भगवान गणेश और भगवान शिव की उपासना :
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श्रीराम कथा और ग्रहों की पूजा का संबंध :
श्रीराम के जीवन को ग्रहों की पूजा का सीधा विकल्प नहीं माना जाना चाहिए, लेकिन उनके जीवन से प्रत्येक ग्रह के सकारात्मक गुणों की प्रेरणा ली जा सकती है।
सूर्य से आत्मबल, चंद्र से करुणा, मंगल से साहस, बुध से विवेक, गुरु से धर्मज्ञान, शुक्र से मर्यादित प्रेम, शनि से कर्म और धैर्य, राहु से सावधानी तथा केतु से वैराग्य की शिक्षा ली जा सकती है।
इसी लिए श्रीराम की कथा केवल धार्मिक कथा नहीं, बल्कि जीवन को संतुलित करने वाली आध्यात्मिक प्रेरणा भी है।
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पूजा के नियम
ग्रहों की पूजा करते समय सबसे पहले मन की शुद्धता, श्रद्धा और सात्त्विक आचरण को महत्व देना चाहिए।
पूजा के नाम पर भय पैदा करना उचित नहीं है।
प्रत्येक ग्रह को शत्रु समझने के बजाय उसे कर्म और जीवन के किसी क्षेत्र का ज्योतिषीय संकेतक समझना अधिक संतुलित दृष्टिकोण है।
किसी व्यक्ति की कुंडली में ग्रह की वास्तविक स्थिति जाने बिना महंगे रत्न, विशेष यज्ञ या अत्यधिक खर्च वाले उपाय नहीं करने चाहिए।
पूजा, जप, दान और सेवा अपनी क्षमता के अनुसार करना अधिक उचित है।
सरल सामूहिक उपाय :
यदि कोई व्यक्ति सामान्य रूप से श्रीराम की भक्ति के साथ ग्रहों की शांति की भावना रखना चाहता है, तो प्रतिदिन श्रीराम नाम का स्मरण कर सकता है।
“श्रीराम जय राम जय जय राम” का श्रद्धापूर्वक जप, रामायण या श्रीरामचरितमानस का श्रवण, माता - पिता और गुरु का सम्मान, सत्य बोलना, जरूरतमंदों की सहायता करना तथा अपने कर्म को ईमानदारी से करना अत्यंत सरल आध्यात्मिक साधना है।
विशेष रूप से गोप्रतारतीर्थ और सरयू का स्मरण करते समय मन में यह संकल्प रखा जा सकता है कि “हे प्रभु श्रीराम, मेरे जीवन से अधर्म, अहंकार, मोह और असत्य को दूर करके मुझे सत्य, धर्म, सेवा और सदाचार के मार्ग पर चलने की शक्ति प्रदान करें।”
यदि कोई भक्त गोप्रतारतीर्थ की कथा के आधार पर साधना करना चाहे तो किसी विशेष कठिन अनुष्ठान की अपेक्षा सरल सात्त्विक आचरण को प्राथमिकता देना उचित है।
प्रातःकाल स्नान करके भगवान श्रीराम, माता सीता, लक्ष्मणजी और हनुमानजी का स्मरण करें।
श्रद्धा के अनुसार श्रीराम नाम का जप करें।
“श्रीराम जय राम जय जय राम” अथवा “राम” नाम का स्मरण किया जा सकता है।
यदि संभव हो तो रामायण, श्रीरामचरितमानस या श्रीराम से संबंधित किसी प्रमाणिक ग्रंथ का पाठ अथवा श्रवण करें।
किसी पवित्र नदी, तीर्थ या मंदिर में जाएँ तो स्वच्छता बनाए रखें और नदी में प्लास्टिक अथवा प्रदूषणकारी वस्तुएँ न डालें।
दान करते समय अपनी क्षमता के अनुसार अन्न, वस्त्र या आवश्यक वस्तुओं का दान करना श्रेष्ठ है।
किसी भूखे व्यक्ति को भोजन कराना और जरूरतमंद की सहायता करना भी श्रीराम के लोककल्याणकारी आदर्श से जुड़ा हुआ आचरण है।
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| { Size | 18L x 12.5W cm |
| Product Dimensions | 18L x 12.5W Centimeters |
| Item Weight | 420 Grams |
| Number of Items | 1 |
| Orientation | Portrait |
| Shape | Round |
| Theme | Religious |
| Recommended Uses For Product | indoor |
| Frame Type | Framed |
| Wall art form | Wall Hanging Decor } |
{ About this item
- Material: Brass
- Dimensions of Wall Hanging : Length: 5 inches (12.5 cm) , Height: 7 inches (18 cm)
- Package contains: 1 Unit of Ethnic Carved Peacock Design Brass Prabhavali Frame Wall Hanging
- Care Instructions: Use dry or wet cotton cloth to remove dirt. The product is even washable.
- The Prabhavali arch design of the frame is traditionally used to frame the deities and represents the gateway to the divine realm }
उपाय :
यदि जीवन में मानसिक अशांति, पारिवारिक तनाव या भविष्य को लेकर भय हो, तो केवल ज्योतिषीय उपायों पर निर्भर रहने के बजाय धर्मसम्मत व्यवहार, उचित कर्म और व्यावहारिक प्रयास भी आवश्यक हैं।
श्रीराम नाम का नियमित स्मरण, मंगलवार या गुरुवार को हनुमानजी अथवा श्रीराम मंदिर में दर्शन, रामायण का श्रवण, जरूरतमंदों की सहायता और सत्य तथा मर्यादा का पालन सरल आध्यात्मिक उपाय माने जा सकते हैं।
ज्योतिषीय दृष्टि से किसी व्यक्ति की जन्मकुंडली देखकर उपाय निर्धारित करने की परंपरा अलग विषय है।
इस लिए बिना जन्म विवरण और कुंडली देखे किसी व्यक्ति के लिए विशेष ग्रहशांति या रत्न का निर्णय नहीं करना चाहिए।
कथा का सबसे बड़ा संदेश :
श्रीराम का गोप्रतारतीर्थ से जुड़ा परमधामगमन हमें यह बताता है कि संसार में हमारा प्रत्येक संबंध और प्रत्येक भूमिका एक निश्चित समय तक है।
मनुष्य को अपने कर्तव्य का पालन करते हुए अंततः परमात्मा की ओर लौटना है।
श्रीराम ने राजा होकर भी धर्म को नहीं छोड़ा। उन्होंने शक्ति होते हुए भी मर्यादा को प्राथमिकता दी।
उन्होंने विजय प्राप्त करके भी अहंकार नहीं किया और जीवन की अंतिम घड़ी में भी परम सत्य की ओर प्रस्थान किया।
इस लिए गोप्रतारतीर्थ की महिमा का वास्तविक सार केवल तीर्थस्नान या बाहरी कर्मकांड में नहीं, बल्कि मन, वचन और कर्म को धर्ममय बनाने में है।
जो व्यक्ति श्रीराम की कथा सुनकर अपने जीवन में सत्य, संयम, सेवा, करुणा और कर्तव्य को अपनाता है, वही इस कथा का वास्तविक फल प्राप्त करता है।
इस कथा का वास्तविक फल :
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अंत में भगवान श्रीराम से यही प्रार्थना—
हे मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम!
हमारे जीवन में सूर्य जैसा आत्मबल, चंद्र जैसा शांत मन, मंगल जैसा साहस, बुध जैसा विवेक, गुरु जैसा ज्ञान, शुक्र जैसी मधुरता, शनि जैसा धैर्य और राहु - केतु के भ्रम से बचने वाला विवेक प्रदान कीजिए।
हमारे कर्मों को धर्ममय बनाइए और अंत समय तक आपके चरणों में भक्ति बनाए रखिए।
उस समय सब देवताओं तथा महात्मा ऋषियोंसे घिरे हुए लोकपितामह ब्रह्माजी श्रीरामचन्द्रजीके समीप आये।
उनके साथ सौ कोटि दिव्य विमान भी थे।
वे उस समय आकाशको सब ओरसे तेजोमय एवं प्रकाशित कर रहे थे।
वहाँ परम पवित्र सुगन्धित एवं सुखदायिनी वायु चलने लगी।
श्रीरामचन्द्रजीने अपने चरणोंसे सरयूजीके जलका स्पर्श किया।
क्रमशः...
शेष अगले अंक में जारी पंडारामा प्रभु राज्यगुरु
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पंडित राज्यगुरु प्रभुलाल पी. वोरिया क्षत्रिय राजपूत जड़ेजा कुल गुर: -
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